Monday, March 23, 2020

समर्पण भाव

 

समर्पण भाव

 

सेवक में समर्पण के बिना उसकी भक्ति अधूरी है| जिस सेवक के अन्दर अपने स्वामी के लिए सम्पूर्ण समर्पण है वही अपने स्वामी की सच्ची प्रसन्नता हासिल कर पाता है| एक भक्त जिस का भगवान् के साथ अटूट प्रेम था वह रोज भगवान के लिए मंदिर में फूलों की टोकरी लेकर जाता था| उसका यह बहुत पुराना नियम था| एक दिन वह भक्त फूलों कि टोकरी लेने के लिए फूलों कि दूकान पर गया उस समय फूल वाले के पास एक ही टोकरी पड़ी थी उसी समय राजा का एक बंदा भी वहाँ पर आया और कहने लगा कि राजा ने फूलों की टोकरी मंगवाई है यह टोकरी मुझे चाहिए लेकिन वह भक्त अपना नियम नहीं तोड़ना चाहता था उसने उस व्यक्ति से कहा कि नहीं यह टोकरी मुझे अपने भगवान् के लिए चाहिए उसने फूल वाले को कहा कि मैं तुम्हे 1 रूपए कि जगह 10 रूपए देता हूँ उस व्यक्ति ने कहा कि मैं इसके 100 रूपए देता हूँ भक्त ने कहा कि मैं 1 हजार देता हूँ इस तरह बात हजारों में चली गई अब उस व्यक्ति ने कहा कि मैं 50 हजार देता हूँ उस भक्त ने कहा कि मैं 1 लाख देता हूँ यह सुनकर वह व्यक्ति चला गया तब उस फूल वाले ने उस भक्त से कहा कि तूने मेरा सौदा खराब कर दिया क्या तेरे पास इतना धन है तब उस भक्त ने कहा कि मेरे पास जो भी वह 1 लाख से अधिक है वो सब तुम्हारा है और ये टोकरी मेरी| अब जब वह भक्त उस टोकरी को लेकर जब श्री मंदिर में गया तब वहाँ भगवान् कि मूर्ति की जगह साक्षात् भगवान खड़े थे वह देख कर हैरान हो गया और भगवान् के दर्शन कर बहुत प्रसन्न हुआ तब उसने भगवान् से प्रश्न पूछा कि मैं कितने समय से आपको फूल अर्पित कर रहा हूँ आज तक आप नहीं आए लेकिन आज आप कैसे आ गए| तब भगवान् ने कहा कि जब तुमने अपना सर्वस्व अर्पण कर दिया तो मैं यह देख कर कैसे अपने आपको तुम्हारे अर्पण किए बिना रह सकता हूँ| अर्थात जब भक्त अपना सब कुछ भगवान् को अर्पित कर देता है भगवान् भी अपना सब कुछ भक्त पर लुटा देते है|

 

एक बार श्री गुरु महाराज जी श्री चौथी पादशाही जी जब महात्मा जी वेष में थे तब दरबार के किसी काम से किसी भक्त जी साथ में दिल्ली सरकारी दफ्तर में आये| श्री गुरु महाराज जी को भी जल्दी काम करवा कर श्री आनंदपुर लौटना था| जिस जगह पर काम होना था वहाँ पहले से ही बड़ी लम्बी लाइन लोगो की लगी हुई थी | वही दफ्तर के बाहर एक चपरासी बैठा हुआ था | श्री गुरु महाराज जी उसके पास गए और हाथ जोड़कर बोलने लगे कि हम श्री आनंदपुर दरबार से आये है हमारे आश्रम का कुछ काम है, आप से विनती है कि हम लाईन में नहीं लग सकते हमें जल्दी है तो हमारा काम करवा दे | तब उस चपरासी के मन में भाव उमड़ा कि आज तक तो किसी ने मेरे आगे हाथ नहीं जोड़े ये साधू महात्मा जी मेरे आगे हाथ जोड़ रहे है इनका काम जरुर करवाना है| वह चपरासी अंदर दफ्तर में चला गया| श्री गुरु महाराज जी के साथ जो भक्त जी थे उन्हें ये अच्छा नहीं लगा | तो उन्होंने आप जी कहा कि आप इतने बड़े महात्मा जी होकर एक नौकर के आगे हाथ जोड़ रहे हो |

