सुख की तलाश
दुनिया में हर इंसान, सुख और शांति का तलबगार हैं |
मगर मिलता नहीं उसे सुख , वो दुःख और गम से बेजार है ||
सही मायने में उस व्यक्ति के, दिल में ख़ुशी समाई हैं |
जिसने जग कि तृष्णा छोड़ कर, मालिक से प्रीत लगाई है ||
इस संसार में हर इन्सांस सुख चाहता है जिसके लिए वह तरह-तरह के साधन अपनाता
हैं, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करता हैं ताकि उसे सुख मिल सके लेकिन देखने में
यही आता हैं कि अपार धन सम्पति व साधन इकठ्ठे होने के बाद सुख प्राप्त नहीं कर पाता| परम संत
तुलसीदास जी के वचन हैं कि
सुख के साधन बहुत किये दुःख का किया ना कोए |
तुलसी से आश्चर्य, और अधिक-अधिक दुःख होए ||
इंसान सुख के लिए साधन तो इकठ्ठे करता है लेकिन उसके बाद भी उसके दुःख कम नहीं अपितु बढ़ते ही जाते है क्यूंकि
जिन साधनों कि वह कामना करता हैं वह सब नश्वर और नाश होने वाली वस्तुएँ हैं उनको
अपने मन में बसाने वह उनकी कामना से तो दुःख ही हाथ आएंगे| उधारण के तौर पर अगर हम
अखरोट के अंदर वाले हिस्से कि जगह बाहर का छिल्का खाए तो वह नुकसान करेगा, अगर
केले के अंदर के हिस्से कि जगह भरा का छिल्का खायेंगे तो वह नुकसान करेगा, अगर नाव
पानी में चल रही हैं तब तो थक है लेकिन अगर पानी नाव में चला जाये तो वह डूब
जाएँगी तो कहने का मतलब यहाँ है कि अगर संसार कि वस्तुएँ को अपने मन में बसाते हैं
उनसे लगाव करते हैं तो वह अपना कुछ ना कुछ प्रभाव हमारे अंदर ज़रूर करेंगे| लेकिन
मालिक का सच्चा नाम जो हमारे अंदर ही विद्यमान है उसको हम काम , क्रोध , लोभ, मोह,
अहंकार, कि बेड़ियों में फँस कर भूल गए| जो सबसे ज्यादा सुख देने वाली चीज़ हैं
मालिक का नाम| वो हमारे घट में ही विद्यमान हैं| लेकिन उसकी ख़ोज इंसान सांसारिक वस्तुओं
में कर रहा हैं |
भगत हीन गुण सब सुख ऐसे |
लवन बिना बहु बिंजन जैसे ||
यदि किसी व्यक्ति में अनेको गुण हो लेकिन भक्ति का गुण ना हो तो भगवान कि
दृष्टि में कौड़ी के बराबर हैं यदि केवल भक्ति का गुण हो तो वह भी अनेको गुणों से
भी बढ़कर है| जिस प्रकार नमक के बिना सभी व्यंजन फीके लगते हैं अथवा चाँद के बिना
सितारों जड़ित आकाश भी शोभायमान नहीं होता, इसी प्रकार भक्ति के बिना अनेकों गुण
किसी काम के नहीं, क्यूंकि भक्ति ही मानुष जीवन का सुंदर श्रृगार हैं| कथन हैं कि –
दुर्लभ जन्म को पाकर बन्दे, कुछ तो जरा विचार कर |
कौड़ी बदले हीरे जनम को , यूँ ही ना बेकार कर ||
ऐसा जन्म अमोलक पाया , कुछ नेक कमाई कर ले तू |
भजन प्रभु का कर के बन्दे, जीवन सफल बना ले तू ||
यही हैं अवसर यही है वेला, नाम प्रभु का ध्या ले तू |
अंत में होगी संग साथी, परलोक का तशा बना ले तू ||
भक्ति का रंग एक ऐसा रंग है जो अगर एक बार चढ़ जाये तो फिर कभी नहीं उतरता |
सांसारिक रंगों कि बात करे तो वो तो एक या दो दिन में उतर जाते हैं लेकिन जो भक्ति
के रंगों में भीग जाता हैं उसका अलग ही मज़ा होता है | कहते हैं अगर गीले कपड़े पर
माचिस की तीली लगाई जाये तो वह बुझ जाएगी और कपड़े पर कोई असर नहीं होगा| ठीक इसी
