जिसके ऊपर तू स्वामी
जिसके सिर ऊपर तू स्वामी, सो
दुःख कैसा पाये। जिसके सिर पर भगवान का
हाथ है वह हर दुःख से मुक्त है। उसे कोई
चिंता नहीं सता सकती। दुखों के रहते भी वह
आनंद महसूस करता है। हर समय वह मालिक का
शुक्र अदा करता है कि हे मालिक तू जिस हालत में हमे रखे, सुख
में दुःख में, हमें स्वीकार है
पर अपना हाथ सदा हमारे सिर पर रखना क्यूंकि ये हाथ अगर हमारे सिर पर रहेगा तो हम
संसार के हर दुःख को हँसते हँसते सहन कर लेंगे।
पिता से माता सो गुना, माता
से हरी कोसो गुना कि जितना प्यार एक पिता अपने बच्चे से करता है उससे सो गुना अधिक
प्यार उस बच्चे की माता का होता है और उस माता से भी कोसो गुना अधिक प्यार भगवान
का होता है। यह प्रीती एक तरह की नहीं
होती। उदहारण के लिए जैसे मछली जल के लिए
तड़पती है लेकिन जल कभी मछली के लिए नहीं तड़पता।
लेकिन भगवान और भक्त की प्रीती इससे बिलकुल अलग है। यहाँ जितना भक्त तड़पता है भगवान के लिए उससे कई
गुना अधिक भगवान भक्त के लिए तड़पते हैं।
जिस तरह भक्त अपने भगवान के लिए आंसू बहाता है इसी तरह भगवान की आँखों में
भी अपने भक्त के लिए आंसू आ जाते हैं वो भी अपने भक्तों को हमेशा याद रखते हैं।
इतिहास भी इस बात का साक्षी है कि सदियों से ये रीत चली आई है कि जब-२
भक्तों ने मुसीबत में भगवान से मदद मांगी, भगवान
ने आकर के अपने भक्तों की लाज बचाई।
महाभारत के युद्ध के समय की बात है जब कौरव और पांडव आपस में युद्ध कर रहे
थे तो बड़े -२ योद्धा युद्ध में कौरवों और पांडवों की तरफ से युद्ध लड़ रहे थे। जीत हमेशा सच की होती है और जिस युद्ध की कमान
भगवान ने संभाल राखी हो तो वहां भगवान ही हर कार्य को करते हैं। पांडवों के साथ
भगवान श्री कृष्णा जी थे। अतः युद्ध में
पलड़ा पांडवों का भारी रहा। कौरव युद्ध
हारने लगे। तभी की बात है भीम का पुत्र
घटोच्कच , उसका पुत्र
बरबरीक युद्ध लड़ने के लिए निकल पड़ा। उसको
पता था की कौरव और पांडव दोनों आपस में युद्ध कर रहे हैं। उसने मन में यही सोच रखा
था कि जो भी पक्ष हार रहा होगा मैं उसी पक्ष की तरफ से युद्ध करूँगा यह बहुत
शक्तिशाली था। भगवान श्री कृष्णा जी जानते
थे कि अगर बार बरबरीक युद्ध करेगा और वह जिस पक्ष की तरफ से लड़ेगा यह पक्ष ज़रूर
जीतेगा। कृष्ण जी ये भी जानते थे कि
बरबरीक युद्ध में उसी पक्ष की तरफ से लड़ने जा रहा है जो पक्ष हार रहा है। उस समय
कौरव हार रहे थे। बरबरीक के अंदर इतनी
शक्ति थी कि वह एक दिन में युद्ध ख़तम कर सकता था।
भगवान ने अपने भक्त की लाज तो बचानी थी, उन्होंने
लीला रचाई। बरबरीक जब युद्ध लड़ने जा रहा
था तब श्री कृष्ण भगवान जी उससे मार्ग में मिले और उससे पूछने लगे कि कहाँ जा रहे
हो। तब बरबरीक ने बताया कि मैं युद्ध लड़ने
जा रहा हूँ और जजों पक्ष हार रहा होगा उसकी तरफ से ही लडूंगा और उसी पक्ष को
जीतवाऊंगा। श्री कृष्ण जी ने कहा कि पहले
अपनी शक्ति का कुछ नज़ारा दिखाओ। तब बरबरीक
ने कहा कि ठीक है महाराज, वहीँ पर श्री
