Sunday, March 8, 2020

भाव भक्ति

 

भाव भक्ति

भक्ति, वह अनमोल वस्तु है, जिसके मिल जाने पर इंसान को सच्चे और वास्तविक सुख की प्राप्ति होती है। हर व्यक्ति का भक्ति करने का अपना तरीका होता है। कोई भक्ति पुत्र प्राप्ति के लिए करता है, कोई धन की इच्छा को लेकर, कोई शारीरिक सुख के लिए तो कोई किसी वस्तु की चाहना को लेकर। लेकिन विचार कर के देखा जाए की भगवान से हम भक्ति के बदले अनेकों कामनाएं करते है की भगवान हमें यह वस्तु दे दो, हमें यह सुख दे दो। लेकिन भगवान जो हर वस्तु का मालिक है, सारे जगत की पालना करने वाला है, उसी को ही हम अपनी भक्ति से प्राप्त कर लेते तो संसार की वस्तुएं तो अपने आप ही अपनी हो जायेंगी। जिसतरह सूरज अपना हो तो प्रकाश की आवश्यकता नहीं है। जिस तरह पेड़ अपना हो तो छाया की आवश्यकता नहीं रहती है। इसी तरह अगर हम भगवान को ही अपना लेते हैं, भगवान ही हमारे अपने बन जाते हैं तो संसार की हर वस्तु अपनी हो जाती है। अपने अपने सोचने के भाव है। कहते है की भाव के अंदर इतनी शक्ति होती है की अगर हम भाव से सच्चे मन से भगवान को याद करते हैं तो हमारी पुकार जरूर उस परमपिता परमात्मा के चरणों में पहुँच जाती है। भाव ही एक ऐसी चीज़ है जिसे सही मायनों में आप भगवान को अर्पित कर सकते हो। एक समय की बात है कि श्री गुरु नानक देव जी अपने भक्तों के साथ संसार को सुधारने के लिए जगह जगह विचरण कर रहे थे। तो चलते चलते वो एक सिद्ध मंडली में पहुँच गए। जब गुरु नानक देव जी उस सिद्ध मंडली में पहुंचे तो उन सिद्धों ने गुरु नानक देव जी के दर्शन किए तो उन्हें सच्चा आनंद मिला। अक्सर देखने में आता है कि जब कोई ज्यादा समझदार व्यक्ति हमें मिलता है जिसे हम से ज्यादा ज्ञान है तो हमारे मन में इच्छा होती है कि हम उससे कुछ सीखें।

यही इच्छा उन सिद्ध मंडली के साधुओं के मन में जागृत हुई। उन्होंने श्री गुरु नानक देव जी के दर्शन किए, वह उनसे कुछ ज्ञान देने की भी विनय की। तब गुरु नानक देव जी ने उन साधुओं से कहा की आप किस बारे में जानकारी चाहते हैं? तब उन साधुओं ने विनय की कि हमने भगवान के कभी दर्शन नहीं किए। आप पूर्ण संत है, हमें भगवान के बारे में बताओ? तब श्री गुरु नानक देव जी ने फरमाया की सांचा साहिब साँचा नाम मालिक जो है वो सच्चा है और उसका नाम सच्चा है। बाकी जगत की हर रचना झूठ है। तब साधुओं ने विनय की कि जगत के अंदर एक मालिक सच्चा है और उसका नाम सच्चा है तो ऐसे सच्चे मालिक के पास जब हम जाये तो उसे अर्पित क्या करें? अगर तो हम उसे धन अर्पित करते हैं तो वो भगवान का दिया हुआ है। भगवान की दे हुई वस्तु ही हम उसे अर्पित करें तो इसमें कौन सी बड़ी बात है? या फिर कोई वस्तु भी परमात्मा के चरणों में अर्पित करें तो वह वस्तु भी तो भगवान ने हमें दी है तो ऐसा कुछ हमें बताओ जो हम परमात्मा को अर्पित कर सकें। तब श्री गुरु नानक देव जी ने फरमाया की भगवान जो है उसको सिफ़त बड़ी पसंद है। और जो कोई उसकी सिफ़त करता है उसके गुण गाता है गुण आने वाली की तरफ भगवान का मुख हो जाता है और भगवान उसे अपने नजरें करम से सभी सुख प्रदान करते हैं। गुरु नानक देव जी ने फरमाया कि भाव जो है वो अर्पित करने वाली वस्तु है, भाव ही है जो सही मायनों में आप भगवान को अर्पित कर सकते हो आप भगवान को कुछ धन भेंट करना चाहते हो तो अपने मन में भाव जो जागृत होता है धन भेंट करने का वही सही मायने में भगवान के चरणों में पहुंचाना, न कि आपका धन।

