शबरी
की जीवन कथा
कहते
हैं कि पिछले कर्मों से शबरी का जन्म भक्ति भाव वाले परिवार में हुआ और उसके अंदर
भक्ति के गुण बचपन से ही थे| लेकिन रंग-रूप में शबरी बिल्कुल सुंदर नहीं थी और थी
भी भील जाति की| कहते हैं जब शबरी की शादी करवा दी गई तो उसकी डोली को उठाकर चार
व्यक्ति ले जा रहे थे, तो रास्ते में शबरी
को प्यास लगी| उसका पति घोड़े पर सवार था वह उसके लिए पानी लेने गया| जब वह शबरी को
पानी पिलाने लगा और जब उसने शबरी की सूरत देखी तो वह चकित हो गया और शबरी को वही छोड़
कर चला गया| शबरी घबराई नहीं अपितु खुश हुई कि भगवान ने मुझे आजाद कर दिया है| अब
वह वहीं पर झोपड़ी बना कर रहने लगी वहीं थोड़ी दूर ही संतो के रहने का स्थान नजर आया
तो उसके मन में इच्छा हुई कि वह संतो की सेवा करे और अपने जीवन को धन्य करे| लेकिन
वह डरती थी कि संतो को अगर पता चल गया कि मैं नीच जाति की कुरूप हूँ तो मुझे सेवा
नहीं करने देंगे| संतो के आश्रम से कुछ दूरी पर एक सरोवर बना था| सभी संत सुबह जब
प्रकाश पूरी तरह नहीं होता, उस समय सरोवर में स्नान करने जाते थे| शबरी ने उसी समय
पर संतो के आश्रम में जाकर सेवा करना शुरू कर दिया| वह संतो के आश्रम की साफ़ सफाई
करती फिर भगवान के पूजन के लिए फूल तैयार करके रखती| संत जन जब वापिस आते तो वे
बड़े हैरान होते कि ये कौन भक्तजन है जो रोज आश्रम में आकर सेवा कर जाता है? एक दिन
उन ऋषियों में सबसे बड़े ऋषि मतंग जी ने दूसरे ऋषियों से कहा कि मैं आज उस सेवा
करने वाले से मिलना चाहता हूँ| जब सारे चले गए, तो थोड़ी देर बाद शबरी उनके आश्रम
में झाड़ू लगाने आई| तब मतंग ऋषि ने शबरी को देखा और उसके पास पहुँच कर उससे पूछने लगे
कि तुम कौन हो? तब शबरी ने कहा कि मैं नीच जाति की भीलनी हूँ| तब मतंग ऋषि ने कहा
कि तुम नीच नहीं बल्कि तुम भगवान की प्रिय हो| मतंग जी ने प्रसन्न होकर उसे नाम की
दीक्षा दी और शबरी को अपनी शिष्या बना लिया| मतंग ऋषि ने अन्य ऋषियों को भी शबरी
के बारे में बताया| लेकिन वे शबरी से घृणा
करते थे और उसे नीच जाति की समझ कर उससे दूर रहते थे| मतंग ऋषि अन्य ऋषियों को
शबरी से घृणा करने के लिए मना करते थे| परन्तु कुछ ऋषि न समझे| एक दिन वे ऋषि
स्नान करके वापिस आश्रम आ रहे थे अभी दिन पूरी तरह से चढ़ा नहीं था| अँधेरे में
किसी ऋषि का टकराव शबरी से हो गया शबरी के टकराते ही वे शबरी को बुरा कहने लगे और
दोबारा सरोवर में स्नान करने लगे तो देखते है कि उनके सरोवर में जाते ही सरोवर का
पानी गन्दा हो गया उसमे विषैले पदार्थ आ गए और वह अब सरोवर स्नान करने योग्य नहीं
रह गया| उन ऋषियों ने सारा दोष शबरी पर लगा दिया और उसे आश्रम की सेवा के लिए मना
कर दिया| मतंग ऋषि ने ऐसा करने से मना किया लेकिन वे ऋषि न माने| कुछ समय पश्चात मतंग
ऋषि के संसार को त्यागने का समय निकट आ गया| उन्होंने शबरी को बुलवाया और वचन
फरमाए कि भगवान श्री राम जी का अयोध्या में जन्म होगा| बड़े होकर जब वे वनवास पर
जायेंगे तब वे आपके आश्रम में आयेंगे| और अन्य ऋषियों से कहा कि तुम भी दर्शन करना
और उनके चरणों की धूल को सरोवर में डालना सरोवर का जल साफ़ हो जायेगा| सभी ऋषि मुनि
मन-ही-मन सोचने लगे, हम तपस्वी है, हमारे पास भगवान आयेंगे ना कि इस नीच जाति की
शबरी के पास| अब यह कहकर मतंग ऋषि ने शरीर त्याग दिया| अब शबरी अपने प्रभु के आने
का इन्तजार करने लगी| रोज सुबह उठ कर अपनी झोपड़ी से लेकर दूर तक झाड़ू लगाती कि कहीं
भगवान को कोई कांटा ना चुभ जाए| रोज जंगल से बेर चुन कर लाती और उन्हें खाकर देखती
कि कही कोई बेर खराब तो नहीं है| ऐसे करते-2 अनेकों वर्ष बीत गए| श्री राम जी का
अब उसी तरफ आना हुआ| सभी ऋषि मुनियो को जब यह पता चला कि भगवान श्री राम जी इस तरफ
आ रहे है तो वे तैयारी करने लगे कि भगवान हमारे आश्रम में आयेंगे| लेकिन भगवान ने
रास्ता बदल दिया, वे शबरी के आश्रम में चले गए| वहाँ शबरी को दर्शन दिए और उसे
भक्ति से मालो-माल कर दिया| शबरी को भगवान ने नवधा भक्ति के बारे में बताया| सभी
ऋषि मुनियों ने भी भगवान के दर्शन पाए|
तब
उन्होंने श्री राम जी से माफ़ी माँगी कि हमें माफ कर दो हमने शबरी को गलत समझा और
श्री राम जी से विनती की- ‘हे प्रभु आप हमें अपने चरणों की धूल दे ताकि हम उस धूल
को अपने सरोवर में डाल कर उसे पवित्र बना सकें|’ तब श्री राम जी ने वचन फरमाए कि
मेरा स्वभाव है कि कोई हमारे बारे में गलत कहे हमें कोई परवाह नहीं लेकिन कोई
हमारे भक्त के साथ गलत व्यवहार करे तो यह हमें पसंद नहीं, आप सभी शबरी से माफ़ी माँगे
और उसके चरणों की धूल ले जाकर सरोवर में डाले तभी वह सरोवर पवित्र होगा| तब सभी ने
ऐसा ही किया और भगवान की कृपा से अपने आप
को कृतार्थ किया|
*****
नवधा भक्ति का
उपदेश
भगवान श्री राम जी शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश करते हुए
बताते है
नवधा भक्ति कहउँ
तोहि पाही|
सावधान सुनु धरु मन
माहि||
1.
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा|
भगवान फरमाते हैं
कि प्रथम भक्ति- ‘सन्तो का संग’ अर्थात पहली भक्ति है- संतो-सत्पुरुषों का संग
अर्थात सत्संग| भगवान ने सत्संग
को पहली भक्ति क्यों बतलाया? इसलिए कि सत्संग में ही मनुष्य को विवेक की प्राप्ति
होती है|
2.
