Monday, March 9, 2020

भक्ति एवं सत्संग का महत्व

 

भक्ति एवं सत्संग का महत्व

रामचरित मानस में भगवान शिव शंकर जी माता पार्वती को सम्बोधित करते हुए कहते है कि :

भगति तात अनुपम सुखमूला।

मिलइ जो संत होइँ अनुकूला ||

कि संसार में प्रभु की कृपा के बिना संतो की शरण नहीं मिलती, संतो की शरण के बिना इंसान को वह सुख नहीं मिलता जिसके लिए वह निरंतर संसार में प्रयास करता है| कहते है कि

भक्ति सुख का मूल है, भक्ति सुख की खान |

जाके ह्रदय भक्ति बसे, पावे पद निर्माण ||

अर्थात संसार में एक भक्ति ही है जो निरंतर सुख देने वाली है, संसार में हम देखते है है कि कोई व्यक्ति नया मकान बनाता है तो पहले दिन उसे बहुत ख़ुशी है, दूसरे दिन वह ख़ुशी कुछ कम हो जाती है और कुछ समय पश्चात्त वह खुशी पूर्ण रूप से समाप्त हो जाती है| इसी प्रकार संसार में हर वस्तु का आनंद कुछ समय तक ही रहता है| उसके बाद वह पूर्ण रूप से समाप्त हो जाता है| लेकिन प्रभु की भक्ति ऐसी आनंददायक है जिसका रस कभी ख़त्म नहीं होता अपितु भक्ति से इंसान का आनंद निरंतर बढ़ता जाता है| आजकल आप संसार में किसी को भी देख लो वो दुखी दिखाई पड़ता है| कोई अपने घर की परेशानियों से दुखी है, कोई अपने बच्चों को लेकर और कोई अपने कार्य को लेकर| अगर संसार के हालत की बात करे तो संसार की हालत ऐसी है कि ‘ गरीब कहे अमीर सुखी, अमीर कहे राजा सुखी, राजा कहे महाराजा सुखी, महाराजा कहे इंद्र सुखी, राजा इंद्र कहे भगवान् विष्णु सुखी और भगवान विष्णु कहे कि मेरे भक्त सुखी बाकि सारे दुखी’ अर्थात इस संसार में हर कोई यही कहता है कि मेरे से ऊपर वाला सुखी है, लेकिन सही मायनों में एक भगवान का भक्त ही है जो सच्ची खुशियाँ पाता है| जैसे सोना सुनार के पास मिलता है, लोहा लोहार के पास मिलता है, वैसे ही सुख भी सुख के सागर के पास मिलता है जो कि केवल भगवान है| हम संसार में हमेशा आशा करते है कि कोई व्यक्ति हमे सुख दे लेकिन अगर हम उस व्यक्ति को जान कर देखेंगे तो वह हमसे भी ज्यदा दुखी होगा| गुरुवाणी में भी कथन है कि-              

             नानक दुखिया सब संसार, सुखी वही जो नाम आधार’|

श्री गुरुनानक देव जी फरमाते है कि इस संसार में केवल और केवल वही सुखी है जो भगवान के नाम का सहारा लेता है, जिसे भगवान के नाम का आधार होता है| एक भगवान का नाम ही है जो इंसान को सही मायनों में सुख देता है| जो इंसान को सारी खुशियों से भरपूर देता है|

