सेवक का ध्यान सैदव अपने सतगुरु के चरणों में
रहता है सेवक कही भी रहे देश में विदेश में उसके मन में सदैव अपने सतगुरु की याद
रहती है| ऐसे ही जब सेवक के मन में अपने सतगुरु की याद रहती है सतगुरु भी अपने
सेवक को एक पल नहीं विसरते | हमारे श्री गुरु महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी ने
बैगलोर में बच्चों के लिए आनंद शिक्षा केंद्र की स्थापना की हुई है| श्री गुरु महाराज जी श्री पंचम पादशाही जी जब वहाँ जाते थे
तो स्कूल में जाकर बच्चों का उत्साह बढ़ाते थे| बच्चों के साथ लीला करते थे बच्चे भी श्री गुरु महाराज जी
को कविता सुनाते थे| एक बार श्री गुरु महाराज जी विवेक धाम आश्रम बैगलोर में विराजमान थे श्री गुरु
महाराज जी ने महात्मा जी को कहा कि इस बार हमारा स्कूल का कार्यक्रम नहीं बन रहा
बच्चों से कहों कि यहीं आकर दर्शन कर ले| जब स्कूल में ये सूचना दी गई तो बच्चे यह बात सुन कर उदास
हो गए| सभी बच्चों ने आपस में सलाह
की और अपने अपने घरों को चले गए| उसी रात को साढ़े बारह बजे श्री गुरु महाराज जी ने महात्मा जी को बुलवाया और
फरमाया कि स्कूल में संदेशा पहुँचा दो कल हम सुबह स्कूल में जायेंगे| अगले दिन श्री गुरु महाराज जी ने वहाँ कृपा फरमाई तो श्री
गुरु महाराज जी ने सभी बच्चों को बहुत प्यारा आशीर्वाद दिया जब श्री गुरु महाराज
जी वहाँ से वापिस आश्रम चले गए तब बच्चों ने अपने टीचर से कहा कि आपको पता है गुरु
महाराज जी को किसने बुलाया है तब टीचरों ने कहा कि हमने पहले विनती की थी तो पहले
प्रोग्राम नहीं था बाद में श्री गुरु महाराज जी का प्रोग्राम बन गया| तब बच्चों ने कहा कि नहीं श्री गुरु महाराज जी को हमने
बुलाया है जब हमें पता चला कि श्री गुरु महाराज जी नहीं आ रहे थे हम सबने आपस में
सलाह कि और अपने -2 घर गए घर जाकर हम सबने कुछ नहीं खाया और सतगुरु के ध्यान पर बैठ गए| आपको तो बाद में संदेशा मिला हमें तो रात तो को ही श्री
गुरु महाराज जी बता गए कि कल हम स्कूल जरुर आयेंगे| जब सेवकों का ध्यान सतगुरु के चरणों में लगा हो तो फिर
सतगुरु अपने सेवकों को कैसे भूल सकते है वे तो उनकी हर पुकार को सुनते है |
एक बार श्री गुरु महाराज जी ने दुबई आश्रम में कृपा
फरमाई | श्री चरणों में एक भक्त आया उसने स्वामी जी से कहा कि स्वामी जी कल मुझे
आपकी इतनी याद आ रही थी कि मन विभोर हो उठा| आँसू बहने लगे कि कब मुझे मेरे प्रीतम
प्यारे के दर्शन होंगे| तभी फोन की घंटी बजी जैसे ही मैंने फोन उठाया तो मुझे
बताया गया कि हम दुबई आश्रम से बोल रहे है श्री आनंदपुर से श्री गुरु महाराज जी ने
कृपा फरमाई है| तो मेरी ख़ुशी का ठिकाना ही नहीं रहा| अभी तो मैं आपको याद ही कर
रहा था और इतनी जल्दी मेरी पुकार भी पूरी हो गई| तो स्वामी जी ने फरमाया जहाँ याद
है तो समझों आबाद है| सतगुरु की याद,
सतगुरु का ध्यान ही सेवक की सच्ची पूंजी है |
एक बार श्री गुरु महाराज जी
श्री आनंदपुर में विराजमान थे उस समय आपने अपने पावन श्री वचनों में फरमाया कि जब
सेवक मंदिरों की ओर मुख करले तो केवल मुख नहीं होना चाहिए
उसका अन्तर मन भी श्री मंदिर की हो जाए| वहां आकर सतगुरु का सुमिरन करे और सतगुरु का ध्यान करे| उस समय परमहंस स्वंय पूरी आभा में होते है उस समय भक्ति का
अमृत बरस रहा होता है उस समय सेवक का पूरा ध्यान सतगुरु के चरणों में लगा होना
चाहिए| श्री गुरु महाराज जी के ये
पावन वचन है कि जब मंदिर में आ जाओ तो पूरी आरती तक मंदिर में ही बैठे रखो जब पूरी
आरती समाप्त हो जाये जयकारा बुल जाए तो सतगुरु का ध्यान करते हुए ही बाहर निकले|
ऐसे ही सेवक के मन में अपने
गुरु घर की ख़ैर-ख़्वाही का भी ध्यान होना
चाहिये एक समय की बात है श्री गुरु महाराज जी श्री दृतीय पाद्शाही जी महाराज जी चकौड़ी
आश्रम की हवेली, जो सत्संग के कमरे के आगे बनी हुई थी, वहाँ पर टहल रहे थे | महात्मा रोशनानन्द जी व कुछ अन्य महात्मा जन भी आपके साथ थे
| आप सत्संग – उपदेश से यह
समझाने की कृपा फरमा रहे थे कि भक्ति मार्ग में मनुष्य किस प्रकार शीघ्र उन्नति कर
सकता है | आपकी दृष्टि
धरती पर पड़े हुए गेहूँ के दानों पर पड़ी | आपने फरमाया -“समय के संत सतगुरु की यही विशेषता होती है कि
वे प्रक्रति की किसी वस्तु को लक्ष्य बनाकर ऐसे सरल ढंग से जीवो को समझाने की कृपा
करते है कि साधारण मनुष्य भी सरलतापूर्वक समझ जाते है |” तभी आपने धरती पर पड़े हुए गेहूं के उन दानों की ओर संकेत
करते हुए पुनः फरमाया - “अब देखो, ये थोड़े से गेहूं के दाने देखने में तुच्छ है और यहाँ से जितने भी आदमी गुजरे
होंगे, उनकी दृष्टि भी इन गेहूं के
दानों पर पड़ी होगी | किन्तु इनको तुच्छ जानकर किसी ने इनकी ओर ध्यान नही दिया | यदि मनुष्य इन दानो को समेट कर उठा ले और ले जाकर लंगर के
लिए रखे हुए गेहूं में मिला दे तो उस मनुष्य की भक्ति की उन्नति होगी और वह यथार्थ
में हीरा बन जाएगा |” इसी प्रकार गुरुमुख जन जितनी श्री दरबार के लिए
अधिक चिंता करेंगे, उतनी जल्दी ही भक्ति पथ में उन्नति करेंगे | जैसे अपने घर को या अपनी वस्तुओं को सदा सम्भाल कर रखा जाता
है, उसी प्रकार श्री दरबार को
अपना घर समझकर उसकी सभी वस्तु की सम्भाल करें| इस तरह से जीव भक्ति मार्ग में शीघ्र ही उन्नति कर सकता है|
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