दुसरि रति मम कथा प्रसंगा
‘कथा प्रसंगा’ का
अर्थ यहाँ भगवान की कथाओं का श्रवण करना तो है ही, भगवानचर्चा| भगवान की लीला कथाओं
का वर्णन सुनकर प्रेम- विभोर हो जाना, शरीर में रोमाँच हो जाना तथा नेत्रों से
प्रेम आँसू प्रवाहित होने लगना- यह भक्ति का लक्षण है| ‘ हृदय माहि प्रेम जो, नैनो
झलके आये’
कुलिस कठोर निठुर
सोई छाति
सुनि हरी चरित न जो
हर्षाति
अर्थ- “वह
हृदय वज्र के समान कठोर एवं निष्ठुर है, जो भगवान के चरित्र सुनकर हर्षित नहीं
होता|
3.
गुरु पद पंकज सेवा, तीसरि भगति अमान|
अर्थात तीसरी भक्ति
है- अभिमान रहित होकर गुरुदेव के चरण – कमलों की सेवा करना| गुरु दरबार में तो अनेकों
ही सेवक रहते है और सभी सेवा करते है, परन्तु सेवा वास्तव में वही है, जो अभिमान
से रहित होकर की जाये| हनुमान जी श्री राम जी के प्यारे सेवक थे क्योंकि उनमे
लेशमात्र भी अभिमान नहीं था|
4. चौथि भगति मम गुन गन|
करइ कपट तजि गान||
अर्थात चौथी भक्ति है- कपट का त्याग कर भगवान के गुणों का गान
करना| भगवान फरमाते हैं कि गुण- स्तुति गायन करते समय मन में तनिक भी छल, कपट,
दिखावा व आडम्बर न हो| भगवान को छल कपट तथा आडम्बर आदि तनिक भी पसंद नहीं है| भगवान
के वचन है कि
निर्मल मन जन सो
मोहि पावा|
मोहि कपट छल छिद्र न
भावा||
5. मन्त्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा|
पंचम भजन सो वेद प्रकासा||
अर्थात हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर सतगुरु से प्राप्त नाम
मन्त्र का जाप करना- यह पांचवी भक्ति है जो वेदों में प्रसिद्ध है| मन्त्र का जाप
करते समय हृदय में पूर्ण श्रद्धा
एवं विश्वास होना चाहिए| बिना विश्वास के की गई भक्ति कभी फलीभूत नहीं होती और न
ही इष्टदेव की कृपा प्राप्त होती है| इसलिए हृदय में श्रद्धा एवं विश्वास रखकर
नित्यप्रति नियमपूर्वक भजन करना चाहिए|
6. छठ दम सील बिरति बहु करमा|
निरत निरंतर सज्जन धरमा||
अर्थात छठी भक्ति
है- इन्द्रियों का निग्रह, शील, बहु कार्यों से वैराग तथा सदैव संत-सत्पुरुषों के
निधारित किये हुए श्रम (आचरण) में लगे रहना|
पहली बात-
इन्द्रियों को विषय विकारों में जाने से रोकना है जब तक इन्द्रियाँ विषयों की ओर
भागती रहेगी मनुष्य भजन भक्ति नहीं कर सकता|
दूसरी बात जो व्यक्ति शील अर्थात अच्छा स्वभाव व चरित्र
वाला है वही भजन भक्ति कर सकता है| दुश्चरित्र व्यक्ति तो सदा बुरे आचरण में निवृत
रहता है| पांडव शीलवान थे, तभी भगवान के प्यारे थे| कौरवों में शील का अभाव था|
तीसरी बात जो भगवान
ने कही है वह है बहु कार्यों से वैराग्य| जिस मनुष्य का मन संसार के अनेकों कार्यो
में फँसा रहता है, उसका मन संसार में ही लगा रहता है| ऐसा व्यक्ति भक्ति भजन क्या
करेगा?
चौथी बात जो भगवान ने छठी भक्ति के अंतर्गत कही है वह है- सदा
संत सत्पुरुषों द्वारा बताये गए धर्म के मार्ग पर चलना|
7. सातवँ सम मोहि मय जग देखा|
मोतें संत अधिक करि लेखा||
अर्थात सारे संसार में प्रभु को देखना और सत्पुरुषों को भगवान
से अधिक मानना | ऐसा भगवान ने इसलिए कहा क्योंकि संत शरण व् उनके माध्यम से ही जीव
को भगवान की प्राप्ति होती है|
8. आठवँ
जथा लाभ संतोषा|
सपनेहुँ
नहीं देखइ परदोषा||
जो कुछ मिल जाये उसी में संतोष करना और स्वपन में भी पराये
दोषों को न देखना, यह आठवी भक्ति है|
9. नवम सरल सब सन छलहीना|
मम भरोस हियँ हरष न दीना||
सबके साथ सरल स्वभाव से और कपट रहित होकर व्यवहार करना, हृदय
में भगवान पर भरोसा रखना और हर्ष तथा विषाद से न्यारा रहना नवी भक्ति है|
जो इस नवधा भक्ति को हृदय में अपना लेता है वह अपने ईष्ट देव
की कृपा एवं प्रसन्नता प्राप्त कर अपना लोक- परलोक सवाँर लेता है और अपना जन्म सफल
कर लेता है |
*****
शबरी के झूठे बेर
भगवान श्री राम जी
जब शबरी के आश्रम में गए थे, उस समय शबरी ने प्रेम से संचित किये हुए बेर भगवान को
भोग लगाने के लिए दिए थे| तब भगवान ने बड़े प्रेम से उन बेरों की सराहना
करते हुए भोग लगाया तथा लक्ष्मण जी को भी खाने के लिए बेर दिए| परन्तु
सुमित्रानंदन ने उन बेरों को न खाकर भगवान की दृष्टि से बचाते हुए पीछे की ओर फैंक
दिए| उन प्रेम से सने बेरों का यह अपमान देखकर भगवान को भीतर से शोक तो हुआ फिर भी
प्रत्यक्ष रूप में उन्होंने लक्ष्मण से कुछ न कहा| आगे चलकर जब लंका के युद्ध में मेघनाथ
द्वारा तीर लगने पर लक्ष्मण मूर्छित हो गए थे| तब वही बेर संजीवनी बन कर उनके सामने
आये और उनको घोट कर वह रस लक्ष्मण के मुँह में डाला गया तथा उसकी मरहम बना कर घावों
पर लगाया गया| सच है भगवान को स्वयं का अपमान दुःख नहीं पहुँचाता, परन्तु जब कोई
उनके भक्त का तिरस्कार करता है तो उस समय वह अपने भक्त का अपमान सहन नहीं कर सकते
क्योंकि वह अपने प्रेमियों को अपने प्राणों से बढ़कर समझते है|
*****
अहिल्या का उद्धार
प्रातःकाल
जब राम और लक्ष्मण ऋषि विश्वामित्र के साथ मिथिलापुरी के वन उपवन आदि देखने के
लिये निकले तो उन्होंने एक उपवन में एक निर्जन स्थान देखा। राम बोले, “भगवन
यह स्थान देखने में तो आश्रम जैसा दिखाई देता है किन्तु क्या कारण है कि यहाँ कोई
ऋषि या मुनि दिखाई नहीं देते?” विश्वामित्र जी ने बताया, "यह