    एक बार कि बात है कि राजा अकबर जो कि प्रसिद्ध सम्राट थे, एक दिन रात के समय जब वह अपने महल में आराम कर रहे थे, तो उन्हें प्यास सी अनुभव हुई तो उन्होंने मन में सोचा की किसी सेवादार को क्यूँ बुलाऊं, खुद ही पानी पी लेता हूँ| तो उस समय कुँए हुआ करते थे, लेकिन राजा को तो कुएँ से पानी निकालने का अभ्यास नहीं था, लेकिन फिर भी राजा ने कोशिश की और पानी का मटका कुँए में डाला, लेकिन जब राजा उस मटके को निकालने लगा तो राजा को उस चीज़ का अभ्यास ना होने के कारण वह मटका राजा के पैरों पर जा गिरा और राजा को चोट लग गई| इतने में यह आवाज़ सुनकर राजा के सेवादार भी आ गये, उन्होंने देखा कि राजा को चोट लगी हुई है लेकिन राजा चोट की परवाह किये बिना दोनो हाथ जोड़कर बोल रहा है ‘शुक्र है भगवान तेरा शुक्र है’ तो यह देखकर राजा के सेवादार बहुत हैरान हुए और राजा से पूछा कि महाराज आपको तो इतनी चोट लगी हुई है फिर भी भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे है| तो राजा बोले कि जिस व्यक्ति को अपने लिए कुँए से पानी भरना नहीं आता भगवान् ने उसे देश का सम्राट और अपार सम्पति का मालिक बना रखा है| तो यह भगवान की ही तो कृपा है कि जो भगवान ने मुझ पर इतनी रहमत की है|

इसी तरह एक बार एक व्यक्ति के पैरों में चप्पल नहीं थी, और वह भगवान को कोसता जा रहा था कि भगवान तूने मेरी ऐसी हालत बना दी कि मेरे पैरों में चप्पल तक नहीं है लेकिन कुछ दूर चला तो देखा कि एक व्यक्ति है जो टाँगे ना होने के कारण चल भी नहीं पा रहा है, तो उसने भगवान् का धन्यवाद किया की शुक्र है भगवान तेरा| मेरे पैरों में चप्पल ही तो नहीं है, पर चल तो सकता हूँ| तो कहने का भाव यह है कि भगवान् ने हमे दस चीज़ दी, इतना सुंदर शरीर दिया, रहने को घर दिया और सांसारिक वस्तुएँ भी दी लेकिन एक चीज़ नहीं दी या उसमे थोड़ी देर कर दी तो इंसान गिला रख लेता है कि भगवान् ने हमारे साथ सही नहीं किया| अगर जो दिया वो भी नी देता तो क्या हम कुछ कर सकते थे| तो कहने का भाव यह है कि हम संसार में इतने गरीब लोगों को देखते हैं जो इतनी परेशानियों को झेलते है| कई शरीर से विकलांग होते है कई बचपन में ही अनाथ हो जाते हैं, लेकिन भगवान् ने हमें तो ऐसा नहीं बनाया हमें तो शाररिक रूप से और सांसारिक वस्तुओं से भी भरपूर किया है| तो हमारा भी फ़र्ज़ बनता है कि हम भगवान् का शुक्रिया अदा करना चाहिए, जिसने हमें इतना अच्छा तन दिया है जिससे हम अपना भी जीवन सफल बना सकते हैं तथा दूसरों को भी सही रहा दिखा सकते हैं, जैसे कमल अपनी खुशबू फैलाता है वैसे इंसान भी कमल की तरह अपनी खुशबू हर जगह फैला सकता है| गुरुवाणी में वचन आता है कि

‘फिरत-फिरत बहुते युग हारयो, मानुष देह लहि|

नानक कहत मिलन की बरिया पर सिमरत नाहिं||

यह आत्मा कई युगों से चौरासी के चक्कर में भटक रही थी जिसमे उसे कई जानवरों की योनियों में भटकना पड़ रहा था| कई युग बीत गए वो आत्मा भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि हे भगवान् मुझे इंसान का शरीर प्रदान करो, मैं संसार में जाकर भक्ति करुँगी| तो एक दिन भगवान ने उस आत्मा पर कृपा करके उसे मनुष्य जन्म दिया और आत्मा ने भगवान से मनुष्य जन्म पाकर के भक्ति करने का वादा किया लेकिन जब उस आत्मा को मानुष शरीर मिला तो इन्सांन संसार में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार में फँस कर अपने किये हुए वादे को भूल गया| लेकिन जब बड़े भाग्यों से इन्सांस को जब संत शरण मिल जाती है तो वह अपने लक्ष्य को समझ जाता है कि मुझे मालिक की भक्ति करने के लिए यह तन मिला है| कहते है कि जिस तरह विद्यालय में जाकर इन्सान को विद्या मिलती है| उसी तरह संत शरण में जाकर इंसान को आत्मिक ज्ञान मिलता है, सत्संग मिलता है और इंसान कि ज़िन्दगी अन्धकार से प्रकाश की ओर चलने लगती है |