तरह अगर इंसान भी भक्ति में भीगा पड़ा हो तो संसार की आग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती
|
प्रभु नाम अमृत भरा, जो पीवे तृप्ताय|
सुखी बसे संसार में, और परम पद पाए ||
एक बार एक तेली (जो कि सरसों के तेल का व्यापार करता है) किसी के घर गया वहाँ
उसने जब भोजन खाया तब उसे भोजन बहुत अच्छा लगा| और उन घरवालों से कहने लगा कि इतना
स्वादिष्ट भोजन मैंने कभी नहीं खाया यह भोजन इतना स्वादिष्ट कैसे बना| तब उन्होंने
बताया कि इस भोजन को देसी घी में बनाया गया है इसलिए यह इतना स्वादिष्ट है| तब उस
तेली ने कहा कि देसी घी का खाना इतना स्वादिष्ट होता है मुझे तो आज पता चला है अगर
मुझे पहले पता होता तो मैं तो तेल में कभी खाना ही नहीं खाता | हमेशा देशी घी में
ही खाना खाता| ठीक उसी प्रकार जब तक इंसान को भक्ति के सुख के बारे में पता नहीं
होता तब तक वह भक्ति नही करता| लेकिन जब भक्ति का आनंद प्राप्त होता है तो फिर उसे
पता लगता हैं कि मैंने तो बहुत देर कर दी इस भक्ति में तो बहुत आनंद भरा हुआ है| कुदरत
की रचना में सब चीज़े पाई जाती है और हर चीज़ की अपनी-अपनी तासीर है, अपना-अपना गुण
है | पानी की तासीर है ठण्डक देना वाली है और आग की तासीर हैं तपश देने वाली है, इसी
तरह भक्ति की जो तासीर है वह शान्ति और
सुख प्रदान करने वाली है और माया की तासीर दुःख और आशांति पैदा करने वाली है|
भक्ति कि तासीर का ज्ञान इंसान को सत्संग में जाकर होता है वही जाकर ही जीव भक्ति
के सच्चे आनंद का अनुभव होता है| महापुरुषों के वचन है कि
बड़ी खुशकिस्मती में मिली तुझे ये ज़िन्दगी |
इस ज़िन्दगी को पाकर तू करले मालिक की बंदगी ||
अगर ना कि बंदगी तो फिर किया ही क्या |
ऐशों- इशरत में गया वक़्त हाथ फिर आया ही क्या ||
ये वक्त नहीं मिला युहीं गवानें के लिए |
ये गरीमत वक़्त मिला तुम्हे मालिक को पाने के लिए ||
मतलब यह है कि सही मायने में यह जो जीवन हमें मिला है कुछ विशेष काम करने करने
के लिए हमें मिला है मालिक की भक्ति के लिए मिला है लेकिन इंसान ऐशो –आराम में फंस
कर ईश्वर के नाम को और अपने लक्ष्य को भूल चुका है| कहते भी है कि-
आये थे जिस काम को, भूल गए वो बात|
क्या ले मिलये राम से, जब खली दोनों हाथ||
लेकिन इस बारे में कोई विचार तक भी नहीं करता कि क्या हमारा उद्देश्य है अगर मालिक
की भक्ति भी करते है तो वो भी सांसारिक वस्तुओं की कामना के लिए करते है| परमसंत
कबीर जी की वाणी है कि
ऐसी दीवानी दुनिया, भक्ति
भाव नही बूझै जी|
कोई आवे तो बेटा माँगे, भेट
रुपैया लीजै जी||
कोई आवै दुःख का मारा, हम पर
किरपा कीजै जी|
कोई आवे तो दौलत मांगै, यही
गुसाई दीजै जी||
कोई करावे ब्याह सगाई, संत
गुसाई रीझै जी|
साँचे का कोई ग्राहक नाही, जूते जगत
पतीजै जी||
कहे कबीर सुनो भाई साधो, अंधों को क्या कीजै जी||
एक बार बादशाह शाह जहाँ के सामने किसी ने सत्पुरुष
गुरु नानक जी के वचन बताए कि परमात्मा को सबका ध्यान है और सब कार्य उनकी दृष्टि
में ही हो रहे है और जिससे जो चाहता है कर्म करवाता है| बड़ों से बड़ा वह परमात्मा