स्थान कभी महात्मा गौतम का आश्रम था। वे अपनी पत्नी अहिल्या के साथ यहाँ रह कर
तपस्या करते थे। एक दिन जब गौतम ऋषि आश्रम के बाहर गये हुये थे तो उनकी अनुपस्थिति
में इन्द्र ने गौतम के वेश में आकर अहिल्या से प्रणय याचना की। यद्यपि अहिल्या ने इन्द्र को पहचान लिया था तो भी यह विचार
करके कि मैं इतनी सुन्दर हूँ कि देवराज इन्द्र स्वयं मुझ से प्रणय याचना कर रहे
हैं, अपनी स्वीकृति दे दी। जब इन्द्र अपने लोक लौट रहे थे तभी अपने
आश्रम को वापस आते हुये गौतम ऋषि की दृष्टि इन्द्र पर पड़ी जो उन्हीं का वेश धारण
किये हुये था। वे सब कुछ समझ गये और उन्होंने इन्द्र को श्राप दे दिया। इसके बाद
उन्होंने अपनी पत्नी को भी श्राप दिया कि रे दुराचारिणी तू हजारों वर्ष तक केवल
हवा पीकर कष्ट उठाती हुई यहाँ राख में पड़ी रहे| जब श्री राम जी इस वन में प्रवेश
करेंगे तभी उनकी कृपा से तेरा उद्धार होगा| तभी तू अपना पूर्व शरीर धारण करके मेरे पास आ सकेगी। यह कह
कर गौतम ऋषि इस आश्रम को छोड़कर हिमालय पर जाकर तपस्या करने लगे। इसलिये हे राम अब
तुम आश्रम के अंदर जाकर अहिल्या का उद्धार करो|
विश्वामित्र जी की बात सुनकर वे दोनों भाई आश्रम
के भीतर प्रविष्ट हुये। वहाँ तपस्या में निरत अहिल्या कहीं दिखाई नहीं दे रही थी, केवल
उसका तेज सम्पूर्ण वातावरण में व्याप्त हो रहा था। जब अहिल्या की दृष्टि राम पर
पड़ी तो उनके पवित्र दर्शन पाकर एक बार फिर सुन्दर नारी के रूप में दिखाई देने
लगी। नारी रूप में अहिल्या को सम्मुख पाकर राम और लक्ष्मण ने श्रद्धापूर्वक उनके
चरण स्पर्श किये। उससे उचित आदर सत्कार ग्रहण कर वे मुनिराज के साथ पुनः मिथिला
पुरी को लौट आये।
*****
अयोध्या
वासियों से भगवान का मिलाप
जब
भगवान श्री राम जी लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे तो हर एक अयोध्या वासी के मन में
ये भावना थी कि मैं भगवान से किस प्रकार मिलूँगा| मेरा प्रेम किस प्रकार पूरा होगा|
भगवान जब आयेंगे तो इतनी भीड़ के अंदर मैं किस प्रकार मिल पाऊंगा| क्या भगवान मुझे
पहचानेगे या नहीं पहचानेगे| लेकिन भगवान तो फिर भगवान ही होते है| वो तो हर एक के
भाव को देखते है उस समय का वर्णन करते हुंए भगवान शंकर जी ये कथन करते है –
श्रीन
में सभि मिलिए भगवन
*****
माता कौशल्या के
यहाँ भोजन
एक बार की बात है
जब भगवान श्री राम जी अयोध्या में आये चौदह बरस के बनवास के बाद, उस समय माँ कौशल्या ने भाव से बड़े
अच्छे -2 छत्तीस प्रकार के व्यंजन बनाये| तो जैसे माताओं का स्वभाव होता है कि
बच्चों से पूछती हैं कि आपको भोजन अच्छा लगा है तो भगवान श्री राम जी से भी उनकी माँ
पूछ रही है कि बेटा राम,
तुझे ये भोजन अच्छा लगा? चौदह बरस के बनवास के बाद आपको ये घर का भोजन मिल रहा है| उस समय भगवान श्री राम
जी ने धीरे से कहा कि हाँ माँ अच्छा है| माँ समझ गई कि इनको अच्छा नहीं लगा क्योंकि
इनका दिल नहीं बोल रहा है| दूसरी बार प्रभु राम से माँ ने फिर पूछा| तो फिर श्री
राम जी ने कहा कि माँ ठीक है| माँ ने कहा कि राम दिल से बता भोजन कैसा लगा? जब कई बार
माँ ने पूछा तब अंत में श्री राम जी ने कहा माँ अगर सच्ची बात पूछती है तो सच ये
है कि जो आनंद मुझे शबरी के झूठे और सूखे बेरों में मिला था, वो आनंद इन पदार्थो
में नहीं| इससे निष्कर्ष निकलता है कि प्रभु प्यार के भूखे है पदार्थो के नहीं |
*****
नाम की महिमा
उत्तर रामायण के अनुसार अश्वमेघ यज्ञ पूर्ण होने के पश्चात भगवान श्रीराम ने बड़ी सभा का आयोजन कर सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों, किन्नरों, यक्षों व राजाओं आदि को
उसमें आमंत्रित किया। सभा में आए नारद मुनि के भड़काने पर एक राजन ने भरी सभा में ऋषि विश्वामित्र को छोड़कर सभी को प्रणाम किया। ऋषि विश्वामित्र
गुस्से से भर उठे और उन्होंने भगवान श्रीराम से कहा कि अगर सूर्यास्त से पूर्व
श्रीराम ने उस राजा को मृत्यु दंड नहीं दिया तो वो राम को श्राप दे देंगे। इस पर श्रीराम
ने उस राजा को सूर्यास्त से पूर्व मारने का प्रण ले लिया। श्रीराम के प्रण की खबर
पाते ही राजा भागा-भागा हनुमान जी की माता अंजनी की शरण में गया तथा बिना पूरी बात
बताए उनसे प्राण रक्षा का वचन मांग लिया। तब माता अंजनी ने हनुमान जी को राजन की
प्राण रक्षा का आदेश दिया। हनुमान जी ने श्रीराम की शपथ लेकर कहा कि कोई भी राजन
का बाल भी बांका नहीं कर पाएगा परंतु जब राजन ने बताया कि भगवान श्रीराम ने ही
उसका वध करने का प्रण किया है तो हनुमान जी धर्म संकट में पड़ गए कि राजन के प्राण
कैसे बचाएं और माता का दिया वचन कैसे पूरा करें तथा भगवान श्रीराम को श्राप से
कैसे बचाएं। धर्म संकट में फंसे हनुमानजी को एक योजना सूझी। हनुमानजी ने राजन से
सरयू नदी के तट पर जाकर राम नाम जपने के लिए कहा। हनुमान जी खुद सूक्ष्म रूप में
राजन के पीछे छिप गए। जब राजन को खोजते हुए श्रीराम सरयू तट पर पहुंचे तो उन्होंने
देखा कि राजन राम-राम जप रहा है। प्रभु श्रीराम ने सोचा, "ये तो भक्त है, मैं भक्त के प्राण कैसे
ले लूं"। श्री राम ने राज भवन लौटकर ऋषि विश्वामित्र से अपनी
