Monday, March 23, 2020

सहनशीलता

 

सहनशीलता

 

सेवक के मन में सहनशीलता होना बहुत जरुरी है| जब सेवक सेवा में होता है तो उसके जीवन में ऐसा अवसर कई बार आता है कि जब उसे सेवा करते- करते शारीरिक व मानसिक दुखों से उलझना पढता है| लेकिन जिनका सतगुरु पर पूर्ण विश्वास होता है वह सहजता के साथ हर दुःख सहन कर लेते है | सेवक शारीरिक दुःख से ऊपर उठ कर अपनी मान बढ़ाई को त्याग कर, अहंकार रहित होकर निष्काम भाव से जब सेवा करता है तभी उसकी सेवा रंग लाती है | ऐसे सेवक तो सतगुरु के मन में हर समय वास करते है

 

इसी बात का प्रमाण है की एक बार श्री तीसरी पादशाही जी ने श्री चौथी पादशाही जी को(साधु वेष में) किसी सरकारी कार्य के लिए गुना भेजा | अभी कार्य पूरा नहीं हुआ था कि श्री आनंदपुर से श्री गुरु महाराज जी ने गुना में आपको यह आज्ञा भेजी की रात्रि तक श्री आनंदपुर अवश्य पहुँच जाए, यहाँ कोई आवश्यक काम है | श्री आज्ञा पाकर आपने शीघ्र ही वह कार्य निपटाया | और सरकारी कार्यलय से स्टेशन जाने के लिए छोटा मार्ग पकड़ा | आप रेलवे लाईन के साथ तेज-2 कदम चलने लगे | उन दिनों भाप से चलने वाले इंजन हुआ करते थे और उनमें कोयले का प्रयोग किया जाता था | एक स्थान पर उन कोयलों के राख रेलवे लाइन के किनारे पड़ी हुई थी | जिसमे जलते अंगारे अभी मौजूद थे | स्टेशन पर जल्दी पहुँचने के ख्याल में आपको राख के पड़े होने का पता न चला और आपके श्री चरण एक कोयले पर पड़ गये | उस गर्म राख के कारण आपके सुकोमल श्री चरण झुलस गए तथा पीड़ा होने लगी | परन्तु आपने इसकी परवाह नहीं की | थैले में से कपड़ा निकालकर आपने बाँध लिया | स्टेशन पर पहुँचे ट्रेन पकड़ी और अशोकनगर जा पहुँचे | वहाँ पर एक प्रेमी ने विनय की कि आप पहले इसकी चिकित्सा करा लीजिये, कल प्रातः श्री आनंदपुर चले जाएँगे परन्तु उस समय तो आपके लिए आज्ञा मुख्य थी | आप बिना चिकित्सा कराए बस में बैठकर श्री आनंदपुर पहुँच गए | रात्रि को दर्शन खुलने से पहले आप दर्शन हॉल में जा बैठे| जब दर्शन खुले तो आपने श्री गुरु महाराज जी को उस सेवा का सम्पूर्ण वृतांत प्रस्तुत किया | आपका प्रयत्न यह था कि पाँव के झुलस जाने के बारे में श्री गुरु महाराज जी को पता न चल सके | जब आप मत्था टेक कर लौट रहे थे तो किसी प्रेमी ने श्री गुरु महाराज को आपके पैर के झुलस जाने के बारे में बताया | महाराज जी ने दुबारा आपको बुलाया और चोट के बारे में पूछा फिर वचन फरमाए ‘इतनी क्या जल्दी थी यहाँ पहुँचने की? पहले चिकित्सा करवा लेते | हमें आपकी सहनशीलता देखकर अचम्भा हो रहा है, क्योंकि पाँव जल जाने पर आपने उफ़ तक नहीं की |’ आपने विनय की-‘प्रभु! यदि चिकित्सा करवाई जाती तो श्री आज्ञा का पालन कैसे होता? इस शरीर पर तो ये कष्ट आते रहते है |’ फिर श्री गुरु महाराज जी ने फरमाया –अच्छा! अशोकनगर जाकर पहले इसकी चिकित्सा करवाओ | आपके साथ महात्मा विचार प्रकाशानंद जी को आपकी सेवा के लिए भेज दिया | आपने वहाँ जाकर चिकित्सा करवाई और कुछ दिनों बाद स्वस्थ होकर आप दुबारा सेवा में संलग्न हो गए | यहाँ सहनशीलता का कितना बड़ा प्रमाण हमारे सामने है अपने कष्टों की परवाह न करते हुए श्री गुरु महाराज जी श्री चतुर्थ पादशाही जी गुरु आज्ञा का पालन किया|

 

भगवान बुद्ध के एक पूर्णा नामक शिष्य थे| यह भक्त अमली कार्यवाही कर रूहानी प्रचारक बने| उन्होंने भगवान बुद्ध से ‘स्वर्न्प्रनता द्वीप’ में धर्म प्रचार के लिए जाने की आज्ञा माँगी| तो भगवान बुद्ध जी ने कहा कि- “उस प्रान्त के लोग जो अत्यंत कठोर तथा क्रूर है तुम्हारी निंदा करेंगे| तुम्हे कैसा लगेगा?” भक्त पूर्ण- प्रभु| मैं आपके आशीर्वाद से आपके द्वारा मिली अध्यात्म विद्या तथा शांति द्वारा उनकी उदंडता पर विजय प्राप्त कर लूँगा| मैं खुद को भी सांत्वना दूँगा कि वे भले लोग है क्योंकि वे मुझे मार तो नहीं रहे|

भगवान बुद्ध - यदि वे पत्थर तथा डंडे मारे तो क्या करोगे?

भक्त पूर्ण –तो भी मैं समझूंगा कि वे दयालू है, शस्त्र तो नहीं उठा रहे|

भगवान बुद्ध - यदि वे शस्त्र प्रहार करे तो क्या करोगे?

भक्त पूर्ण- इसमें भी मुझे आपकी कृपा दिखेगी| मैं सोचूंगा कि उन्होंने दया कर मेरा वध तो नहीं किया

भगवान बुद्ध - ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वे तुम्हारा वध नहीं करेंगे|

भक्त पूर्ण- भगवान, तब मैं सोचूंगा कि संसार दुःख रूपी है और शरीर नाशवान है| उन्होंने मुझे शरीर से छुटकारा दिलाकर मुझ पर उपकार किया है| वे लोग बहुत अच्छे सिद्ध होंगे|

भगवान बुद्ध – शाबाश| तुझ में सहनशीलता , धैर्य तथा साहस के गुण चरम सीमा तक पहुँच चुके है| तुम निश्चय ही सफलता प्राप्त करोगे| तुम्हें आज्ञा है तुम जा सकते हो| उनकी भक्ति प्रचार से, तथा सहनशीलता और धैर्य से तथा आदर्शमयी जीवन से वहाँ के पुरुषों का पावन हृदय भी कोमलता और भक्ति भावना से भर गया, उन लोगों का जीवन भी सुधर गया| सेवक के मन में सहनशीलता अति आवश्यक है | जो सेवक सहनशील है वे अपनी मंजिल को सहज में ही प्राप्त कर लेते है |

 

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