रब दा पावना बड़ा
सोखा
फकीर बुल्लेशाह
पंजाब प्रान्त के एक प्रसिद्ध संत हुए है| ये सैयद वंश के थे, जो मुसलमानों में एक
उच्च जाति मानी जाती है| उन्हें जब भक्ति की लगन लगी, तो पूर्ण गुरु की तलाश हुई|
कुछ दिनों बाद पता चला कि दरवेश इनायत शाह एक उच्च कोटि के महापुरुष है| अत:
बुल्लेशाह उनकी शरण में पहुँचे| जिस समय वे उनके पास पहुँचें, दरवेश इनायत शाह
बगीचे में काम कर रहे थे| वे एक स्थान से पौधे उखाड़ कर दूसरे स्थान पर लगा रहे थे|
बुल्लेशाह ने उनसे पूछा- “मालिक
को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?”
दरवेश इनायत शाह ने हँसते हुए फरमाया “बुल्लेया
रब दा की पावणा, इदरों पूटणा ते ओधरों लावणा|”
अर्थात ऐ बुल्ले| मालिक को प्राप्त करना कौन-सा कठिन कार्य है? बस, इसके लिए
इतना-सा करना है कि इधर से (अर्थात संसार से) चित्त को उखाड़ना है और उधर (अर्थात
मालिक में) लगाना है| दरवेश इनायत शाह के ये वचन बुल्लेशाह के हृदय में उतर गए और
उन्होंने उसी समय दरवेश इनायत शाह को अपना गुरु धारण कर उनसे दीक्षा ले ली | दरवेश
इनायत शाह जी जाति के अराई थे, परन्तु थे उच्च कोटि के संत| भक्ति किसी की संम्पति तो हुई नहीं, न ही ऐसा है कि यह केवल
उच्च कुल में उत्पन्न व्यक्ति को ही प्राप्त हो सकती है| भक्ति के विषय मैं तो
सतपुरुष स्पष्ट शब्दों में फरमाते
है कि-
“ भक्ति गेंद चौगान की, भावे कोई ली जये|
कह कबीर कहू भेद नहीं, कहा रंक कहा राय||”
हजरत इनायत शाह भी
भक्ति परमार्थ की सभी मंजिले तय कर उच्च अवस्था प्राप्त कर चुके थे| बुल्लेशाह के
हृदय में अपने गुरुदेव के प्रति अपार श्रद्धा एवं निष्ठां थी, अत: वे उनकी सेवा
करना अपना परम सौभाग्य मानते थे| किन्तु कुछ ही काल के बाद वे दुविधा में फँस गये|
हुआ यह कि उनके परिजन, उनके सम्बन्धी तथा मित्र आदि सभी इस बात पर आपत्ति करने लगे
और उन्हें उलाहना देने लगे कि सैयद जैसे उच्च वंश के होकर भी उन्होंने एक छोटी
जाति के अराई को गुरु धारण कर लिया| ऐसा करके अपने वंश की मान प्रतिष्ठा मिट्टी
में मिला दी| यदि आपने गुरु धारण करना ही था तो किसी उच्च वंश के व्यक्ति को गुरु
धारण करते | बुल्लेशाह को ऐसी बाते सुनकर अत्यंत दुःख होता था, क्योंकि वे परमार्थ
की दृष्टि रखते थे और गुरु की महानता व बड़ाई को भली-भाँति जानते समझते थे| वे यह
बात भी अच्छी तरह जानते थे कि भक्ति के मार्ग में जाति-पाति तथा ऊँच-नीच का कोई
प्रश्न नहीं होता तथा यह भी कि उनके गुरुदेव अराई वंश में जन्म लेकर भी एक उच्च
कोटि के महापुरुष है| किन्तु फिर भी अपने संबंधियों तथा मित्रों का खुल्लम-खुल्ला
विरोध करने का उनका साहस न हुआ| परिवार के सदस्य, सगे-सम्बन्धी तथा मित्र आदि का मोह-
यह भी माया का ही एक रूप है, जिसे छोड़ना कठिन हो जाता है| अब एक ओर पूर्ण गुरुदेव
की संगति एंव सेवा का अत्यंत लाभ था, जिसे वे किसी भी मूल्य पर छोड़ना नहीं चाहते
थे, दूसरी तरफ सगे – संबंधियों का मोह था, बुल्लेशाह करें तो क्या करें? वे बड़ी
दुविधा में फंस गए| अन्य कोई चारा न देखकर वे चोरी छिपे गुरुदेव के पास जाने लगे |
एक
दिन की बात है, बुल्लेशाह गुरु दर्शन की अभिलाषा से सुबह के अँधेरे में उठे और अपनी हवेली से बाहर निकले| उन्होंने
अत्यंत मूल्यवान एवं उजले वस्त्र शरीर पर धारण कर रखे थे| संयोगवश उसी समय सफाई करने
वाली सड़क पर झाड़ू लगा रही थी जिस कारण धूल उड़ रही थी| बुल्लेशाह अपने ही विचारों
में खोये जा रहे थे कि इतने में सफाई वाली ने दूर से ही उन्हें पहचानकर आवाज दी- “साईं
जी, एक तरफ हो जाओ|”
बुल्लेशाह चौकं उठे| इन शब्दों ने एक क्षण में ही उन्हें दुविधा के भंवर से बाहर
निकाल दिया| सफाई वाली का अभिप्राय तो मात्र यह था कि साईं जी, धूल से आपके वस्त्र
कही खराब न हो जाये इसलिए मार्ग से हट कर एक तरफ हो जाओ, परन्तु बुल्लेशाह ने यह