‘वस्तु कहीं ढूँढे कहीं, किस विधि आवे हाथ |

कहत कबीर तब पाइए, जब भेदी लीजे साथ ||’

फिर इसी के बाद उन्होंने बताया कि

‘भेदी लीना साथ में, दीनी वस्तु दिखाए|

कोटि जन्म का पथ था, पल में दिया मुकाए|’

अब ऊपर के दोहे में भेदी संत सतगुरु है, जो इंसान को उसके जीवन का महत्व बताते हैं| उसे सही मायनों में वो वस्तु बताते हैं जिसे वह जन्म जन्मान्तर से तलाश कर रहा हैं| कहते हैं कि इंसान का शरीर तब तक चलता है, जब तक उसमे आत्मा रहती है|  मरने के बाद यही शरीर होता है लेकिन आत्मा नहीं होती है तो घर वाले उसे शरीर को कहते हैं कि जल्दी इसे शमशान छोड़ आओ, इसमें से दुर्गन्ध आ रही है| तो आत्मा का कितना महत्व है कि जब तक शरीर में आत्मा थी इंसान का शरीर चलता था, जब आत्मा नहीं रही तो इंसान का सबकुछ, मान-समान, धन-दौलत सब यहीं का यहीं धरा रह गया| तो जिस तरह हमारे शरीर को चलाने के लिए खुराक की जरुरत होती है, उसी तरह हमारी आत्मा भी कुछ खुराक चाहती हैं और उसकी खुराक हैं मालिक की भक्ति| जिस तरह इंसान का शरीर अपने माता पिता और संसार के लोगों से मिलने के लिए तरसता हैं उसी तरह आत्मा जो कि परमात्मा से बिछड़ी हुई है, अपने परमात्मा से मिलने के लिए तरसती रहती है और जब उसे कहीं परमात्मा का अंश मिलता है या मालिक कि बंदगी मिलती है, तो उसे शान्ति मिलती है| कहते हैं कि

परमात्मा से आत्मा, जुदा रही बहुकाल |

सुंदर मेला कर दिया, जब सतगुरु मिले दयाल ||

सतगुरु ही आत्मा को परमात्मा से मिलने का रस्ता बताते हैं| जब इंसान पूर्ण सतगुरु कि शरण में पहुँच जाता है तो उसे सच्चे सुख की प्राप्ति होती है|

भाग हुआ गुरु संत मिलाया, प्रभु अविनाशी घट में पाया |

पूर्ण संतो कि नजदीकी ही भगवान् की नजदीकी है| इंसान को किसी ना किसी ऐसी जगह से जरुर सम्बन्ध रखना चाहिए जहाँ से उसे सत्संग मिल सके| सत्संग का मतलब है जहाँ सत्य का संग होता है| कहते हैं कि जिस तरह संतरे की रेड़ी वाला गली-गली चिलाता हैं अच्छे संतरे ले लो, इसी तरह महापुरुष ये नहीं कहते हैं कि ‘अच्छे संतरे’ वे कहते हैं कि ‘अच्छे संग तरे’, अर्थात अच्छों का संग करोगे तो तर जाओगे| सत्संग ही एक ऐसी जगह है जहाँ इंसान को सच का संग मिलता है कहते हैं कि

एक घड़ी, आधी घड़ी, आधी से भी आध|

कबीर संगत साध की, मिटे कोटि अपराध||

कि सत्संग कि एक घड़ी से भी आधी घड़ी और उससे भी आधी घड़ी, इन्सान के कई जन्मों के अपराध को ख़त्म कर देती है और इस सत्संग की प्राप्ति केवल और केवल संतों की शरण में जाकर होती है| सतगुरु शरण में ही इंसान को भक्ति की वो दात मिलती है जिसे पाकर इंसान की आत्मा को शान्ति तथा वो ख़ुशी प्राप्त होती हैं जिसके लिए सारा जगत प्रयास करता हैं |

‘भक्ति धन सतगुरु धनी, बख्श रहे दिन रैन|

जो आवे चरणार में, पावे सुख और चैन ||

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