 

तो श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि अभी  थोड़ा सब्र करो| वह नौकर अंदर गया और अंदर जाकर ऑफिसर से कहने लगा कि ऐसे-2 कोई संत जी आये है श्री आनंदपुर दरबार से | उनका काम है जोकि जरुर करना है| तभी  उन्होंने ऑफिसर से आज्ञा लेकर  आप जी को अंदर बुला लिया और आपका सारा काम भी करवा दिया | जब काम हो गया तब श्री गुरु महाराज जी ने साथ में जो  भक्त जी आये थे उन्हें फरमाया कि भक्त जी देखा खाली हाथ जोड़ने से हमारा काम इतना आसान हो गया है | अगर हम हाथ न जोड़ते तो शायद हमें लाइन में लगना पड़ता और हमारा समय भी लगता | हमारे हाथ जोड़ने से हमारा कीमती समय बच गया है | तो श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि दरबार के काम के लिए हाथ जोड़ना तो एक तरफ अगर शरीर भी लग जाए तो भी कम है| ये है अपने स्वामी के प्रति अपने दरबार के प्रति समर्पण भाव | हर सेवक के लिए यह प्रसंग प्रेरणादायक है |

 

ऐसे ही श्री गुरु महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी हर काम को पूर्ण रूप से किया करते थे और वे अपने सेवकों को भी यही  शिक्षा देते थे कि सेवक भी हर काम को पूर्ण रूप से करे| एक बार श्री परमहंस दयाल जी महाराज जी के स्वरुप के लिए हार बनाये गए उसमे मोती अच्छे नहीं थे श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया कि मोती अच्छे क्यों नहीं लगाये, क्या किसी चीज़ की कमी है? श्री गुरु महाराज जी यही चाहते है कि हर सेवा को भाव से और अच्छे से किया जाए|

ये उनका समपर्ण भाव है अपने बड़ों के लिए| जब तक सेवक में समर्पण नहीं है तब तक भक्ति में निस्वार्थ भाव नहीं आ सकता |

 

एक बार श्री गुरु महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी के पास एक भक्त मत्था टेकने आया| उसने श्री चरणों में विनती की कि –‘स्वामी जी! मेरी कुड़ी दा व्याह है|’ स्वामी जी ने फरमाया –‘सानु की?’ वो भगत हैरान हो गये कि स्वामी जी क्या फरमा रहे है| उसने फिर विनती  की –स्वामी जी! मेरी कुड़ी दा व्याह है| फिर स्वामी जी ने फरमाया कि-‘सानु की?’ इस बार भगत जी के मन में ख्याल आया कि मेरी की जगह त्वाडी बोलना चाहिए| उन्होंने फिर विनती की-स्वामी जी! त्वाडी कुड़ी दा व्याह है| श्री स्वामी जी मुस्कराए और फरमाया कि –‘फिर तैनू की?’ अब यहाँ कितनी सिखने वाली बात है कि जब सेवक के मन में पूर्ण समपर्ण भाव नहीं तब श्री गुरु महाराज जी क्या वचन फरमा रहे है लेकिन जब भक्त जी ने पूर्ण समर्पण भाव से ये कहा कि स्वामी जी आपकी कुड़ी दा व्याह है तो श्री गुरु महाराज जी क्या फ़रमाया कि फिर जब आपने सब हमें सौप दिया तो फिर आप क्यों चिंता करते हो | फिर तो हम अपने आप सब कुछ करेंगे| सतगुरु के हर सेवक के मन में यह समर्पण भाव होना चाहिये कि मेरे जीवन की हर वस्तु हर पदार्थ मेरी हर स्वांस मेरे सतगुरु की ही है|

 

 

*****

 

 

No comments:

Post a Comment