संगति का प्रभाव
कबीर साहिब जी के वचन है की “सुसंगति
में सुख उपजे,
कुसंगति में दुख होए। कहत कबीर वहां जाइये साधु संघ जहाँ होए। ”
मतलब की सुसंगति यानी अच्छी संगत सब को लाभ पहुंचाती है और कुसंगति
यानी बुरी संगत सब को हानि पहुँचाती है। इसलिए कहते हैं की ऐसी जगह जाओ जहाँ साधु
संघ हो, संत महापुरुष भी यही पुकार करते हैं
कि अच्छे संग में रहोगे तो तर जाओगे।
देखने में भी यही आता है कि जैसे जैसे कोई संगति करता है, वैसे
ही उसका स्वभाव बन जाता है। कोई अगर झगड़ालू व्यक्ति की संगति में रहेगा तो जीव में
भी वही अवगुण आ जाएगा और कोई अगर सज्जन व्यक्ति की संगति करेगा तो वैसा ही उसमें
गुण आ जाएगा। तात्पर्य यह है कि संगति अपना प्रभाव जरूर दिखाती है। यहाँ उदाहरण के
लिए 2-3 दृष्टांत दिए जा रहे हैं जिसे पढ़कर आप
भी जान
सकते हैं की संगति से जीव पर कैसा प्रभाव होता है?
रामचरित्र
मानस में कथा है कि जब श्रीराम जी माता सीता की खोज में निकले तो रास्ते में उसकी
मुलाकात सुग्रीव से हुई। तब सुग्रीव ने बाली के दुष्कर्मों के बारे में भगवान
श्रीराम को बताया की कैसे बाली ने सुग्रीव को राज्य से निकाल दिया और उसकी पत्नी
को अपनी दासी बना लिया। सुग्रीव के दुखों को सुन भगवान श्री राम जी ने वचन किए :
“जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत
पातक भारी॥
निज दुख गिरि सम
रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना॥”
श्री राम जी ने कहा कि जो व्यक्ति
अपने मित्र के दुख देखकर दुखी नहीं होता, वह
मित्र किसी काम का नहीं है। अपने दुख पहाड़ के सामान भी हो तो उसे राई के समान
जानना चाहिए। श्री राम जी ने सुग्रीव को उसका राज्य वापस दिलवाने का आश्वासन दिया
और बाली को सुग्रीव से युद्ध करने के लिए कहा। श्री राम जी की आज्ञा मान सुग्रीव
ने बाली को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों का युद्ध शुरू हुआ बाली बहुत ही शक्तिशाली
था। वह जीतने लगा। श्रीराम युद्ध को दूर खड़े देख रहे थे। उन्होंने तीर चलाया जो कि
बाली को जाकर लगा और वह धरती पर गिर गया। जब श्री राम जी बाली के पास गए तो बाली
ने घायल अवस्था में वजन किए कि: “मैं बैरी सुग्रीव प्यारा कारण कथन नाथ मोहि मारा।” हे राम तुमने मुझे क्यों मारा? क्या
मैं तुम्हारा वैरी हूँ? मेरी दुश्मनी तो सुग्रीव से थी, तुम ने मुझे धोखे से मार कर बहुत बड़ा अधर्म किया है। दुष्ट
व्यक्ति का ये स्वभाव होता है कि भगवान भी आकर उन्हें कुछ बतलायेंगे तो भी वे उसे
नहीं मानेंगे। अपने आप को ही वह बड़ा और ज्ञानी समझते हैं। वहीं काम बाली ने किया, साक्षात पारब्रह्म श्री राम जी को उसने अधर्मी कहा। जीव की
चालाकी संसार में सबके आगे चल जाती है, लेकिन
उस परमात्मा के आगे कोई अपनी चालाकी नहीं दिखा सकता। कोई कितना भी ज्ञानी क्यों ना
हो उस परमपिता परमात्मा के आगे सब अज्ञानी हैं। ऐसा ही बाली की श्रीरामजी के आगे
एक न चली। श्री राम जी ने वचन किए की बाली तो हमें अधर्मी कहता है क्या तूने कोई
धर्म का काम किया है? अपना छोटा भाई जो कि पुत्र के समान होता है, उसे राज्य से निकाल देना, अपने
भाई की पत्नी को दासी बना लेना। क्या यह धर्म है? जब
तूने खुद ही धर्म नहीं किया तो अधर्मी तो तू है तेरे जैसे अधर्मी को तो मृत्यु दंड
मिलना चाहिए, वहीं हमने तुझे दिया है तो हमने तो धर्म का साथ
दिया है। जब बाली ने ये वचन सुने तो उसकी आँखों से आंसू आ गए। भगवान श्री राम जी
