Monday, March 23, 2020

सच्ची पूंजी

 

सच्ची पूंजी

 

अपने सतगुरु की सेवा ही सेवक की सच्ची पूंजी है| सेवक को जो भी सेवा गुरु दरबार में मिले वह किसी भी सेवा को छोटा ना समझे| सेवक हर सेवा को अपने सतगुरु की आज्ञा मानकर प्राणपन से करें | हर सेवक के मन में सदैव यही भाव होना चाहिए कि मेरे सतगुरु की सेवा अनमोल रत्न के समान है |

 

श्री दूसरी पादशाही जी श्री गुरु महाराज जी के समय की बात है| कबरपट में श्री गुरु महाराज जी की निजी सेवा में स्वामी परम ज्ञानानंद जी थे | एक रात को सत्संग की समाप्ति के बाद श्री गुरु महाराज जी विश्राम करने लगे| गुरुदेव के पलंग के पास नीचे धरती पर स्वामी परम ज्ञानानंद जी भी सो गए | स्वामी परम जी ने एक अद्भुत स्वप्न देखा | इनके पूर्व आश्रम के सहपाठी ने स्वप्न में इनसे पूछा कि “मैं पढ़-लिखकर इतना बड़ा आदमी बन गया हूँ भला तुमने क्या पाया ?” इन्होने जवाब दिया – “मैं बड़ी सरकार की नौकरी करता हूँ|” उसने पूछा – “तुझे तंख्वाह क्या मिलती है ?” ये स्वप्नावस्था में ही कमरे में झाड़ू लगाने लगे और एक कोने में श्री महाराज जी के कमरे की चरण रज इकठ्ठा करके बोले – “मुझे ये वेतन मिलता है |” उस लड़के के पास एक सोटी थी, उसने इनका मजाक उड़ाने के लिए उस चरणरज को अपनी सोटी से ऊपर फैंक कर कहा – “तुझे ये तनख्वाह मिलती है ? तुमने तो अपनी इतनी उम्र गंवा दी |” अभी उसने पूरी तरह से ये शब्द कहे भी नहीं थे कि वह चरण रज तत्काल मोती और हीरे और जवाहरात बनकर चन-चन की आवाज करती हुई कमरे की फर्श पर बिखर गई | वो लड़का यह अद्भुत चमत्कार देखकर चकित रह गया | स्वामी परम जी वे हीरे-जवाहरात फर्श से चुनने लगे | उनका विचार था कि श्री महाराज जी के लिए इनकी माला बनाऊंगा | इतने में महाप्रभु ने करवट बदली और कहा –“ओ परम !” ये झट से उठकर खड़े होकर बोले – “जी हुजूर !” इनका स्वप्न समाप्त हो चुका था | अब ये चकित होकर इधर-उधर देख रहे थे कि हीरे कहाँ गए ? श्री सद्गुरुदेव जी अन्तर्यामी थे, इनके मन के भावों को जानकार बोले –“ क्या तुम्हे अब भी कोई शक है ? जो मेरे दरबार कि निष्काम भाव से सेवा करता है, उसके फलस्वरूप उसे अनमोल रत्न मिलते हैं |”

 

ऐसे ही श्री तृतीय पादशाही जी के समय की बात है, एक भक्त जिसने एक बार श्री मुख से ये वचन सुने कि जो कोई गुरु को प्रसन्न करना चाहता है, वह दिल जान से सेवा करे | शारीरिक भरण-पोषण की उसे चिंता ही क्या? उसका भार तो गुरु दरबार ने आरम्भ से ही अपने ऊपर ले लिया | बस! फिर क्या था? वह सेवा में ऐसा जुटा कि उसे यदि कोई बुलाता तो वह उत्तर देता-मेरे पास समय नही है | यदि उसे कोई आराम करने के लिए कहता तो यही उत्तर मिलता कि मेरे पास समय नही है | एक दिन अचानक श्री सतगुरु देव जी श्री कार पर वहां आ गए | सभी प्रेमी भोजन करके थोड़ा विश्राम के लिए छुट्टी किये बैठे थे | उसने भी भोजन किया था और पुनः सेवा में जुट गया | आपने वहां पहुँचकर सबको भोग प्रसाद दिया | तब भक्त जी को भी आवाज़ लगाई | उसे सेवा में यह पता ही न चला कि कौन आवाज़ लगा रहा है? उसने वही उत्तर दिया कि मेरे पास समय नहीं है | आप सेवा में उसकी तल्लीनता को देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए और स्वयं ही उसके पास प्रसाद भेज दिया | उसकी इस श्रद्धा, निष्ठा देखकर आपने फरमाया-“जो व्यक्ति हित-चित से गुरु दरबार की सेवा करता है वह अपनी मंजिल को शीघ्र ही प्राप्त कर सकता है |” पुनः उसे समीप बुलाकर खुब प्रसाद दिया और फरमाया-“ ठीक है! मानव जन्म के इस अवसर से पूर्ण लाभ लेना चाहिये | सेवक के लिए गुरु सेवा ही निजी पूँजी है | एक मिनट भी व्यर्थ नही गवाना चाहिये | शरीर को हमेशा गुरु कि सेवा में लगाए रखना चाहिये |” वह भक्त अपना प्रसाद लेकर व श्री वचन सुनकर नतमस्तक हो पुनः अपनी सेवा पर लौट गया |

 

श्री गुरु महाराज जी स्वयं निज मुख से फरमाते थे -----“हमने भी जो कुछ प्राप्त किया है, वह सब गुरु-सेवा से ही प्राप्त किया है | सेवा आधिभौतिक, आधिदैविक, आध्यात्मिक रोगों की औषध है | जो सद्गुरु आज्ञा करें, जीव उसको अपनी सम्पदा समझकर उन वचनों पर प्राणपन से जुट जाये तो कौन सी ऐसी शक्ति है जो उसके सम्मुख न झुकेगी अर्थात समस्त शक्तियां सद्गुरु के सेवक के समक्ष हाथ बांधें खड़े हैं |” सेवा ही सेवक की सबसे अनमोल पूंजी है |

 

 

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