भगवान तो सर्वशक्तिमान हैं, उन्हें हम जो भी अर्पित करते हैं वो तो पहले से ही उसके भंडारी है, संसार की हर वस्तु के मालिक हैं, भाव से भगवान को जल्दी प्रसन्न किया जा सकता है। एक भजन के अंदर एक प्रेमी लिखता है कि वो भाव के भूखे हैं और भाव ही चाहते है, भक्तों की पुकारो पर वह दौड़ें आते हैं। जब भक्ति करते करते भगत के भाव बहुत ऊंचे हो जाते हैं तो भगवान भी अपने आपको रोक नहीं पाते। वे भी उसे भाव में बहकर सभी बंधन तोड़ कर दौड़ें आते है। जैसा जैसा भाव लेकर इंसान भगवान के चरणों में जाता है, वैसा ही उसे फल प्राप्त होता है। अगर मन में भाव है की हमारे भगवान हमारे साथ है तो वह हमेशा साथ ही रहेंगे और हर घड़ी हर पल रक्षा भी करेंगे। एक भक्त के मन में भाव भी यही होना चाहिए की मेरे प्रभु हर वक्त मेरे साथ है तो भगवान भी अपने भक्त के विश्वास को पूरा करते हैं। सही मायनों में भक्ति का नाम ही भाव है। अगर भक्ति करते हुए मन में भाव नहीं तो वह भक्ति नहीं अपितु दिखावा है। उदाहरण है कि कोई इंसान मंदिर या गुरूद्वारे में झाड़ू लगाने की सेवा कर रहा होता है तो किसी के मन में तो ये भाव होता है की लोग मुझे देखेंगे तो मेरी प्रशंसा करेंगे कि कितना सेवादार हैं वो व्यक्ति सेवा सिर्फ और सिर्फ दिखावे के लिए करता है, लेकिन एक व्यक्ति है जो झाड़ू लगाने की सेवा कर रहा है और मन में ये विचार करता है की मैं भगवान के दर पर झाड़ू लगा रहा हूँ। इसमें मेरे मन की सफाई हो रही है। तो अब विचार करने लायक बात है कि दोनों के भावों में कितना फर्क है? एक भाव तो भगवान से दूर करता है और एक भगवान के नजदीक ले जाता है। इंसान ये सोचे की वो भगवान से कुछ छिपा लेगा तो ऐसा नहीं हो सकता, भगवान तो हर किसी के मन की जानते हैं। अपने दिखावे से बाहरी शक्ति से इंसान संसार को तो प्रसन्न कर लेता है लेकिन भगवान को प्रसन्न नहीं कर सकता। भाव से पूर्ण एक और कथा है। जब भगवान श्रीराम जो 14 वर्ष का बनवास पूरा कर अयोध्या लौटे तो माता कोशल्या ने भगवान श्री राम जी को खाने के लिए निमंत्रण दिया। माता ने 56 तरह के व्यंजन श्री राम जी  के लिए बनाए| जब श्री राम जी भोजन के लिए बैठे तब माता ने श्री राम जी से पूछा की राह हम तुझे 14 वर्ष तक माता के हाथ का भोजन खाने को नहीं मिला, ऐसा स्वादिष्ट भोजन नहीं मिला होगा। हम लोग अपने मन में सोचते हैं की हम भगवान के आगे संसार की बड़ी बड़ी वस्तुएं रख दें तो भगवान खुश हो जाएंगे, लेकिन ऐसा नहीं होता। अगर हम दिल से भगवान को एक फूल भी अर्पित करें तो उन्हें वो भी स्वीकार होगा। अगर कोई बिना भाव के दुनिया की बड़ी से बड़ी वस्तु भी रखे तो वह कभी स्वीकार नहीं होगी। यही विचार कहीं ना कहीं माता कोशल्या के मन में था, वो भी मन में यही विचार कर रही थी की राम जी ऐसे स्वादिष्ट भोजन को देखकर बहुत प्रसन्न होंगे लेकिन भगवान तो केवल भाव के वश में है। श्री राम जी जब खाना खाने लगते हैं तो माता ने जैसे ही हर माँ का स्वभाव होता है, अपने पुत्र से पूछा कि राम तुझे भोजन कैसा लगा तो श्री राम जी ने कहा कि माँ ठीक है, लेकिन माँ को लगा की राम दिल से नहीं बता रहा तो दोबारा पूछा की राम सच्ची सच्ची बता की तेरे को भोजन कैसा लगा? राम जी ने कहा की माँ ठीक है। ऐसे कई बार माता पूछती रही हर बार राम जी वहीं उत्तर देते की माँ ठीक है भोजन। अंत में जब माँ ने श्री राम जी को कसम दी की राम सच्ची सच्ची बता तब श्री राम जी ने फरमाया की माँ अगर सच सुनना चाहती है, सच्ची बात यह है की जो आनंद मुझे शबरी के जूठे बेरों का आया वैसा आनंद नहीं आया, अब विचार किया जाए की माँ तो ये सोच रही थी कि भगवान 56 तरह के व्यंजन से प्रसन्न हो जाएंगे लेकिन भगवान तो भाव के वश में हैं, उन्हें भाव से खिलाई शबरी के जूठे बेर ज्यादा प्रिय लगे। भाव से ही भगवान को पाया जा सकता है। इंसान चाहे पूरे दिन में 2 मिनट भगवान को याद करें लेकिन पूरे भाव से अगर नित्य 2 मिनट भी भगवान को याद करें तो वो भी बहुत बड़ी भक्ति है। इसी भाव से हर इंसान भगवान को याद करेगा तो उसको इस लोक में भी खुशी प्राप्त होगी और परलोक में भी भगवान का प्रेम प्राप्त होगा।

No comments:

Post a Comment