भोला - भाव
कोई सेवक ये सोचे कि मैं अपनी चतुराई से प्रभु को खुश कर लूँगा ये कभी नहीं हो
सकता है अपने चतुराई से हम संसार के लोगो को तो खुश कर सकते है लेकिन उस परम पिता
परमात्मा को प्रसन्न करने के लिए हमारे अंदर भोलापन होना बहुत जरुरी है | भोलपन से
यहाँ भाव है कि हमारे मन में कोई भी छल या कपट न हो किसी के प्रति मन में द्वेष न
हो, हम सभी में ही भगवान के रूप को ही देखे| श्री रामचरित मानस में भगवान श्री राम
जी फरमाते है कि-
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
जो मनुष्य निर्मल मन का होता है, वही मुझे पाता है। मुझे कपट
और छल-छिद्र नहीं सुहाते।
ऐसे ही इतिहास के अंदर एक भक्त हुए है भक्त धन्ना जी जो भगवान के बहुत बड़े
भक्त थे| उसके माता-पिता साधारण कृषक थे| भक्त धन्ना और उसके
माता-पिता ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे, लेकिन भक्ति के गुणों से
भरपूर थे| उनके यहाँ साधु-संतो का भी आना-जाना लगा रहता था| एक दिन की बात है उनके घर
उनके कुल के पंडित त्रिलोचन जी आये थे| भक्त धन्ना ने पंडित जी को
ठाकुर जी को स्नान करवाते हुए व भोग लगाते हुए देखा| बाद में जब पूजा समाप्त की
तो भक्त धन्ना ने पंडित जी से पूछा कि आप क्या कर रहे थे? पंडित जी ने बताया कि मैं
ठाकुर जी की पूजा कर रहा था| तो भक्त जी ने कहा कि पूजा करने से क्या होता है? तो पंडित जी ने बताया कि
पूजा करने से भगवान प्रसन्न होते है, तो भक्त धन्ना ने कहा – “यदि पूजा से भगवान प्रसन्न
होते है तो मैं भी ठाकुर जी की पूजा करूँगा और उन्हें प्रसन्न करूँगा| ये ठाकुर जी आप मुझे दे
दीजिए और पूजा करने की विधि भी सिखा दीजिए|” पंडित जी बोले- “तू अनपढ़-गवांर ठाकुर जी की
क्या पूजा करेगा? बाहर जा और बच्चों के साथ जाकर खेल|” लेकिन धन्ना नहीं माना, वह हठ करने लगा| पंडित जी ने बहुत समझाया, टालने का बहुत प्रयास किया| परन्तु धन्ना के आगे पंडित
जी की एक न चली| जब बार -2 मना किया तो वह रोने लगा| तो पंडित जी घबरा गए कि
इसके माता-पिता कही रुष्ट ना हो जाए| उन्होंने टालने के लिए एक
पत्थर धन्ना को पकड़ा दिया और बोले ये भगवान शालिग्राम है इनकी पूजा किया करो| फिर धन्ना शालिग्राम को
पाकर बहुत खुश हुआ| और पंडित जी से कहा कि अब मुझे इसकी विधि भी बता दो कि पूजा
कैसे करनी है तो पंडित जी ने बताया कि ठाकुर जी को स्नान करवाना है, भोजन का भोग लगवाना है| मन्त्र तो तुम्हें आते नहीं
जो भजन याद हो वो बोल लेना| अब धन्ना ने कमरे में जाकर एक चौकी को साफ़ किया और वहाँ पर
भगवान शालीग्राम को विराजमान कर दिया| धन्ना उस दिन इतना खुश था
कि मानो उसे त्रिलोक की सम्पदा मिल गई हो| अगले दिन प्रात:काल
स्नानादि से निवृत होकर उसने भगवान को स्नान कराया, फिर चौकी पर विराजमान कर, उन्हें तिलक लगाया, और भगवान को प्रसन्न करने
के लिए भजन गाने लगे| भजन गाते-2 वे इतने प्रेम विभोर हो गए कि उनकी आँखो में से आँसू आने
लगे| फिर उनकी माता जी ने भोजन के लिए उन्हें बुलाया| तब वे उठकर रसोई में गए| और भोजन की थाली उठाकर कमरे
की ओर चल दिए| माता जी ने पूछा तो जवाब दिया कि पहले भगवान को भोग लगाऊंगा फिर भोजन करूँगा| बड़ी देर तक वह प्रतीक्षा
करता रहा कि भगवान अब भोग लगाएंगे परन्तु भगवान ने भोग नहीं लगाया| भक्त धन्ना ने सोचा कि