अपनी विस्तृत सृष्टि के जीवों को कार्य में लगाता है| यदि वह अपनी नजर उल्टी कर ले
तो बादशाहों को भी घसियारे जैसा कंगाल बनादे यहाँ तक कि उन्हें द्वार-२ माँगने पर
भी भीख ना मिले| सत्पुरुषों के वचन तो धुर के वचन होते है तीनों कालों में सत्य
होते है परन्तु शाहजहाँ उस समय चूँकि राजमन्द में चूर था, अत: वह इन वचनों का मजाक
उड़ाते हुए बोला-बादशाह हो और दर -२ माँगने पर भी भीख ना मिले| ऐसा भी कभी हो सकता
है? ये भी मानने और विश्वास करने योग्य वचन है क्या? किन्तु इसके कुछ दिनों के
उपरान्त जब उसके अपने ही पुत्र औरंगजेब ने उसे बंदी बना लिया और औरंगजेब जेब के
सिपाही जब उसे ले जा रहे थे उस समय मार्ग में यद्यपि उसे प्यास बहुत सता
रही थी परन्तु बार -२ माँगने पर भी किसी ने एक घूँट पानी न दिया| उस समय उसे श्री
गुरु नानक देव जी के वचन याद आए और उस समय उसे समझ आई कि सत्पुरुषों के वचनों में
किस कदर सच्चाई है और सृष्टि का मालिक क्या कर सकता है| असल में इंसान पर माया का
जो पर्दा डला हुआ है जिस कारण वह वह माया के पदार्थों को छोड़ना ही नहीं चाहता| अगर
किसी को मालिक की भक्ति के लिए कहा भी जाए तो यही सुनने को मिलता है कि हमारे पास
समय नहीं है हमें सांसारिक कार्यों ने घेर रखा है|
कहते है
कि एक बार एक मदारी ने बंदर को पकड़ने की तरकीब निकाली उसने सड़क के बीच में एक मटका
रखा जिसके अंदर कुछ चने डाल दिये| जब बंदर ने मटके में चने देखे तो उसने अपना हाथ
मटके में डाला| जब चने उठा कर मुट्ठी बंद करके हाथ बाहर निकलने लगा तो मटका टाईट
था| उसका मुँह टाईट होने के कारण बंदर मुट्ठी समेत हाथ बाहर नहीं निकाल पाया| तो
बंदर ने यही सोचा की मटके ने मेरे हाथ को पकड़ लिया है जबकि उसे ये नहीं पता की
उसने खुद ही अपना हाथ मुट्ठी बंद करके फँसा रखा है| ऐसी ही संसार की हालत है लोग
कहते है कि संसार की मोह माया ने हमें फँसा रखा है| लेकिन ये नहीं पता की खुद
संसार में अपने आप को फँसा रखा है| लेकिन अपनी अज्ञानता वश इंसान भूला पड़ा है और माया
की बेड़ियों में खुद ही जकड़ा हुआ है|
परमात्मा का नाम ही इन बेड़ियों से बचाने वाला है
कहते है अगर हमें संसार में कोई वस्तु खरीदनी है तो हमें उसका मूल्य देना पड़ता है
इसी तरह भगवान् को पाने का भी मूल्य इंसान को देना पड़ता है| वह मूल्य है भगवान् के
श्री चरणों की सेवा, उनसे प्यार करना और परमार्थ के पथ पर चलना| ये सब अच्छाईयाँ
इंसान को भगवान् के करीब लाती है कहते है कि अगर किसी का पेड़ अपना हो जाए तो उसे
छाया के लिए प्रयास नहीं करना पड़ता, इसी तरह से से किसी का सूरज अपना हो जाए तो
उसे प्रकाश के लिए प्रयास नहीं करना पड़ेगा| ठीक इसी तरह अगर भगवान अपने बन जाए तो
संसार की हर चीज अपनी हो जाएगी क्योंकि वो तो वैसे ही पूरे संसार का मालिक है|
जन्म जाय जो भक्ति में, सो ही सफल कहहिं|
भक्ति बिना मानुष जनम, कहो किस लेखे माहिं||
जो स्वांस हमारे मालिक की याद में बीते सही मायने में वही सफल कहलाते है बाकि
तो सारे स्वांस हमारे व्यर्थ हो जाते है| कहते है कि पहले तो मानुष तन मिलना ही