दुविधा कही। विश्वामित्र अपनी बात पर अडिग रहे और जिस पर श्रीराम को फिर से राजन
के प्राण लेने हेतु सरयू तट पर लौटना पड़ा। अब श्रीराम के समक्ष भी धर्मसंकट खड़ा
हो गया कि कैसे वो राम नाम जप रहे अपने ही भक्त का वध करें। राम सोच रहे थे कि
हनुमानजी को उनके साथ होना चाहिए था परंतु हनुमानजी तो अपने ही आराध्य के विरुद्ध
सूक्ष्म रूप से एक धर्मयुद्ध का संचालन कर रहे थे। हनुमानजी को यह ज्ञात था कि राम
नाम जपते हुए राजन को कोई भी नहीं मार सकता, खुद मर्यादा पुरुषोत्तम राम भी नहीं। श्रीराम ने
सरयू तट से लौटकर राजन को मारने हेतु जब शक्ति बाण निकाला तब हनुमानजी के कहने पर
राजन राम-राम जपने लगा। राम जानते थे राम-नाम जपने वाले पर शक्तिबाण असर नहीं
करता। वो असहाय होकर राजभवन लौट गए। विश्वामित्र उन्हें लौटा देखकर श्राप देने को
उतारू हो गए और राम को फिर सरयू तट पर जाना पड़ा। इस बार राजा
हनुमान जी के इशारे पर जय जय सियाराम जय जय हनुमान गा रहा था। प्रभु श्री राम ने
सोचा कि मेरे नाम के साथ-साथ ये राजन शक्ति और भक्ति की जय बोल रहा है। ऐसे में
कोई अस्त्र-शस्त्र इसे मार नहीं सकता। इस संकट को देखकर श्रीराम मूर्छित हो गए। तब
ऋषि वशिष्ठ ने ऋषि विश्वामित्र को सलाह दी कि राम को इस तरह संकट में न डालें।
उन्होंने कहा कि श्रीराम चाह कर भी राम नाम जपने वाले को नहीं मार सकते क्योंकि जो
बल राम के नाम में है और खुद राम में नहीं है। संकट बढ़ता देखकर ऋषि विश्वामित्र
ने राम को संभाला और अपने वचन से मुक्त कर दिया। मामला संभलते देखकर राजा के पीछे
छिपे हनुमान वापस अपने रूप में आ गए और श्रीराम के चरणों मे आ गिरे। तब प्रभु
श्रीराम ने कहा कि हनुमानजी ने इस प्रसंग से सिद्ध कर दिया है कि भक्ति की शक्ति
सैदेव आराध्य की ताकत बनती है तथा सच्चा भक्त सदैव भगवान से भी बड़ा रहता है। इस
प्रकार हनुमानजी ने राम नाम के सहारे श्री राम को भी हरा दिया।
*****
श्री राम जी का
भ्रमण करना
बात
उस समय की है जब राज्य की व्यवस्था के लिये शत्रुध्न को मथुरा में और लव कुश आदि
राजकुमारों को भिन्न -2 स्थानों में भगवान श्री राम जी ने नियुक्त कर रखा था| भगवान
ने उन्हें सन्मार्ग पर अत्यधिक दृढ़ बनाने के लिए प्रत्येक से अलग -2 मिलना चाहा| विभीषण
से मिलना अधिक आवश्यक था;
क्योंकि उनके अनुचर
राक्षस थे| वे देवता और मनुष्य के प्रति कलुषित आचारण करते थे| इस
लिए लंकापुरी में जाकर राक्षसराज को फिर से बोध कराना आवश्यक था| भगवान श्री राम के
साथ भरत भी चलने को तैयार हो गये| लक्ष्मण
को नगर रक्षा का भार सौंपकर भगवान श्री राम जी ने पुष्पक विमान का स्मरण किया| उस विमान पर दोनों
भाई चढ़कर सबसे पहले गान्धार देश गये| वहाँ
भगवान ने भरत के दोनों पुत्रों की राजनीति का निरीक्षण किया| उन्हें उचित शिक्षा देकर वे पूर्व दिशा
में जाकर लक्ष्मण के पुत्रों से मिले| वहाँ
छः रातें बितायीं| उसके बाद दोनों भाई
दक्षिण दिशा की ओर बढ़े|
गंगा स्नान कर तथा महर्षि भारद्वाज को प्रणाम कर यमुना के संगम में वे अत्त्रि
मुनि के आश्रम में गए| उनका आशीर्वाद लेकर जनस्थान की ओर बढ़े| वहाँ उन्होंने भरत जी को वहाँ की आप बीती
घटनाएँ सुनायीं| किष्किन्धापुरी में
दोनों भाई उतर गये| कपिराज सुग्रीव
दोनों भाईयों को देखकर बहुत हर्षित हुए| उन्होंने
सादर प्रणाम कर उन्हें अपने सिंहासन पर बैठाया और बड़ी प्रसन्नता से निवेदन किया कि
'मैं, मेरा परिवार, सारा राज्य आपको न्योछावर है|' ऐसा कहकर कपिराज सुग्रीव भगवान के
चरणों पर गिर पड़े| उसके बाद हनुमान,
अंगद, जामवंत, नल –नील सभी बड़े –छोटे लोगो से वह सभा भवन ठसा ठस भर गया| लोगो के
नेत्र भगवान के रुपमाधुर्य का अद्भुत रसपान कर रहे थे| प्रेमाश्रुओं से सभा भवन
गीला हो गया| जब सुग्रीव को पता
चला कि भगवान श्री राम विभीषण को भी कृतार्थ करने जा रहे हैं, तब उन्होंने भी साथ चलने के लिए
प्रार्थना की| भगवान ने सुग्रीव
को भी साथ ले लिया| विमान तुरंत ही
समुन्द्र के तट पर जा पहुँचा| भगवान ने भरत को वह स्थल दिखाया जहाँ विभीषण शरणागत
हुए थे और तीन ही दिनों में पुल बनने की बात भी बतायी| इसके बाद विमान समुद्र के उस पार जा
पहुँचा, जहाँ सीता की अग्नि
परीक्षा हुई थी| उस स्थान पर विमान
तब तक रुका रहा, जब तक भगवान वहाँ
का वृतान्त बताते रहे| विमान
देखकर राक्षस व विभीषण जी दौड़ते हुए आये और पृथ्वी पर लेटकर उन्होंने भगवान को
साष्टांग प्रणाम किया| विभीषण
ने कहा भगवान मेरा जन्म सफल हो गया और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो गए; क्योंकि आपके
चरणों के दर्शन हुए| इसके बाद विभीषण
भरत जी और सुग्रीव जी से गले मिले| उन्हें
रावण के जगमगाते भवन में ठहराया गया| प्रभु
श्री राम जी को आसन पर बैठाकर और उनकी पूजा कर विभीषण बोले -'मैं भगवान को क्या
भेंट करूँ; क्योंकि कुटुम्ब के
साथ मुझे इन्होंने प्राणदान भी दिये है| सारी
लंका मुझे दी है| इस तरह सारी
वस्तुएँ इन्हीं की दी हुई हैं तो इन्हें क्या भेंट दूँ? फिर भी हम सब आपको समर्पित हैं|' थोड़ी ही देर में दर्शनार्थियों से वह सारा स्थान भर गया| सबने श्री राम, भरत और सुग्रीव जी के
दर्शन से अपने जीवन को कृतार्थ किया| राजमाता