भगवान मेरी पूजा से प्रसन्न नहीं है| काफी देर तक प्रार्थना करने
के बाद भी भगवान अपनी जगह से न हिले| भक्त धन्ना ने भी प्रण कर
लिया कि जब तक भगवान भोग नहीं लगायेंगे मैं भी भोजन नहीं करूँगा| ऐसे करते-2 सात दिन बीत गए| रोज वह भोजन को माता-पिता
से छिपाकर खेतों में डाल आता| अब वह काफी दुबला-पतला हो गया| उसके माता- पिता चिंता करने
लगे कि हमारे बच्चे को कोई रोग हो गया है| धन्ना भक्त को अपनी
भूख-प्यास से ज्यादा चिंता इस बात की थी कि भगवान उससे अप्रसन्न है| आठवें दिन धन्ना ने यह
सौगंध खाली कि यदि आज भगवान ने भोजन का भोग नहीं लगाया तो वह अपने प्राण त्याग
देगा| भगवान ने उसकी पुकार सुन धन्ना को दर्शन दिए| अब भगवान ने बाजरे की रोटी
और साग का भोग लगाया| जब भगवान ने एक रोटी खा ली और दूसरी रोटी खाने लगे तो भोले
भक्त ने भगवान का हाथ पकड़ लिया और बोला कि सात दिन तक तो तुम मुझसे रूठे रहे, स्वंय भी भूखे रहे और मुझे
भी भूखा रखा अब खाने लगे हो तो अकेले ही खा रहे हो| क्या मुझे न खाने दोगे? तब भगवान मुस्करा दिए| उन्होंने थाली भक्त धन्ना
के हाथ में थमा दी| प्रेम से सने उस भोजन में भगवान को ऐसा आनंद आया कि वे
नित्यप्रति ही बाजरे की रोटी का भोग लगाने लगे| यही नहीं भगवान अपने भक्त
के साथ खेती बाड़ी के काम में भी भक्त की सहायता करने लगे| एक दिन उनके पंडित जी पुन:
भक्त धन्ना के घर गए तो वहाँ उन्होंने भक्त धन्ना से पूछा- “ भगवान की पूजा करते हो? भक्त धन्ना ने उत्तर दिया
कि आपके भगवान तो बड़े हठीले थे, परन्तु कम मैं भी नहीं था| उन्होंने मुझे सात दिन तक
बहुत तड़पाया लेकिन आठवें दिन उन्होंने भोग लगाया| पंडित जी को उसकी बात झूठी
लगी| तो धन्ना ने कहा कि महाराज आपने तो मुझे भगवान की तरफ लगाया है, आप से झूठ नहीं बोल सकता| अब पंडित जी को उसकी बातो
पर यकीन होने लगा और उनकी आँखो में से आँसू निकलने लगे वह धन्ना से कहने लगे कि
मुझे भी ठाकुर जी के दर्शन करवाओ| धन्ना ने कहा क्यों नहीं? अभी मैं तुम्हे उनके दर्शन
करवा देता हूँ| वे खेतों में गायें चरा रहे हैं लेकिन जब वे खेत में गए तो पंडित जी को तो
श्री कृष्ण जी नजर ही ना आये धन्ना उन्हें बताये कि श्री कृष्ण जी पेड़ के नीचे
बैठे है लेकिन पंडित जी को दिखाई न दे| अब पंडित जी की आँखो से
आँसू आने लगे कि यह सब मेरे अभिमान की वजह से हो रहा है| मेरी सारी पूजा दिखावे की
है तुम धन्य हो मैं अनपढ़- गंवार हूँ| यह कहकर वह रोने लगे| तब भक्त धन्ना ने भगवान से
विनती की कि प्रभु, पंडित जी को दर्शन दो| तब भगवान ने दर्शन देकर
पंडित जी को निहाल किया| भगवान के दर्शन कर पंडित का भी जीवन धन्य हो गया| धीरे -2 धन्ना का बाल्यकाल समाप्त
हो गया| भगवान ने उनके साथ बाल – क्रीडा करना बंद कर दिया| एक दिन भगवान ने उसे बताया
कि सतगुरु की शरण के बिना मानुष जीवन के वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती| इसलिए अब सतगुरु की शरण
ग्रहण करो| भगवान के वचन मानकर भक्त धन्ना ने उस समय के पूर्ण सतगुरु स्वामी रामानंद जी
की शरण में जाकर गुरु दीक्षा ली| और उनसे ज्ञान की प्राप्ति की| भोले भाव से सहजता के साथ ही इंसान प्रभु को पल
में ही प्राप्त कर सकता है लेकिन कोई अपनी चतुराई से भगवान को पाना चाहे तो जन्मों
जन्म तक व भगवान् को नहीं पा सकता है |
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