समझा कि सफाई वाली उनसे ये कह रही है कि एक तरफ हो जाओ- या संसार की तरफ या गुरु
की तरफ| यदि सम्बन्धियों तथा मित्रों के झूठे, प्यार की इच्छा है, तो उधर हो जाओ
और यदि भक्ति परमार्थ की अभिलाषा है, तो फिर गुरु के बन जाओ| उन्होंने विचार किया
कि कहाँ तो गुरुदेव की संगति, सेवा, सुख एवं शांति तथा कहाँ संसार की ममता, माया
का मोह एवं दुःख| इसलिए किसी भी मनुष्य को किसी भी मूल्य पर गुरुदेव की पावन संगति
को छोड़ना नहीं चाहिए|
*****
मेरी ज़ात वही है जो मेरे गुरु की ज़ात है।
बुल्लेशाह
ज़ात के सैयद थे। सैयद
मुसलमानों में ऊँचे समझे जाते हैं। उनके गुरु अरार्इं ज़ात के थे और माली का काम
करते थे। जब बुल्लेशाह ने अरार्इं को अपना गुरु बनाया तो उसके सम्बन्धियों ने उसे
काफिर कहना शुरु किया कि देखो| यह
सैयद होकर अरार्इं का शिष्य बन गया है। परन्तु बुल्लेशाह ने अपनी झोली पसार दी और
कहने लगा कि आप मुझे सहर्ष काफिर कहें मैं इसे प्रसन्नता से स्वीकार करता हूँ।
""बुल्ले हा! लोकी काफिर-काफिर आखदे, तूँ आहो आहो आख'' मैं
अरार्इं हूँ मेरी ज़ात वही है जो मेरे गुरु की ज़ात है।
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बुल्लेशाह की गुरु
भक्ति
कहते हैं एक बार
सन्त बुल्लेशाह जी के घर पर किसी की शादी थी,
तो उन्होंने अपने गुरु साँईं इनायत जी को भी आमंत्रण किया| साँईं इनायत जी तो किसी कारण से जा ना
सके| तो उन्होंने अपने
यहाँ से दो-तीन भक्तों को भेजा|
वहाँ पर शादी में बुल्लेशाह जी इतने व्यस्त थे कि अपने गुरु जी के यहाँ से आए
व्यक्तियों का आदर सत्कार ना कर पाये|
उन्होंने जाकर अपने गुरु जी साई इनायत शाह जी से शिकायत कर दी| तब से इनायत जी बुल्लेशाह जी से नाराज
हो गये और उन्हें फरमाया कि आज के बाद हमारे सामने मत आना| अब बुल्लेशाह जी बड़े परेशान है कि वो अपने
गुरु को कैसे रिझाये| बुल्ले
शाह जी को पता था कि उनके गुरु को नृत्य देखने का बहुत शौक है| अपने गुरु को रिझाने के लिये
बुल्लेशाह जी वैश्या के घर नृत्य सीखने जाने लगे| काफी समय बीत गया| एक बार उनके गुरु साई इनायत जी का
किसी भजन संध्या में आना हुआ|
बुल्लेशाह जानते थे कि उनके गुरु नृत्य के बड़े शौक़ीन है लेकिन उनके गुरु ने उनको
सामने आने से मना किया था|
इसलिये बुल्लेशाह जी बुरखा पहनकर उनके सामने गये| ताकि उनके गुरु उन्हें देख न पाये| तब
उन्होंने नाच-नाच कर अपने गुरु को रिझाया|
जब नृत्य खत्म हुआ तो साई इनायत ने बुल्लेशाह से कहा कि ‘तू बुल्ला नी है’ तब
बुल्लेशाह जी ने कहा नहीं स्वामी जी ‘मैं बुल्ला नी भूला हाँ’| तब उनके गुरु जी ने कहा अगर ‘तू भूला
है ता मैं वी तेरे ते डुला हाँ, अर्थात मैं भी तेरे पे दयाल हुआ हूँ’|
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मदीना
शरीफ जाने की इच्छा
कहते हैं कि एक बार बुल्ले शाह जी की इच्छा हुई कि मदीना शरीफ की जियारत को जाए| उन्होंने अपनी इच्छा गुरु जी को बताई| इनायत शाह जी ने वहाँ जाने का कारण पूछा| बुल्ले शाह ने कहा कि "वहाँ हजरत मुहम्मद का रोजा शरीफ है और स्वयं रसूल अल्ला ने फ़रमाया है कि जिसने मेरी कब्र की जियारत की, उसने मुझे जीवित देख लिया|" गुरु जी ने कहा कि इसका जवाब मैं तीन दिन बाद दूँगा| बुल्ले शाह ने अपने मदीने की रवानगी स्थगित कर दी| तीसरे दिन बुल्ले शाह ने सपने में हजरत रसूल के दर्शन किए| रसूल अल्हा ने बुल्ले शाह से कहा, "तेरा मुरशद कहाँ है? उसे बुला लाओ|" रसूल ने इनायत शाह को अपनी दाईं ओर बिठा लिया| बुल्ला नजरे झुकाकर खड़ा रहा| जब नजरे उठीं तो बुल्ले को लगा कि रसूल और मुरशद की सूरत बिल्कुल एक जैसी है| वह पहचान ही नहीं पाया कि दोनों में से रसूल कौन है और मुरशद कौन है| बुल्ले शाह जी लिखते हैं -
हाजी लोक मक्के नूं जांदे
असां जाणा तख्त हजारे |
जित वल यार उसे वल काबा
भावें खोल किताबां चारे |
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