जिस तरीक़े से इंसान
संसार में जो पढ़ाई करता है तो उसको डिग्री प्राप्त करने के लिए परीक्षा भी देनी पड़ती
है। ऐसे ही सतगुरु भी अपने सेवक की परीक्षा ज़रूर लेते हैं ताकि पता चल सके सेवक परीक्षा
में कितना खरा उतरता है ।
एक
बार श्री कृष्ण जी के गुरु दुर्वासा ऋषि अपने शिष्यों के साथ कहीं जा रहे थे । रास्ते
में किसी जंगल में रूककर उन्होंने आराम किया । उसी के पास ही द्वारका नगरी थी । दुर्वासा
ऋषि ने अपने शिष्यों को भेजा कि श्री कृष्ण को बुला कर लाओ । तब उनके शिष्य द्वारका
गये और द्वारकाधीश को उनके गुरुदेव का सन्देश दिया । सन्देश सुनते ही श्री कृष्ण जी
दौड़े -2 अपने गुरु के पास गए और उन्हें दण्डवत प्रणाम किया । उनसे द्वारका चलने के
लिए विनती की लेकिन दुर्वासा ऋषि जी ने चलने के लिए मना कर दिया, और फरमाया कि हम फिर
कभी आपके पास आयेंगे । श्री कृष्ण जी ने पुन: दुर्वासा ऋषि जी से विनती की तब दुर्वासा
ऋषि जी ने फरमाया कि ठीक है कृष्ण हम तुम्हारे साथ चलेंगे लेकिन हम जिस रथ पर जायेंगे,
उसे घोड़े नहीं खीचेंगें एक तरफ से तुम और एक तरफ से तुम्हारी पटरानी रुकमणि खीचेंगी
। श्री कृष्ण उसी समय दौड़ते हुए रुकमणि के पास गए और उन्हें बताया कि मुझे तुम्हारी
सेवा की जरुरत है । तब रुकमणि को उन्होंने सारी बात बताई तब वह दोनों अपने गुरुदेव
के पास आये, और उन्हें रथ पर बैठने के लिए विनती की । जब उनके गुरुदेव रथ पर बैठे तो
उन्होंने अपने शिष्यों को भी रथ पर बैठने के लिए कहा लेकिन श्री कृष्ण जी ने परवाह
ना की क्योंकि वे जानते थे कि गुरुदेव उनकी परीक्षा ले रहे है । रुकमणि और श्री कृष्ण
जी ने रथ को खींचना आरम्भ किया और उस रथ को खींचते - खींचते द्वारका ले पहुँचे । जब
गुरुदेव द्वारका पहुँचे तो श्री कृष्ण जी ने उन्हें राज सिंघासन पर बिठाया । उनका आदर
सत्कार किया फिर श्री कृष्ण जी ने 56 तरह के व्यंजन बनवाये अपने गुरुदेव के लिए । लेकिन
जैसे ही वह व्यंजन गुरुदेव के पास पहुँचे उन्होंने सारे व्यंजनों का तिरस्कार कर दिया
।
श्री
कृष्ण जी ने पुन: अपने गुरुदेव से पूछा कि गुरुदेव आप क्या लेंगे? तब दुर्वासा ऋषि
जी ने खीर बनवाने के लिए कहा । श्री कृष्ण जी ने आज्ञा मानकर खीर बनवाई । खीर बनकर
आई । वो खीर से भरा पतीला दुर्वासा ऋषि जी के पास पहुँचा । उन्होंने खीर का भोग लगाया
। थोड़ी-सी खीर का भोग लगा कर उन्होंने श्री कृष्ण जी को खाने के लिए कहा । उस पतीले
में से श्री कृष्ण जी ने थोड़ी सी खीर को खाया । तब उनके गुरुदेव ने श्री कृष्ण को बाकी
खीर अपने शरीर पर लगाने की आज्ञा दी । श्री कृष्ण जी ने आज्ञा पाकर खीर को अपने शरीर
पर लगाना शुरू कर दिया । उन्होंने पूरे शरीर पर खीर लगा ली । लेकिन जब पैर पर लगाने
की बारी आई तो श्री कृष्ण जी ने अपने गुरुदेव को अपने पैरों पर खीर लगाने के लिए मना
कर दिया । श्री कृष्ण जी ने कहा ‘हे गुरुदेव । यह खीर आपका भोग-प्रसाद है, मैं इस भोग
को अपने पैरों पर नहीं लगाऊंगा ।’ उनके गुरुदेव श्री कृष्ण जी से बहुत खुश हुए । उन्होंने
फरमाया ‘हे कृष्ण । मैं तुमसे बहुत खुश हूँ तुम हर परीक्षा में सफल रहे, मैं तुम्हें
आशीर्वाद देता हूँ कि पूरे शरीर में तुमने जहाँ -2 खीर लगाईं है वह अंग आपका वज्र के