बड़ा मुश्किल है फिर मानुष तन मिलने के साथ इंसान को भक्ति वाला माहौल भी मिल जाए
तो यह तो सोने में सुहागा वाली बात है वचन भी है-
सुत दारा अरु लक्ष्मी, सब काहू के होय |
संत समागम हरि कथा तुलसी दुर्लभ दोय ||
कि धन सम्पति तो हर किसी के पास होती है लेकिन संतो का संग, भगवान की कथा
सुनना, ऐसा अवसर बहुत मुश्किल से प्राप्त होता है इसके लिए भगवान की कृपा की
आवश्यकता होती है भगवन शिवजी माता पार्वती को वचन करते है कि
गिरजा संत समागम हरि कथा, सम लाभ न कछु आन|
बिन हरि कृपा ना पावहिं, गावत वेद पुराण||
भक्ति ही सही मायने में सभी सुखों की खान है अब जिस भक्ति को करने से सारे
दुःख दूर हो जाते हो वह भी इतनी सोखी तो होगी नहीं उसके लिए इंसान को अपने मन को
साफ करके, अपने सांसारिक कामों में से कुछ समय निकालना पड़ता है| अगर हम भगवान के
लिए समय निकालेंगे तो वो भी हमारे लिए समय निकालेंगे और हमेशा अपनी कृपा दृष्टि
बनाए रखेंगे| कहते है किसी ने भगवान से कहा भगवान हम पर दया करों भगवन ने कहा पहले
दया शब्द का उलटा करों तो क्या बनता है याद| याद बनाए रखों दया सदा बनी रहेंगी|
अगर हम संसार में किसी की के यहाँ काम करते है तो हमें मजदूरी मिलती है ऐसे ही
भगवान भी किसी का हक़ नहीं रखते| वचन भी है –
जगत मजदूरी देत है फिर क्यूँ राखे भगवान|
इन्सान वैसे तो बड़ा समझदार बनता है जहाँ कहीं लाभ की वस्तु मिले या कहीं फायदा
नजर आये तो उस अवसर को हाथ से जाने नहीं देता| अपनी सुविधा के लिए कई साधन जोड़ता
है लेकिन जो सच्चा धन है मालिक के नाम का उसको वह भूल ही चुका है| या कोई कभी याद
दिलाये तो यही कहता है कि अभी कोई समय है भगवान की भक्ति करने का, भक्ति तो बुढ़ापे
में होती है अब यह विचार करों कि इन्सान को इस बारे में क्या पता है कि कब तक उसने
संसार में रहना है, इंसान के जीवन की तो एक पल भी खबर नहीं है| इस बात को हमेशा
याद रखो कि जीवन का कुछ भरोसा नहीं है यह तो एक सपने की तरह है पता नहीं कब ख़त्म
हो जाए| कबीर साहिब जी के वचन है
उठों जागों सोओ मत मत करों नींद से प्यार |
जैसा सपना रात का वैसा ये संसार ||
इंसान को भगवान् ने विवेक, बुद्धि, ज्ञान सब कुछ दिया| अब विचार उसने करना है
कि सही मायने में सच क्या है और सच्चा सुख जिसकी तलाश हम संसार में सांसारिक
पदार्थों में कर रहे है वह कहाँ पर है| भगवान ने इतना सुंदर शरीर दिया है जिससे हम
संसार में रह कर वह सत् कर्म कर सकते है जिसके लिए हम सही मायनों में संसार में
आये है| भगवान की हवा, पानी और पदार्थ हम इस्तेमाल करते है तो हमारा भी फर्ज बनता
है कि जो हमें इतना कुछ देने वाला है उसका शुक्रिया अदा करे और जितना भी हो सके मालिक
को याद करे| चौबीस घंटे भगवान ने हमें एक दिन में दिए है 23 घंटे संसार को देते है
तो कम से कम 1 घंटा उस मालिक के लिए भी जरुर निकाले अगर हम नित्य प्रति ऐसा करेंगे
तो मालिक की प्रसन्नता जरुर प्राप्त होगी और हमारे सारे काम अपने आप ही बनते चले
जायेंगे|
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