श्री महर्षि वशिष्ठ
जी की महानता
एक बार महाराजा विश्वामित्र अपनी सेना
की एक टुकड़ी को साथ लेकर वन में शिकार के लिए गए| शिकार करते हुए वे उसी वन में पहुँच
गए जहाँ महर्षि वशिष्ठ जी का आश्रम था|
महर्षि वशिष्ठ जी ने महाराजा विश्वामित्र को सेना सहित भोजन के लिए आपने आश्रम में
आमंत्रित किया| जब सब भोजन कर
चुके तो महाराजा विश्वामित्र को इस बात पर महान आश्चर्य हुआ कि महर्षि वशिष्ठ जी
ने इतने लोगों के भोजन का प्रबन्ध कैसे किया है| विश्वामित्र ने गुप्त चरों द्वारा
इसकी खोज कराई तो उन्हें ज्ञान हुआ कि महर्षि वशिष्ठ जी के पास कामधेनु है और इसी
के द्वारा उन्होंने भोजन का प्रबन्ध किया है|
विश्वामित्र ने मन में विचार किया कि ये गाय तो मेरे जैसे राजा के पास होनी चाहिए,
ऋषि-मुनियों को इससे क्या प्रयोजन? विश्वामित्र को अपनी सैनिक शक्ति का अहंकार तो
था ही, अत: उन्होंने बलपूर्वक इस गाय को प्राप्त करने का प्रयत्न किया| परन्तु महर्षि वशिष्ठ जी के ब्रह्म्बल
के समक्ष विश्वामित्र के सभी अस्त्र-शस्त्र निष्फल सिद्ध हुए और वे अपना मुहँ लेकर
राजधानी लौट गए| वे समझ गए कि
श्रत्रीय बल से ब्रह्म्बल कहीं अधिक श्रेष्ठ है, अतएव उन्होंने प्रण कर लिया कि
मुझे भी महर्षि वशिष्ठ जी की तरह ब्रह्मर्षि बनना है| “मुझे
निश्चय ही ब्रह्मर्षि बनना है”
– विश्वामित्र का यह प्रण इतना अटल और दृढ़ था और इसके लिए उन्होंने इतना कठोर तप
किया कि सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी को विश्वामित्र के सामने प्रकट होना पड़ा| ब्रह्मा जी ने जब वरदान माँगने को
कहा, तो विश्वामित्र ने अपनी इच्छा प्रकट की|
ब्रह्मा जी का उत्तर था कि आप मुझसे अन्य जो कुछ भी चाहे वरदान रूप में प्राप्त कर
सकते है, परन्तु ब्रह्मर्षि का पद मैं आपको नहीं दे सकता| यह मेरे अधिकार से बाहर है- हाँ| यदि महर्षि वशिष्ठ आपको ब्रह्मर्षि
मान ले तो आप ब्रह्मर्षि हो सकते हैं|
जिस वशिष्ठ जी से पराजित होने के कारण विश्वामित्र अपना साम्राज्य त्याग कर घोर तप
कर रहे थे, उनके समक्ष वे ब्रह्मर्षि बनने के लिए झुके, यह उन्हें कैसे सहन होता?
उन्होंने पुनः कठिन तप किया| परन्तु उन्हें अपने ध्येय में सफलता न मिली| तप से शिवजी तक प्रसन्न हुए और उन्हें
अनेकों वरदान दिए, तप से नवीन सृष्टि की रचना करने की सामर्थ्य तक उन्हें प्राप्त
हो गया, परन्तु ब्रह्मर्षि का पद प्राप्त न हुआ| अन्य सब उन्हें यह पद देने में अपनी
असमर्थता प्रकट कर रहे थे| और महर्षि वशिष्ठ जी उन्हें ‘ब्रह्मर्षि न कहकर राज
श्री’ कहते थे जिसे सुनकर विश्वामित्र के हृदय में क्रोधागिन धधकने लगती थी| बढ़ते-बढ़ते क्रोध की ज्वालायें इतनी
बढ़ी कि विश्वामित्र ने राक्षस द्वारा वशिष्ठ जी के सभी पुत्रों का वध करवा डाला,
परन्तु वशिष्ठ जी ने हृदय में रती भर भी क्रोध उत्पन्न न हुआ| अपितु वे इतना सब कुछ होते हुए भी
शान्त रहे| अन्त में
विश्वामित्र ने महर्षि वशिष्ठ जी की हत्या करने का ही प्रण कर लिया| वे इस बात से भलीभांति परिचित थे कि
महर्षि वशिष्ठ जी की जानकारी में वे उनका अनिष्ट नहीं कर सकते, अतएव उन्होंने
रात्रि में छिपकर वशिष्ठ जी का वध करने की योजना बनाई| रात्रि होने पर शस्त्र लेकर वे छिपते
हुए महर्षि वशिष्ठ जी के आश्रम पर जा पहुँचे और एक स्थान पर छिपकर अवसर की
प्रतीक्षा करने लगे| पूर्णिमा की रात
थी निर्मल आकाश में तारागणों के मध्य चन्द्रमा शोभामान था और उसकी निर्मल, शुभ
ज्योत्स्ना संसार को आलौकित कर रही थी|
महर्षि वशिष्ठ जी अपने शिष्यों के साथ कुटिया के बाहर बैठकर उस शुभ ज्योत्स्ना का
आनन्द ले रहे थे| “चन्द्रमा
की निर्मल-पवित्र ज्योत्स्ना आज संसार को आलोकित कर रही है गुरुदेव|”
एक शिष्य ने कहा| सुनकर महर्षि
वशिष्ठ बोले- “जिस प्रकार आज यह
ज्योत्स्ना संसार को आलौकित कर रही है, उसी प्रकार आजकल विश्वामित्र के तप का तेज
भी संसार को आलौकित कर रहा है|
“महर्षि
वशिष्ठ के ये शब्द सुनते ही विश्वामित्र चौंक उठे| वे मन ही मन सोचने लगे- कितने महान
हैं महर्षि वशिष्ठ| मैंने इनका अनिष्ट
करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, परन्तु ये फिर भी अपने शिष्यों के समक्ष मेरी प्रशंसा
कर रहे हैं, वह भी मेरी पीठ पीछे, इधर मैं कितना अधम हूँ कि इनका ही वध करने के
लिए यहाँ छिपा बैठा हूँ|
किये हुए अनुचित कर्मो के प्रति ह्रदय में ग्लानि उत्पन्न हुई| नेत्रों में पश्चाताप के आँसू लिये वे
वशिष्ठ जी के चरणों में जा गिरे|
घृणा ने प्रेम के समक्ष और क्रोध ने अक्रोध के समक्ष पराजय स्वीकार कर ली| “उठो,
ब्रह्मर्षि विश्वामित्र|”
कहते हुए महर्षि वशिष्ठ जी ने उन्हें उठाकर अपने हृदय से लगा लिया| उनके हृदय में मानो उनके प्रति कोई
विद्वेष था ही नहीं और ब्रह्मर्षि विश्वामित्र जिस पद को वर्षो के कठोर तप द्वारा
भी प्राप्त न कर सके|
उसी पद को नम्रता एवं दीनता से उन्होंने एक श्रण में ही प्राप्त कर लिया|
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