समान हो गया है’ और इतिहास साक्षी है कि महाभारत के युद्ध में श्री कृष्ण जी का कोई
भी अस्त्र-शास्त्र बाल भी बाँका नहीं कर पाया । जो अपने गुरुदेव की आज्ञा में तत्पर
रहता है उन भक्तों को ही गुरुदेव का सच्चा प्यार और आशीर्वाद नसीब होता है ।
श्री दूसरी पाद्शाही जी
श्री गुरु महाराज जी के समय की बात है | महाराज जी ने परीक्षा के लिए एक दिन जो उनके पास महात्मा जन
थे, सभी को प्रभु जी ने फरमाया
कि - ‘खजाने में पैसा नहीं है, लंगर का खर्च भी बढ़ता जा रहा है |’ लंगर का काम पूरा करने के लिए महाराज जी ने फरमाया कि- ‘हम
किसी सेवक को बेचना चाहते है | जिसको बिकना हो हाथ ऊँचा करले | ये सोच लो, किसी सेठ के आगे बिक कर नौकर कहलाओगे, उसकी हर तरह की सेवा करनी पड़ेगी | जो ये काम कर सके, हाथ उठाये हम उसे बेच देंगे |’ ऐसे मीठी वाणी सुनकर, जो प्रेमी थे वो फूले न समाये शुकराना करने लगे, सभी के दिल की यह इच्छा थी कि मैं बिक जाऊँ | मुझे बिकने की आज्ञा जरुर दे | फिर परीक्षा को और कड़ा कर दिया गया | फरमाया - ‘हमारी आज्ञा को झूठा न समझो, हम जरुर बेचना चाहते है | जब आप बिक जाओगे तो लोग आपको नमस्कार नहीं करेंगे | नौकर के रूप में सब कहेंगे - देखो भाई ! पैसो के लिए अपना
साधु शरीर भी बेच दिया | तब आपको यह सुनकर बड़ा दुःख होगा | फिर इस मन को कैसे समझाओंगे ?’ लेकिन वैसी ही सेवको की ऊंचाई भी है | कैसा प्रेम अपने मालिक के प्रति है | जितने भी महात्मा जन वहाँ थे, उन्होंने श्री चरणों में प्रर्थना कि – ‘हे मेरे सतगुरु! मन
भी आपका और तन भी आपका, आप जहाँ चाहे रखे’ | यदि मन धोखा देने लगेगा भी सही तो हम उसकी बात नहीं मानेगे | महात्मा जी ने विनती की कि - ‘परमार्थ में सबसे बड़ा दुश्मन
मन है | इसलिए दाता जी ! हमें ये
शुभ अवसर जरुर प्रदान करे |’ महात्मा जी ने नम्रतापूर्वक विनती कि –हमे सुअवसर दे कि जो शरीर गंदगी का थैला
है, गुरु की आज्ञा में काम आ
जाए | अरदास की –दाता जी! हम तो
आपके दास है, आपकी जैसी इच्छा
है वैसे ही अपने पास रखना | प्रेमियों के ये भाव देखकर प्रभु जी बहुत प्रसन्न हुए | एक महात्मा जी की तरफ ईशारा करते हुए मीठी वाणी में फरमाया
– हम आपको बेचना चाहते है | महात्मा जी का नाम परमज्ञानानन्द जी था | यह सुनकर
महात्मा जी की आखों में आंसू भर गए | इतनी ख़ुशी, इतनी ख़ुशी | बयान नही किया जा सकता | हाथ बांधे प्रार्थना की ‘दाता जी ! हुकुम दीजिये कि इस शरीर को चीर कर आपके
पवित्र चरणों में रख दूँ | बस आपके कहने की देर है |’ फरमाया – ठीक है ! आप रोम रोम अर्पण करने को तैयार हो, हमनें भी ये रचना इसलिए रचाई कि देखे कौन तैयार है? दाता दीनदयाल जी ने फरमाया- “ये परीक्षा थी |” गुरुमुखों को हम बेचना नहीं चाहते और मनमुख जो है वो तैयार
नही है | आप गुरुमुखो का तो हम बाल
भी लाख रुपए में भी न दे | गुरुमुख गुरु का ही रूप होता है |
जब सेवक अपने सतगुरु की हर
परीक्षा, उनकी आज्ञा में खरा उतरता है तो फिर सतगुरु अपने सेवक को अपना ही रूप दे
देते है| ऐसे सेवक सतगुरु के रोम रोम में बसते है, सतगुरु ऐसे सेवकों को तीनों
लोको की हर सम्पदा से मालों माल कर देते है |
*****
No comments:
Post a Comment