कृष्ण भगवान जी किसी वृक्ष के नीचे खड़े थे, बरबरीक
ने कहा कि मैं अपने तीर से इस वृक्ष के जितने पत्ते हैं सबमें छेद कर दूंगा। बरबरीक ने तीर छोड़ा और वृक्ष के जितने पत्ते थे
सब में छेद हो गया। भगवान श्री कृष्ण ने
एक पत्ता वृक्ष का तोड़कर अपने चरणों के नीचे छुपा लिया था। लेकिन बरबरीक के तीर में इतनी ताकत थी कि वह
वृक्ष के पत्तों में छेद करता हुआ श्री कृष्ण जी के चरण के पास आकर रुक गया।
तब बरबरीक ने विनती की कि आप हैट जाएँ नहीं तो ये तीर आपके चरण में लग जायेगा। श्री कृष्ण जी ने तब अपना पैर हटा लिया। श्री कृष्ण जी ने बरबरीक से कहा की तुम इतने शक्तिशाली हो यह शक्ति कहाँ से मिली। तुम्हारा गुरु कौन है तब बरबरीक ने कहा कि गुरु तो मेरा कोई नहीं है। श्री कृष्ण जी ने फ़रमाया कि बिना गुरु के ज्ञान अधूरा है। गुरु तो तुम्हें बनाना पड़ेगा। तब बरबरीक ने कहाँ कि मैं गुरु किसे बनाऊं आप ही इतने ज्ञामवान लगते हैं आप ही मेरे गुरु बन जाइये। तब श्री कृष्ण ने कहा कि मैं गुरु बनने के लिए तैयार हु लेकिन तुम्हें गुरु दक्षिणा पहले देनी पड़ेगी , वचन दो। बरबरीक ने गुरु दक्षिणा देने के लिए वचन दे दिया। तब श्री कृष्ण जी ने बरबरीक से कहा कि मैं चाहता हूँ कि तुम गुरु दक्षिणा के रूप में मुझे अपना सिर काट कर दे दो। उसी समय बरबरीक ने अपना वचन पूरा किया और श्री कृष्ण जी को अपना सिर काट कर दे दिया। भगवान ने यह लीला इस लिए रचाई थी क्यूंकि भगवान जानते थे कि बरबरीक युद्ध करेगा तो पांडव हार जायेंगे। अपने भक्त अर्जुन की लाज बचाने के लिए यह लीला रचाई। अब बरबरीक ने अपना सिर श्री कृष्ण को सौंप दिया। साथ ही उसने यह विनती की कि 'हे प्रभु मैं तो युद्ध लड़ने जा रहा था पर अब युद्ध तो नहीं लड़ सकता , कृपा करके मुझे युद्ध तो दिखा दो। ' तब श्री कृष्ण जी ने एक बांस के डंडे पर उसका सिर रख दिया और कहा कि जितने दिन भी युद्ध चलेगा तुम यह युद्ध देख सकते हो। इस तरह उसने सारा युद्ध देखा। जब युद्ध समाप्त हुआ पांडव जीत गए। तब भगवान श्री कृष्ण जी बरबरीक के पास गए। उससे पूछा कि तुमने युद्ध देखा तब बरबरीक ने कहा जी महाराज आपकी कृपा से सारा युद्ध देखा। तब श्री कृष्ण जी ने पूछा कि बताओ युद्ध में सबसे शक्तिशाली योद्धा कौन था। तब बरबरीक ने कहा हे प्रभु मुझे पूरे युद्ध में एक भी व्यक्ति शक्तिशाली नज़र नहीं आया। कृष्ण ने कहा युद्ध में तो बहुत बड़े -२ योद्धा थे। बरबरीक ने जवाब दिया हे प्रभु इस युद्ध में सभी ने अस्त्र- शास्त्र उठा रखे थे लेकिन सारा काम तो आप कर रहे थे। हर जगह मुझे आपका सुदर्शन चक्र चलता नज़र आया। कौरवों की सेना के सभी योद्धा आपके ही चक्र द्वारा मारे गए। अर्थात सब कुछ भगवान ने स्वयं किया। किसके लिए सिर्फ और सिर्फ अपने भक्त की लाज बचाने के लिए, भगवान ने अर्जुन के सिर पर अपना हाथ जो रख दिया। अब उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता था।
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