जग में जीना
जग में जीना है भला जब लग हृदय नाम
नाम बिना जग जीवना, सो दादू किस काम ।।
महापुरूषों के वचन है कि जग में बेशक रहो, संसार के काम भी करो लेकिन अपने
मन में इस बात को हमेशा याद रखो कि सच वस्तु केवल और केवल मालिक का नाम है। जिसने मालिक
के नाम को जाना उसने सब कुछ जाना और जिसने मालिक के नाम को नहीं जाना वो सब कुछ जान
कर भी अनजान ही कहलायेगा । नाम जो है वो त्रेता युग में भी था, द्वापर में भी था, कलयुग
में भी है और आगे भी रहेगा। वेदों में, ग्रन्थों में, पुराणों में हर जगह इस नाम की
महिमा गाई गई है। हर वस्तु का कुछ ना कुछ आधार होता है जैसे मछली का आधार पानी है उसी
तरह इस जीवन का आधार नाम है, सही मायनों में मालिक ने शरीर दिया ही नाम सुमिरण के लिए
है लेकिन इन्सान जो है अपना पूरा जीवन संसार के लोगो को समझने में, बेकार के कामों
में, दुनिया के झूठे नज़ारों को देखने में व्यतीत कर रहा है। अपना सम्बन्ध पूरा जीवन
उन्हीं से बनाता है जिन्होने एक दिन हमें छोड़ देना है विचार करने वाली बात है कि जो
व्यक्ति शरीर छोड़ कर जाता है वो ना तो कभी वापिस आता है और ना ही हम उससे फिर कभी
मिल पाते है। फिर भी इंसान सबके साथ इतना अटूट नाता जोड़ लेता है कि उनसे दूर होने
पर वह दुखी होता है । जिस तरह इन्सान अपने शारीरिक रिश्ते निभाता है उसी तरह यह भी
विचारणीय योग्य बात है। इंसान का वास्तविक रिश्ता क़िस के साथ है। लेकिन वह उसे भुला
चुका है। शरीर का चलना, बोलना, उठना, बैठना, इज्जत मान केवल और केवल तब तक ही होता
है जब तक शरीर में आत्मा है, आत्मा के निकलते ही यह शरीर किसी काम का नही रहता। उस
आत्मा के सम्बन्ध के बारे में इन्सान नहीं सोचता ना ही ये विचारता है कि यह आत्मा क्या
चाहती है उसकी खुराक क्या है। महापुरूषों ने अपने वचनों में कहा है कि इस आत्मा का
सम्बन्ध उस परम् पिता परमात्मा से है जिसने हमे यह शरीर दिया ताकि हम इस शरीर को पाकर
इससे सेवा, भजन सुमिरण करके अपनी आत्मा को परम पिता परमात्मा में लीन कर ले | लेकिन
आजकल सबको ये बाते बेकार लगती है कोई ऐसी बाते सुनना ही नही चाहता हर कोई यही समझता
है कि शरीर हमें खाने-पीने, ऐश करने व दुनिया के कार्य व्यवहारो के लिए मिला है। इन्सान
बड़ी-बड़ी पढ़ाई करता है, दुनिया भर का ज्ञान लेता है, तरह-तरह के लोगों से भी मिलता
है लेकिन माया में इतना रमा होता है कि कभी जाने-अनजाने में जीवन का सच सामने आ भी
जाये तो उससे मुँह फेर लेता है । इस दास का खुद का अनुभव है कि कभी किसी को भगवान की
बात करने की कोशिश करो तो लोग अपना ध्यान कहीं ओर ज्यादा लगाते है। भगवान की बातों
को सुनना पसन्द नहीं करते। कितनी विचारने योग्य बात है कि जिस परमपिता परमात्मा ने
हमें जन्म दिया, स्वास दिये उसकी कृपा से हम खाते है, पीते है, हर काम करते है आनन्द
लेते है उसकी महिमा सुनने का इन्सान के पास समय नहीं है उसकी बाते होते ही इन्सान अपना
ध्यान इधर-उधर करना शुरू कर देता है। ऐसा नहीं होना चाहिए। उस मालिक का शुक्र करना
चाहिए कि उसने हमें यह जीवन दिया। हमें अनमोल स्वास दिए, संसारिक वस्तुएँ, इज्जत मान,
धन-दौलत सब उसने ही हमारे नसीब में लिखी है तभी हमें मिली है। अगर हमें कुछ ना मिलता
तो हम कुछ कर तो नहीं सकते थे हमे उसको स्वीकारना पड़ता। इसलिए हर समय उस मालिक का
धन्यवाद करना चाहिए लेकिन हम फिर भी भूल जाते है कबीर साहिब जी के वचन है.