कैकसी अपने बहुओं के साथ भगवान के पास आना चाहती थीं, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम
श्री राम स्वयं जाकर उनसे मिले| कैकसी
बहुत प्रसन्न थीं| उन्होंने बहुत
आशीर्वाद दिये और यह भी बतलाया कि मेरे पतिदेव ने, जितनी भी घटनाएँ घटी हैं, मुझे पहले ही बतला रखा था| इसलिये मैंने तुम्हें पहचान लिया कि
तुम विष्णु हो, सीता लक्ष्मी है और
वानर देवता हैं; तुम्हें अमर यश
प्राप्त हो| विभीषण की पत्नी
सरमा सीता से बहुत प्रेम करती थी| उन्हें
देखने के लिये व्यग्र रहा करती थी|
इसलिए उसने प्रेमोपालम्भ में कहा भगवन सीता के बिना आप शोभा नहीं पाते, उन्हें साथ
लाना चाहिए था| भगवान श्री राम ने सरमा से कहा-'मुझे छोड़कर सीता
चली गयी है| उसके बिना मुझे एक
क्षण भी चैन नहीं मिलता,
सारी दिशाएँ सूनी - सूनी दिखती हैं| सबको विदा कर भगवान श्री राम ने विभीषण को
उचित मार्ग का निर्देश दिया| यह
भी बतलाया कि तुम्हें अपने बड़े भाई कुबेर के आज्ञानुसार चलना चाहिये, देवताओं का प्रियकर होना चाहिये, उनका कभी अपराध नहीं करना चाहिये तथा
यदि कोई मनुष्य लंका में आ जाये तो राक्षस उसे कोई हानि न पहुँचाए| विभीषण ने भगवान
की आज्ञा को सिर पर चढ़ाया| विभीषण
के कहने से भगवान ने पुल कई टुकड़ों में तोड़ दिया| उसी अवसर पर वायु देवता वहाँ आये| उन्होंने श्री राम से निवेदन किया कि
लंका में वामन भगवान की मूर्ति पड़ी हुई है|
इसे आप कान्यकुब्ज में ले जाकर
प्रतिष्ठित कर दें| तत्पश्चात् विभीषण ने
मूर्ति को बहुमूल्य रत्नों से विभूषित कर पुष्पक विमान पर रख दिया| इसके बाद भगवान
जी भरत और सुग्रीव के साथ पुष्पक विमान पर चढ़कर समुन्द्र पार पहुँचे और वहाँ पहुँच
कर रामेश्वर की पूजा की| भगवान शंकर ने सुधा शक्ति वाणी में उन्हें आशीर्वाद दिया| इसके बाद भगवान पुष्कर की ओर बढ़े और
वहाँ पिता मह ब्रम्हा से मिलकर मथुरापुरी में शत्रुघ्न के पास गये| शत्रुघ्न ने अपने पुत्रों के साथ भगवान श्री राम को प्रणाम किया| भगवान
श्री राम ने यहाँ पाँच दिन बिताये| इस
तरह अपने आश्रितों की देखभाल कर गंगा तट पर पहुँचकर उन्होंने भगवान वामन की
स्थापना की, लंका से प्राप्त धन को ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में देकर
संतुष्ट किया तथा यहीं से सुग्रीव को किष्किन्धा भेज दिया और स्वयं भरत के साथ
पुष्पक पर सवार होकर अयोध्या लौट आये|
*****
हनुमान जी का
जन्म
हनुमान
जी के धर्म पिता वायु थे, इसी
कारण उन्हे पवन पुत्र के नाम से भी जाना जाता है। बचपन से ही दिव्य होने के साथ
साथ उनके अन्दर असीमित शक्तियों का भण्डार था | बालपन
में एक बार सूर्य को पका हुआ फ़ल समझकर उसे वो खाने के लिये उड़ कर जाने लगे, उसी
समय इन्द्र ने उन्हे रोकने के प्रयास में वज्र से प्रहार कर दिया, वज्र
के प्रहार के कारण बालक हनुमान जी की ठुड्डी टूट गई और वे मूर्छित हो कर धरती पर
गिर गये। इस घटना से कुपित होकर पवन देव ने संसार भर मे वायु के प्रभाव को रोक
दिया जिसके कारण सभी प्राणियों मे हाहाकार मच गया। वायु देव को शान्त करने के लिये
अंततः इन्द्र ने अपने द्वारा किये गये वज्र के प्रभाव को वापस ले लिया। साथ ही साथ
अन्य देवताओं ने बालक हनुमान जी को कई वरदान भी दिये। यद्यपि वज्र के प्रभाव ने
हनुमान जी की ठुड्डी पर कभी ना मिटने वाला चिन्ह छोड़ दिया था, तदुपरान्त
जब हनुमान को सूर्य के महा ज्ञानी होने का पता चला तो उन्होंने सूर्य से विनती की
कि वो उन्हें अपना शिष्य स्वीकार करें। मगर सूर्य ने उनका अनुरोध ये कहकर अस्वीकार
कर दिया कि चुंकि वो अपने कर्म स्वरूप सदैव अपने रथ पर भ्रमण करते रहते हैं, अतः
हनुमान प्रभावपूर्ण तरीके से शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाएँगे। सूर्य देव की बातों से
विचलित हुए बिना हनुमान ने अपने शरीर को और बड़ा करके अपने एक पैर को पूर्वी छोर
पे और दूसरे पैर को पश्चिमी छोर पे रखकर पुनः सूर्य देव से विनती की और अंततः
हनुमान की दृढ़ता से प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें अपना शिष्य स्वीकार कर लिया। तदोपरान्त हनुमान ने सूर्य देव के साथ निरंतर भ्रमण करके अपनी
शिक्षा ग्रहण की। शिक्षा पूर्ण होने के उपरांत हनुमान ने सूर्य देव से
गुरु-दक्षिणा लेने के लिये आग्रह किया परन्तु सूर्य देव ने ये कहकर मना कर दिया कि
'तुम जैसे समर्पित शिष्य को शिक्षा प्रदान करने में मैने जिस आनंद
की अनुभूती की है वो किसी गुरु-दक्षिणा से कम नहीं है'। परन्तु हनुमान के पुनः आग्रह करने पर सूर्य देव ने गुरु-दक्षिणा
स्वरूप हनुमान को सुग्रीव(धर्म पुत्र-सूर्य)की सहायता करने की आज्ञा दे दी।
हनुमान के इच्छानुसार सूर्य देव का हनुमान को
शिक्षा देना सूर्य देव के अनन्त, अनादि, नित्य, अविनाशी
और कर्म-साक्षी होने का वर्णन करता है। हनुमान जी बालपन मे बहुत नटखट थे, वो
अपने इस स्वभाव से साधु-संतों को सता देते थे। बहुधा वो उनकी पूजा सामग्री आदि कई
वस्तुओं को छीन-झपट लेते थे। उनके इस नटखट स्वभाव से रुष्ट होकर साधुओं ने उन्हें
अपनी शक्तियों को भूल जाने का एक लघु श्राप दे दिया। इस श्राप के प्रभाव से हनुमान