की सुखमयी संगति से वह उनके अनमोल वचनों को सुनकर वह धन्य हो गया और उसने श्री राम
जी से माफी मांगी। भगवान तो बड़े ही दयालु हैं, उनका
चरित्र बड़ा ही कोमल है। श्रीरामजी को बाली पर दया आ गयी। उन्होंने बाली से कहा कि
बाली अभी तेरे प्राण शेष है तू जाहे तो हम तेरा उपचार करवा देते है और तू ठीक हो
जाएगा। लेकिन बाली अब भगवान का संग पाकर उनकी संगति में आकर ज्ञानी बन चुका था।
कहने लगा की प्रभु इस समय के लिए तो देवी देवता ऋषि मुनि तप करते हैं कि जब हमारा
अंतिम समय आए तो भगवान हमारे सामने हो, वह
उत्तम समय तो मुझे प्राप्त हो रहा है। अब मैं मरना चाहता हूँ। इस तरह उसने
श्रीरामजी के आगे प्राण त्याग दिए।
संगति का कितना बड़ा प्रभाव है जो बाली
भगवान को अधर्मी कह रहा था, शुभ संगति के प्रभाव से वही भगवान के नतमस्तक हो
गया और भक्तों वाली बातें करने लगा की भगवान अब मुझे आपके सामने ही प्राण त्यागने
है। यह सब शुभ संगति का परिणाम है। शुभ संगति में आते ही मन में बुरे विचार खत्म
हो जाते हैं। इंसान सत्य को पहचान पाता है इसी तरह वाल्मीकि वाल्मीकि जिन्होंने
रामायण की रचना की, वो पहले नाम के डाकू थे। रत्नाकर चोरी, लूटपाट आदि किया करता था। 1 दिन
उसने किसी संत जी को पकड़ लिया और उन्हें कहा जो कुछ भी तेरे पास है हमें दे दें। वह
संत जी बहुत ही ज्ञानी थे। उन्होंने रत्नाकर से कहा कि तुम ये लूटपाट क्यों करते
हो? तब रत्नाकर ने कहा कि मैं यह सब अपने घर वालों के लिए करता हूँ
ताकि वे सुख से रहे। तब संत जी ने कहा कि जिसके लिए तुम ये सब करते हो, जब तुम्हें अपने बुरे कर्मों की सजा मिलेगी, तब तुम्हारे घर वाले तुम्हारी सजा में भागीदार बनेंगे। तो
रत्नाकर ने कहा, क्यों नहीं वे मेरे अच्छे बुरे वक्त में मेरा साथ
देंगे, मैं उनके लिए इतना कुछ करता हूँ। तब संत जी ने कहा कि पहले उनसे
जाकर पूछ कर आओ। रत्नाकर ने कहा कि तुम मुझ से बचने के लिए ऐसा कह रहे हो, तब उसने संत जी को रस्सी से बांध दिया और अपने घर आया। अपनी
पत्नी से कहा कि अगर मुझे मेरे बुरे कर्मों की सजा मिली तो क्या तुम मेरा साथ दोगी? तब उसकी पत्नी ने कहा कि हमारे पालनपोषण की व्यवस्था करना तो
आपका फर्ज है। ये तो हर पति का धर्म है, तुम्हारे
कर्म जो है वो तुम्हारे हैं, तुम अकेले ही भुगतान करना, मैं तो तुम्हारा साथ नहीं दूंगी। इसी तरह उसके बच्चों ने, माता पिता ने भी उसके बुरे कर्म में भागीदारी बनने से मना कर
दिया। तब रत्नाकर को झटका लगा। मन में वैराग्य जग गया कि जिसके लिए मैं बुरे कर्म
करता हूँ, वो तो मेरा साथ नहीं देंगे, फिर क्यों मैं ऐसे कर्म करता हूँ? वापिस आया और संत जी के चरणों में गिर पड़ा और माफी मांगी। तब वह
भक्ति मार्ग के लिए निकल पड़ा और भविष्य में भगवान की कृपा पाकर वाल्मीकि नाम से
प्रसिद्ध हुआ। कहते हैं कि वाल्मीकि जी ने राम जी के संसार में आने से पहले ही
रामायण की रचना कर दी थी। सब संगति का प्रभाव है कि एक डाकू संत जी की संगति पाकर
पूरा बदल इस तरह संगति अपना प्रभाव डालती है।
सहजो बाई जी के वचन है कि : "साध
संघ में चांदना सकल अंधेरा ओर सहजो दुर्लभ पाईये साध संगत में ठौर। " अर्थात
साधुओं की संगत में प्रकाश है और बाकी चारों तरफ अंधेरा है। लेकिन साधु संगत भी
बड़े भाग्य से मिलती है। जिन भाग्यशाली लोगों को साधु संगत मिलती हैं, वे ही अपने जीवन के वास्तविक सच को समझ पाते हैं और अपने जीवन
का कल्याण करवा पाते हैं। साधु संघ में ही इंसान की आत्मिक पढ़ाई होती है। तब इंसान