हमसे कूकर की मत नीको।
कूकर रहे स्वामी के द्वारे, जो देवे सो खाये |
हमारा मन इतना लोभी, द्वार-द्वार भटकाये । ।
मतलब की कुत्ता जो है वो हमसे अच्छा है क्योंकि वो अपने मालिक को पहचानता
भी है और जो उसका मालिक उसे जो भी देता है उसे स्वीकार भी करता है और वफादारी भी करता
है लेकिन हम ना तो उस परमपिता परमात्मा को पहचानते है जिसने हमें जन्म दिया और ना ही
उसे याद करते है। बस उन्हीं से अपने रिश्तों को मजबूत करते है जिन्होने हमारा साथ छोड़
देना है |
कथा है जब अभिमन्यु महाभारत के युद्ध चक्रव्यहू
में फंस कर मर गया तब अर्जुन अपने होश को ना सम्भाल पाया। उस समय भगवान श्री कृष्ण
जी अर्जुन के साथ थे। अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण जी से कहा अब मेरे जीने का कोई फायदा
नहीं है मैं अब जी कर क्या करूगाँ। कहते है जब इंसान के ऊपर काम, क्रोध, लोभ, मोह अहंकार
का पर्दा पड़ जाता है तब उसका सारा ज्ञान खत्म हो जाता है । उदाहरण, जब हम कहीं सत्संग
में जाते है तो कई बार वहाँ सुनने को मिलता है कि इन्सान को लालच नहीं करनी चाहिए।
उस समय तो इन्सान अमल करता है लेकिन जैसे ही प्रसाद मिलता है, उस समय लोभ का पर्दा
आँखों के आगे आ जाता है और मन में भी लालच जाग उठता है । वही हाल अर्जुन का भी हुआ
। भगवान ने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया था जिसमें बताया था कि आत्मा कभी नहीं मरती
वह अजर - अमर है। शरीर खत्म होता है, ये रिश्ते नाते सब शरीर के साथ है लेकिन अर्जुन
पर अपने पुत्र के मोह का पर्दा पड़ चुका था। अर्जुन ने श्री कृष्ण जी से विनती की प्रभु
मैं अभिमन्यु से मिलवा दो। मै उसे एक बार देखना चाहता हूँ। श्री कृष्ण जी ने कहा अर्जुन
हम तुम्हें अभिमन्यु से तो मिलवा दे लेकिन उसका कोई फायदा नहीं है। लेकिन अर्जुन नही
माना। जब वह अपनी जिद पर अड़ा रहा तब भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को कहा ठीक है
अर्जुन हम तुझे अभिमन्यु के पास ले चलते है । अर्जुन को भगवान श्री कृष्ण जी ने ध्यान
पर बिठा दिया और ध्यान के अन्दर ही भगवान श्री कृष्ण जी अर्जुन को बहुत दूर ले गये
ऐसी जगह ले गए. जहाँ पर अभिमन्यु एक दीवार पर बैठा था। अर्जुन ने जब अभिमन्यु को देखा
तो वह उसे देखते ही अभिमन्यु-2 चिल्लाने लगा। कहने लगा देख अभिमन्यु तेरे पिता तेरे
सामने खड़े है लेकिन अभिमन्यु ने ध्यान ना दिया अर्जुन रोने लगा कि अभिमन्यु अपने पिता
का पहचानो तब अभिमन्यु ने कहा कौन पिता? मै आपको नही जानता । तब अर्जुन ने कहा अभिमन्यु
मैं मृत्यु लोक से तुमसे मिलने आया हूँ। मै तेरा पिता और तू मेरा पुत्र है ! अभिमन्यु
ने जवाब दिया- आपका और मेरा नाता सिर्फ मृत्यु लोक तक ही था और शरीर के साथ था। वो
शरीर तो जल कर राख हो गया। आत्मा आपके सामने है। यह आत्मा तो किसी को नहीं जानती ना
ही कोई उसका रिश्ता नाता है संसार से। यह तो अपने परमपिता को ही जानती है उसी के साथ
इस आत्मा का रिश्ता है। उसी परमात्मा को पाने के लिए इस आत्मा को शरीर मिलता है। लेकिन
शरीर को पाकर इन्सान शारीरिक रसों को ही श्रवण करता है । शरीर के सुख ही देखता है।
आत्मिक सुख के बारे में कभी नहीं सोचता । अभिमन्यु ने अर्जुन से कहा कितनी बार आप मेरे
पिता बने कितनी बार मैं आपका पिता बना कितनी बार अन्य नाते रहे थे ये तो जीवन चक्र
है जब तक आत्मा परमात्मा में लीन नहीं हो जाती है वह शरीर बदलती रहती है। तब अर्जुन
को अहसास हुआ कि क्यों श्री कृष्ण जी ने कहा था कि अभिमन्यु को मिलने का कोई फायदा
नहीं है। यही जीवन का सच है जिससे हम अपरिचित रह जाते है। शारीरिक नाते ही पूरी जिन्दगी
निभाते रहते है। लेकिन जिससे असली नाता है उसे जानने की कोशिश ही नहीं करते। इसलिए
संत महापुरूष जीव को समझते है कि अपनी राह को देखो कि कहा चलना है और कहां चल रहे हो।
सत्य को समझो ताकि यहाँ पर खुशियां मिले और आगे परलोक भी सवेला बने ।
कबीर आधि साखि ये, कोट ग्रन्थ कर जाना ।
नाम सच जग झूठ है, सूरत शब्द पहचान ।।
No comments:
Post a Comment