अपनी सब शक्तियों को अस्थाई रूप से भूल जाते थे और पुनः किसी अन्य के स्मरण कराने
पर ही उन्हें अपनी असीमित शक्तियों का स्मरण होता था। ऐसा माना जाता है कि अगर
हनुमान श्राप रहित होते तो रामायण में राम-रावण युद्ध का स्वरूप पृथक(भिन्न, न्यारा)
ही होता। कदाचित वो स्वयं ही रावण सहित सम्पूर्ण लंका को समाप्त कर देते।
*****
हनुमान जी का
सिंदूरी रूप
एक बार माता सीता
जी अपनी माँग में सिंदूर लगा रही थी| तब हनुमान जी ने माता सीता जी से पूछा कि
माता आप यह सिंदूर किस लिए लगा रही हो? तब माता सीता जी ने कहा- ‘यह सिंदूर भगवान
श्री राम जी की लम्बी आयु के लिए है|’ यह सुनकर हनुमान जी ने मन में विचार किया कि
यदि चुटकी भर सिंदूर से भगवान की उम्र बढ़ती है, तो अगर मैं पूरे शरीर पर सिंदूर
लगा लू तो भगवान की उम्र कितनी बढ़ जायगी? उन्होंने यह सोचकर अपने पूरे शरीर पर
सिंदूर लगा लिया|
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मोतियों की माला
उपहार में
एक बार माता सीता
ने हनुमान जी को मोतियों से बनी माला उपहार दी| जैसे ही हनुमान जी को वह माला मिली,
वे उसे तोड़ कर एक –एक मोती को गौर से देखने लगे| तो माता–सीता को यह देखकर बिल्कुल
भी अच्छा नहीं लगा| उन्होंने हनुमान जी से पूछा- ‘यह क्या कर रहे हो?’ तो हनुमान
जी ने जवाब दिया- ‘मैं इन मोतियों में प्रभु श्री राम जी को ढ़ूंढ़ रहा हूँ| जिस वस्तु
में मेरे प्रभु श्री राम नहीं है, वह वस्तु मेरे किस काम की?’ अपने उपहार का अपमान
सुनकर माता सीता जी को क्रोध आ गया| तो उन्होंने हनुमान जी को कहा कि क्या तुम्हारे
शरीर में भी श्री राम जी है? यह सुनकर
हनुमान जी ने भरी सभा में श्री राम जी के सामने अपना सीना फाड़ कर दिखाया| जिसमे
सभी ने श्री राम जी, लक्ष्मण और माता सीता के दर्शन किये|
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भगवान् श्री राम या
माता सीता
एक बार लक्ष्मण जी
से किसी ने पूछा कि बताओ, आपको भगवान श्री राम जी के चरण प्रिय है या माता सीता
के? तो लक्ष्मण जी ने सोचा फिर कहा कि मुझे चरण तो माता सीता के प्रिय हैं लेकिन
तब प्रिय लगते हैं, जब वह भगवान राम जी के साथ हो|
*****
संत और असंतो में
अंतर
कहते हैं जब भगवान
श्री राम जी अयोध्या लौट चुके थे तब उस
समय की बात है एक बार भरत जी ने भगवान श्री राम जी से प्रश्न पूछा कि भगवान संत और
असंतो में क्या अन्तर है? तब प्रभु श्री राम जी ने उन्हें बताया कि हे भाई, संत और
असंत की ऐसी करनी है जैसे कुल्हाड़े के साथ चन्दन का आचरण और चन्दन के साथ कुल्हाड़े
का आचरण होता है| देखिये कुल्हाड़ा जिस समय चन्दन को काटता है, चन्दन उस कुल्हाड़े
के साथ विरुद्ध आचरण न करता हुआ उल्टा उसे सुगंध देता है| भाव यह है कि अपने साथ अहित करने वाले के साथ
भी हित करता है| ये संतो के गुण है कि वे बुरा करने वालों के साथ भी अच्छाई करते
है| परन्तु कुदरत तो कर्मो
के अनुसार न्याय करती है| अब कुल्हाड़े ने चन्दन को काटा और चन्दन ने उसे सुगंध दी|
परन्तु कुदरत कभी किसी का हक नहीं रखती| वह कटा हुआ चन्दन तो मंदिरों में पहुँच कर
तिलक के रूप में देवताओं के मस्तक का श्रृंगार बना और वही काटने वाला कुल्हाड़ा, जब
चन्दन को काटते -2 उसके मुहँ की धार कुंद हो गई, वह लोहार के पास पहुँचा| लोहार ने
उसे आग में तपा कर भारी औजार से बार-बार कूटा| यह उसको दंड मिला| भगवान ने बताया
कि संत प्राय: बुरों के साथ भी भलाई करते है| कहते हैं कि बदला लेना सुगम है क्षमा
करना कठिन| बदला लेना दुर्बलता और क्षमा कर देना शक्ति, ये दोनों के चिन्ह है|
साधु संतो में एक और बड़ा गुण यह है कि वे सब को मान देने वाले और मान रहित है| हे
तात! ऐसे सज्जन पुरुष मुझे प्राणों के समान प्यारे हैं|
*****
अयोध्या वासियों को
उपदेश
जब रामराज्य में सब
लोग सुखपूर्वक रहने लगे, तब एक दिन श्री भगवान ने सोचा कि जिस उद्देश्य के निमित
संसार में हमारा आना हुआ था, वह उद्देश्य पूरा हुआ| पृथ्वी से राक्षसों का बोझ उतर
गया है, गौ, ब्राह्मण की रक्षा हुई और देवता व मुनिजन सुखी हो गए, परन्तु एक आवश्यक
कार्य अभी करना बाकि रहता है| वह यह कि अयोध्या के लोग यह समझ रहे है कि उनकी नगरी
में श्री राम जी का अवतार है, इसलिए उन को भजन बंदगी की आवश्यकता नहीं है, वे आप
से आप ही भवसागर से पार उतर जाएँगे| लेकिन यह उनकी भूल है| इस भूल को दूर करके उन
को ठीक मार्ग पर लाना ही हमारा कर्तव्य है| ऐसा सोच कर एक दिन सब नगरवासियों को
बुलाया| आज्ञा मिलते ही सब अयोध्या वासी आ गए| उनमे कुल के गुरु, पुरोहित,
ब्राह्मण, मुनि तथा जनता के सब लोग थे| भगवान ने अपने शब्दों में फरमाया कि इंसान
का तन उसे भवसागर से पार लगाने के लिए उत्तम अवसर है लेकिन ये तभी संभव है जब उसे
गुरु की शरण मिल जाये| बिना गुरु के इंसान भव से कभी पार नहीं हो सकता| कुदरत ने
भवसागर से पार करने की जिम्मेदारी, संत-सतगुरु को सौंपी है| कहते हैं कि ईश्वर की जो
कृपा है, वो अनुकूल वायु है और संत सतगुरु को मल्लाह कहा गया है| इंसान का जो शरीर
है वो नौका है अब खाली अनुकूल वायु से इस नौका को पार नहीं लगाया जा सकता इसके लिए