आत्मिक शांति का अनुभव भी करता है। संसार में हर कोई अपनी समझ, अपनी सोच के अनुसार कार्य करता है। जिसके जैसी रुचि होती है वैसा
कार्य वह जीवन में अपनाता है। हर कोई किसी ना किसी दिशा में चल रहा है। अब विचार
करने वाली बात यह है कि जिस दिशा में वह चल रहा है, क्या
वह दिशा ठीक है? कहते हैं कि सद्गुरु जीव के सच्चे हितैषी होते
हैं, वे जीव को उस दिशा पर ले जाते हैं जिससे वह भटका हुआ है। वचन
आते हैं “वस्तु कहीं ढूंढ कही किस विधि आवे हाथ कहत कबीर
तब पाइये जब भेदी लीजिये साथ।” मतलब यह है कि जिस सच्ची वस्तु को जीव संसार में
ढूंढने में कई जनम लगा देता है सद्गुरु के मिलते ही वह वस्तु आसानी से मिल जाती
है। आगे वचन आता है कि : “भेदी लीना साथ में दानी वस्तु दिखाई। कोटि जन्म
का पंथ था, पल में दिया मुकाये।”
अर्थात सतगुरु शरण में जाकर जीव को
सत्संग मिलता है। जीव को आत्मिक ज्ञान प्राप्त होता है। साध संगत मिलती है जिससे
जीव की सच्ची उन्नति होती है। कहते हैं कि इंसान अपना सारा जीवन अपने शरीर की
आवश्यकताओं की पूर्ति में लगा देता है। आत्मा जो शरीर को चलाने वाली है उसकी तरफ
ध्यान ही नहीं देता। विचार करने वाली बात यह है कि जिस शरीर को इंसान 1 दिन त्याग देता है, उसी
को सजाने संवारने में पालन पोषण में अपना पूरा जीवन लगा देता है। लेकिन शरीर को
चलाने वाली है आत्मा। उसको न तो खुराक देता है और न ही आत्म शांति और प्रसन्नता के
बारे में विचार करता है। जिस संसार के लोगों को हमने 1 दिन त्यागना हैं उनकी बातों में आकर जीव सच की राह से ही मुँह
मोड़ लेता है। रात दिन उन्हीं चीजों के पीछे लगता है जिन्हें अंत में साथ नहीं
जाना। मालिक का नाम जो जीवन का सच्चा धन है, उसके
बारे में इंसान सोचता ही नहीं है। कहते हैं जब तक इंसान के मन में माया रूपी विचार
रहते हैं तब तक जीव का मन अशांत रहता है। इन विचारों को मन में आने से रोकने के
लिए उपाय है कि जीव सत्संग में जाये, अच्छी
संगति करे। सतसंग एक आत्मिक दर्पण है। जिस तरह किसी के मुख पर अगर दाने हो जाये और
वह उन्हें देखना चाहें तो अपनी आंखो से नहीं देख सकता। उन्हें देखने के लिए शीशे
की जरूरत पड़ती है। जब वह शीशे से देखता है तब उसको हटाने के लिए उपाय करता है। ठीक
इसी तरह हमारा मन भी बुराइयों से भरा होता है, लेकिन
इसका पता हमें तभी चलता है जब हम सत्संग में बैठते हैं। तब सत्संग रुपी आत्मिक
दर्पण हमें बताता है कि कैसे हमारा मन संसारिक बंधनों में फंसा हुआ है। पांच या 10 मिनट आप आंख बंद कर भगवान का दर्शन करने की कोशिश करके देखो तो
पता चल जाएगा कि मन में कितने ख्याल आते हैं। दुनिया भर की चीजों का ख़्याल उस
पांच या 10 मिनट में आ जाता है। इसका मतलब हमारा मन बंधनो
में बंधा पड़ा है। हम स्वतंत्र होकर एक तरफ अपना ध्यान नहीं लगा सकते। ये सब मायावी
बंधन हैं जिनसे आजाद होने की युक्ति सत्संग में बताई जाती है। आप किसी ऐसी जगह से
संपर्क रखें, ऐसी संगति में रहें जहाँ आपकी आत्मा की उन्नति
हो। जहाँ आपको आत्म शांति, आत्मा की खुराक मिल सके। शरीर की उन्नति तो कभी
भी हो जाती है, लेकिन आत्मिक उन्नति साध संग, सत्संग में होती है। सत्संग एक तीर्थ के समान है, जिसमें स्नान कर जीव सच की पहचान करता है और सच की राह पर चलकर
खुशियां पाता है और मालिक की दरगाह में भी खुशियाँ प्राप्त करता है। सत्संगति के
तीर्थ में मंचन करे जो कोई। पावे सुख अनंत सो कोई विरला होये।
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