Tuesday, March 17, 2020

सेवक स्वामी एक मत

 

सेवक स्वामी एक मत

 

सेवक स्वामी एक मत जो मत में मत मिली जाय ।

चतुराई रीझे नहीं, रीझे मन के भाव

 

अर्थात सेवक और स्वामी का एक ही मत होना चाहिए। जैसा स्वामी अपने सेवक को आदेश करे सेवक का ये धर्म है कि उसी अनुसार चले। उसमे फ़िर अपने मन की ना चलाए। स्वामी यदि दिन को रात कहे तो भी सेवक को रात ही जानना चाहिए। सेवक अपने स्वामी के वचनों में कभी संशय ना करे| सेवक का विश्वास होना चाहिए कि यदि मेरे स्वामी ने मुझे कुछ कहा है तो इसमें जरूर कुछ न कुछ राज होगा। एक बड़ा ही सुन्दर प्रसंग है जब श्री हनुमान जी लंका में माता सीता की खोज कर वापिस श्री रामचंद्र जी के पास आए तो उन्होंने माता सीता की सुधि प्रभु श्रीराम जी को कह सुनाई। श्री हनुमान जी के प्रभु श्री राम जी को बताया कि माता सीता कैसे लंका में दुख सहती हुई रहती है। श्री सुंदर काण्ड में यह वर्णन इस प्रकार है

 

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना |

रि जल राजिव नयना ||

सीता जी का दुख सुनकर सुख के धाम प्रभु के कमल नेत्रों में जल भर आया।

 

चन कायँ मन मम ति जाही |

सपनेहुँ बुझिअ बिपति कि ताही।

 

फिर प्रभु अपने आप को सम्भालते हुए बोले कि है हनु‌मान तुम कहते हो सीता दुखी है लेकिन मैं कहता हूँ कि जिसे मन, वचन और शरीर में मेरी ही गति (मेरा ही आश्रय) है उसके क्या स्वपन में भी विपत्ति हो सकती है। जब श्री राम जी के वचन श्री हनु‌मान जी ने सुने तो नतमस्तक हो गए और फरमाने लगे कि

 

कह हनुमन्त बिपत्ति प्रभु सो

जब त सुमिरन भजन ना होई।

 

श्री हनु‌मान जी ने कहा है इस संसार में विपत्ति बड़ी नहीं है विपत्ति तो बस यही है कि अगर इंसान भगवान का सुमिरन नही करता। यहाँ सिखने वाली बात यह है कि सेवक स्वामी का एक ही मत है जो स्वामी श्री राम जी कह रहे है  श्री हनुमान जी उसी मत पर चल रहे है और अपने प्रभु की बात में हाँ में हाँ मिला रहे है| हम सभी अपने मन में विचार करे कि हमारे सतगुरु हमें जिस मार्ग पर चलाना चाहते है,  क्या हम उस मार्ग पर चल रहे है? गुरुमति को त्याग हम मन की मति करते है| अपने मन अनुसार ही हमारी भक्ति है फिर सतगुरु की सच्ची प्रसन्नता कैसे हासिल होगी। सेवक को तो अपने सतगुरु की आज्ञा में सदैव ही तत्पर रहना चाहिएसेवक को चाहिए कि वह अपने सतगुरु के वचनों पर  अनुसरण करे और उन वचनों पर अपने मन की ना चलाए। जब सेवक स्वामी का एक मत होगा तभी सेवक अपने स्वामी की सच्ची प्रसन्नता प्राप्त कर सकता है।

 

एक बार श्री परमहंस दयाल जी महाराज श्री प्रथम पादशाही श्री गुरु महाराज जी ने एक कथा सुनाई – किसी नगर में एक साधू तीर्थो पर जाने लगा तो वहाँ के राजा ने साधू महाराज जी से कहाँ कि आप एक सेवक को साथ ले जाओ मैं आपको दे देता हूँ | तो साधू महाराज जी ने कहा कि सेवक साथ में होगा तो कुछ वो बोलेगा कुछ मैं बोलूंगा तो हमारी जो वृति है वो भगवान् के ध्यान में नहीं लग पाएगी | तो राजा ने कहा कि मैं आपको ऐसा सेवक दूंगा जिससे आप कुछ पूछोंगे तो वो वहीँ जवाब देंगा, आपसे वो कुछ नहीं बोलेगा | तब साधू महाराज ने कहा कि ठीक है अब साधू महाराज जी तीर्थों पर गए जब वह वापिस आये तो राजा के पास आकर साधू महाराज ने कहा कि वाक्य में आपका सेवक तो पूरे रास्ते कुछ नहीं बोला | ये कैसे है | तब  राजा ने कहा कि महाराज इसे बचपन से ही यही सिखाया है कि जो बोलो उसे मानो | श्री परमहंस दयाल महाराज जी ने वचन फरमाए कि ऐसे ही हर गुरुमुख का ये धर्म है कि वो अपने मन को समझाए कि जो मेरे सतगुरु वचन करेंगे मुझे उससे मानना ही मानना है | अर्थात सेवक और स्वामी का एक ही मत हो सेवक के मन में यह भावना हर समय हो कि जो मेरे मालिक ने कह दिया वही मेरे लिए सब कुछ है|

 

ऐसा ही एक बड़ा सुंदर उदाहरण श्री कृष्ण जी और अर्जुन जी के एक प्रसंग में आता है | एक बार श्री कृष्ण जी और अर्जुन जी किसी जगह से गुजर रहे तो रास्ते में एक पेड़ पर एक पक्षी बैठा हुआ था उसे देख कर श्री कृष्ण जी अर्जुन से फरमाने लगे कि अर्जुन तुम्हे पता है ये पक्षी कौन है मुझे तो ये कोयल प्रतीत होती है | तब अर्जुन ने कहा कि प्रभु ये कोयल ही है , फिर श्री कृष्ण जी कहने लगे नहीं अर्जुन ये कोयल नही ये तो कौआ है तब अर्जुन ने उत्तर दिया कि जी प्रभु ये कौआ ही है , फिर श्री कृष्ण जी ने कहा कि अर्जुन यह कौआ नहीं यह तो तोता है तब अर्जुन ने कहा कि प्रभु यह तोता ही है , फिर श्री कृष्ण जी कहने लगे कि अर्जुन यह तोता नहीं यह तो कबुतर है तब अर्जुन ने कहा कि जी प्रभु यह कबुतर ही है तब श्री कृष्ण जी ने अर्जुन से कहा कि अर्जुन जब मैं कहता हूँ कोयल तो तू भी कहता है कोयल है, जब मैं कहता हूँ तोता तो भी तू कहता है कि ये तोता है, जब मैं कहता हूँ कि यह कबुतर है तब तू कहता है कि यह कबुतर है मतलब जो मैं बोलता हूँ तू भी उसी में सहमति जताता है, ऐसा क्यों? तब अर्जुन ने उत्तर दिया कि प्रभु जब आपने कुछ बोल दिया तो मैं उसमे संशय कैसे कर सकता हूँ | ये है एक सेवक के भाव अपने स्वामी के प्रति | यहाँ जो श्री कृष्ण जी कह रहे है अर्जुन उसे मत में ही अपना मत मिला रहा है| सेवक का यही कर्तव्य है कि वह सदा अपने स्वामी के मत के अनुसार उनकी आज्ञा अनुसार जीवन व्यतीत करे|

 

*****

No comments:

Post a Comment