मल्लाह की जरूरत होती है| इसका अर्थ हुआ कि केवल सतगुरु ही जीव को भव से पार लगा सकते है| कहते हैं जब चार प्रकार की
कृपा जीव पर होती है तब इसका कल्याण होता है| पहली ईश्वर कृपा, दूसरी –संत कृपा,
तीसरी-गुरु कृपा और चौथी –जीव की अपनी कृपा अपने ऊपर| 1. मानव शरीर का मिल जाना ईश्वर
कृपा है 2. सत्संग का मिलना संत कृपा 3. गुरु से नाम की प्राप्ति हो जाना गुरु कृपा
4. चौथी अपने आप पर मनुष्य की अपनी कृपा है| ईश्वर कृपा, संत कृपा, गुरु कृपा यदि
ये तीनों हो भी जाये परन्तु जब तक मनुष्य अपने ऊपर आप कृपा नहीं करता अर्थात संत
सतगुरु के वचन अनुसार भक्ति और परमार्थ में रूचि नहीं लेता, तब तक काम बनना कठिन
है| भगवान ने बताया कि स्वर्ग का सुख भी वास्तविक सुख नहीं है| इन्सान की मंजिल
इससे भी ऊपर है| श्री राम जी ने अयोध्यावासियों को उपदेश करते हुए साफ़-साफ़ कह दिया
कि ऐ अयोध्यावासियों, किसी गलतफहमी में आपको नहीं रहना चाहिए| अगर आप अपने जीव का
कल्याण चाहते हो, आपको गुरु की शरण में जाना होगा, क्योंकि गुरु ही भव सागर के मल्लाह
है| उनके बिना मनुष्य शरीर की नैया भवसागर से पार नहीं हो सकती और साथ-ही साथ भगवान
ने ये भी फरमाया कि जो मेरी बात मानेगा, वही मेरा सेवक है और वही मेरा प्यारा है|
सो हमारी आज्ञा यह है कि आपको रूहानी तरक्की या आत्मिक उन्नति के लिए गुरु शरण में
जाना चहिये|
तन संतन का धनु संतन
का
मन संतन का किआ
संत प्रसादि हरि
नामु धिआइया
सरब कुसल तब थीआ
संतन बिनु अवरु न
दाता बीआ
जो जो सरणि परै साधु
की
सो पारगरामी किआ
भक्ति का कैसा सुगम
और सरल मार्ग है कि मेरा-मेरा त्याग कर तेरा-2 को धारण कर लो, फिर काम बना बनाया
है| मगर हम है जो यह सुन कर ही घबराते हैं कि कोई सब कुछ हम से छीन ना ले| यह भ्रम
हमको सताता है, जो भक्ति मार्ग में चलते हुए हमारे सामने दीवार बन कर खड़ा हो जाता
है लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि सब कुछ
तो एक दिन हम से काल छीन लेता है, श्री रघुनाथ जी के वचन श्रवण करके सब ने
कृपानिधान श्री राम जी के चरणों में नतमस्तक किया|
*****
श्री राम जी की
समाधि
श्री राम ने सरयू
नदी में स्वयं की इच्छा से समाधि ली थी| यह
रहस्य बहुत कम लोगों को मालूम है कि श्री राम का अवसान कैसे हुआ। दरअसल यह एक
रहस्य है जिसका उल्लेख सिर्फ पौराणिक धर्म ग्रंथों में ही मिलता है। पद्म पुराण के
अनुसार भगवान श्री राम ने सरयू नदी में स्वयं की इच्छा से समाधि ली थी। इस बारे
में विभिन्न धर्मग्रंथों में विस्तार से वर्णन मिलता है। श्री राम द्वारा सरयू में
समाधि लेने से पहले माता सीता धरती माता में समा गईं थी और इसके बाद ही उन्होंने
पवित्र नदी सरयू में समाधि ली। पद्म पुराण में दर्ज एक कथा के अनुसार, एक दिन एक वृद्ध संत भगवान राम के
दरबार में पहुँचे और उनसे अकेले में चर्चा करने के लिए निवेदन किया। उस संत की
पुकार सुनते हुए प्रभु राम उन्हें एक कक्ष में ले गए और द्वार पर अपने छोटे भाई
लक्ष्मण को खड़ा किया और कहा कि यदि उनके और उस संत की चर्चा को किसी ने भंग करने
की कोशिश की तो उसे मृत्युदंड प्राप्त होगा। लक्ष्मण ने अपने ज्येष्ठ भ्राता की
आज्ञा का पालन करते हुए दोनों को उस कमरे में एकांत में छोड़ दिया और खुद बाहर पहरा
देने लगे। वह वृद्ध संत कोई और नहीं बल्कि विष्णु लोक से भेजे गए काल देव थे
जिन्हें प्रभु राम को यह बताने भेजा गया था कि उनका धरती पर जीवन पूरा हो चुका है
और अब उन्हें अपने लोक वापस लौटना होगा। अभी उस संत और श्री राम के बीच चर्चा चल
ही रही थी कि अचानक द्वार पर ऋषि दुर्वासा आ गए। उन्होंने लक्ष्मण से भगवान राम से
बात करने के लिए कक्ष के भीतर जाने के लिए निवेदन किया लेकिन श्री राम की आज्ञा का
पालन करते हुए लक्ष्मण ने उन्हें ऐसा करने से मना किया। ऋषि दुर्वासा हमेशा से ही
अपने अत्यंत क्रोध के लिए जाने जाते हैं,
जिसका खामियाजा हर किसी को भुगतना पड़ता
है, यहाँ तक कि स्वयं श्री
राम को भी। लक्ष्मण के बार-बार
मना करने पर भी ऋषि दुर्वासा अपनी बात से पीछे ना हटे और अंत में लक्ष्मण को श्री
राम को श्राप देने की चेतावनी दे दी। अब लक्ष्मण की चिंता और भी बढ़ गई। वे समझ
नहीं पा रहे थे कि आखिरकार अपने भाई की आज्ञा का पालन करें या फिर उन्हें श्राप
मिलने से बचाएं। लक्ष्मण
हमेशा से अपने ज्येष्ठ भाई श्री राम की आज्ञा का पालन करते आए थे। पूरे रामायण काल
में वे एक क्षण भी श्री राम से दूर नहीं रहे। यहाँ तक कि वनवास के समय भी वे अपने
भाई और सीता के साथ ही रहे थे और अंत में उन्हें साथ लेकर ही अयोध्या वापस लौटे
थे। ऋषि दुर्वासा द्वारा भगवान राम को श्राप देने जैसी चेतावनी सुनकर लक्ष्मण काफी
भयभीत हो गए और फिर उन्होंने एक कठोर फैसला लिया। लक्ष्मण कभी नहीं चाहते थे कि उनके
कारण उनके भाई को कोई किसी भी प्रकार की हानि पहुंचा सके। इसलिए उन्होंने अपनी बलि
देने का फैसला किया। उन्होंने सोचा यदि वे ऋषि दुर्वासा को भीतर नहीं जाने देंगे
तो उनके भाई को श्राप का सामना करना पड़ेगा,
लेकिन यदि वे श्री राम की आज्ञा के
विरुद्ध जाएंगे तो उन्हें मृत्यु दंड भुगतना होगा, यही लक्ष्मण ने सही समझा। वे आगे बढ़े और कमरे
के भीतर चले गए। लक्ष्मण को चर्चा में बाधा डालते देख श्री राम ही धर्म संकट में
पड़ गए। अब एक तरफ अपने फैसले से मजबूर थे और दूसरी तरफ भाई के प्यार से निस्सहाय
थे। उस समय श्री राम ने अपने भाई को मृत्यु दंड देने के स्थान पर राज्य एवं देश से
बाहर निकल जाने को कहा। उस युग में देश निकाला मिलना मृत्यु दंड के बराबर ही माना
जाता था। लेकिन लक्ष्मण जो
कभी अपने भाई राम के बिना एक क्षण भी नहीं रह सकते थे उन्होंने इस दुनिया को ही
छोड़ने का निर्णय लिया। वे सरयू नदी के पास गए और संसार से मुक्ति पाने की इच्छा
रखते हुए वे नदी के भीतर चले गए। इस तरह लक्ष्मण के जीवन का अंत हो गया और वे
पृथ्वी लोक से दूसरे लोक में चले गए। लक्ष्मण के सरयू नदी के अंदर जाते ही वह अनंत
शेष के अवतार में बदल गए और विष्णु लोक चले गए। अपने भाई के चले जाने से श्री राम काफी
उदास हो गए। जिस तरह राम के बिना लक्ष्मण नहीं, ठीक उसी तरह लक्ष्मण के बिना राम का
जीना भी प्रभु राम को उचित ना लगा। उन्होंने भी इस लोक से चले जाने का विचार
बनाया। तब प्रभु राम ने अपना राज-पाट और पद अपने पुत्रों के साथ अपने भाई के
पुत्रों को सौंप दिया और सरयू नदी की ओर चल दिए। वहाँ पहुँचकर श्री राम सरयू नदी के बिल्कुल
आंतरिक भूभाग तक चले गए और अचानक गायब हो गए। फिर कुछ देर बाद नदी के भीतर से
भगवान विष्णु प्रकट हुए और उन्होंने अपने भक्तों को दर्शन दिए। इस प्रकार से श्री
राम ने भी अपना मानवीय रूप त्याग कर अपने वास्तविक स्वरूप विष्णु का रूप धारण किया
और वैकुंठ धाम की ओर प्रस्थान किया।
*****
लव
कुश
जब महर्षि वाल्मीकि रामायण का मुख्य भाग लिख चुके थे तो सीता माता श्री रामचन्द्र की ओर
से वनवास दिए जाने के कारण उनके आश्रम में आई| आप जी ने अपने सेवकों को सीता माता को
पूरे आदर-सत्कार से रखने के लिए कहा| कुछ समय के बाद सीता माता के गर्भ से दो पुत्रों ने जन्म लिया| उन पुत्रों के नाम लव तथा कुश रखे गए| महर्षि ने उन बच्चों के पालन-पोषण का
विशेष ध्यान रखा| अल्प आयु में ही
उनकी शिक्षा शुरू कर दी| महर्षि वाल्मीकि स्वयं लव एवं कुश को पढ़ाते थे| बच्चों को संस्कृत विद्या के साथ-साथ
संगीत तथा शस्त्र विद्या भी दी जाती थी| वाल्मीकि लव एवं कुश को रामायण भी पढ़ाने लगे| वह दोनों बालक
शीघ्र ही संस्कृत के विद्वान, संगीत के सम्राट बन गए|
वे शस्त्र विद्या में भी काफी निपुण हो
गए| महर्षि ने सोचा कि
इन बालकों के द्वारा राम कथा को जगत में प्रचारित किया जाए| उन बालकों को वाल्मीकि ने राम कथा
मौखिक याद करने के लिए कहा| लव कुश ने कुछ समय में ही चौबीस हजार श्लोक कंठस्थ कर लिए| वह अपने मीठे गले तथा सुरीली सुर में रामायण गाने लगे| उन्होंने दो सात सुरों वाली वीणाएं लीं तथा राम कथा का गुणगान
करने लगे| जब वह गायन कला में परिपूर्ण हो गए तो
वाल्मीकि जी ने उनको आज्ञा दी की वह दूर-दूर जाकर उस उच्च तथा कल्याणकारी काव्य का
प्रचार करें| दोनों राजकुमार जो श्री राम चन्द्र जी के समान
सुन्दर, विद्वान तथा बलशाली
थे, ऋषियों, साधुओं तथा जनसमूह में जाकर रामकथा का
गायन किया करते थे| उनके सुरीले गान ने
काव्य को ओर ऊंचा कर दिया| जब वह गाते तो श्रोता बहुत प्रसन्न एवं वैरागमयी हो जाते| सब के नेत्रों में श्रद्धा, हमदर्दी तथा भक्ति के नीर बहने लग जाते| प्रत्येक नर-नारी उनकी उपमा करके
बालकों लव कुश के पीछे-पीछे चल पड़ते| लव कुश केवल उस काव्य का गायन ही नहीं कर रहे थे बल्कि एक नया
संदेश भी दे रहे थे| भूतकाल की घटनाएं
वर्तमान काल की घटनाएं प्रतीत हो रही थीं|
लव तथा कुश रामकथा का गायन करके वापिस
महर्षि वाल्मीकि जी के आश्रम में आ जाया करते थे| वह अपनी माता सीता जी का बहुत सत्कार
करते थे| उन दिनों में ही श्री रामचन्द्र जी ने
चक्रवर्ती राजा बनने के लिए अश्वमेध यज्ञ करने का फैसला किया| उन्होंने यज्ञ के लिए एक घोड़ा छोड़ा
तथा ऐलान किया कि जो इस घोड़े को पकड़ेगा,
उसे लक्ष्मण के साथ युद्ध करना होगा| लक्ष्मण एक बड़ी सेना लेकर घोड़े के
पीछे-पीछे जा रहा था| जब यह घोड़ा महर्षि वाल्मीकि के आश्रम के निकट पहुंचा तो लव
कुश ने उस घोड़े को पकड़ लिया तथा अपने आश्रम आकर एक पेड़ के साथ बांध दिया| जब लक्ष्मण सेना लेकर निकट आया तो उसने
बालकों को घोड़ा छोड़ने के लिए कहा| लेकिन लव कुश ने मना कर दिया ओर कहा, "हमें यह घोड़ा बहुत
पसंद है, हम इसकी सवारी किया
करेंगे, आप कोई अन्य घोड़ा
छोड़ दीजिए|" लेकिन
लक्ष्मण ने उनको समझाया कि 'यह अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा है जो भी इस घोड़े को पकड़ेगा, उसे हमारे साथ युद्ध करना पड़ेगा|" पर बालक आगे से
कहने लगे, "हम
युद्ध करने को तैयार हैं लेकिन हम घोड़ा नहीं छोड़ेंगे|"
लक्ष्मण ने उनको युद्ध के लिए तैयार
होने के लिए कहा| वह बालक भी महर्षि
वाल्मीकि जी से युद्ध विद्या का ज्ञान प्राप्त कर चुके थे तथा जो योद्धा
ब्रह्मज्ञानी वाल्मीकि से युद्ध विद्या ग्रहण कर चूका हो, वह भला कैसे हार सकता है| इसलिए दोनों बालक तीर कमान लेकर तथा
कवच पहन कर घोड़ों पर सवार होकर मैदान में आ गए| लक्ष्मण की सेना के सामने डटकर
उन्होंने निर्भीकता से कहा,
"यदि आप में हिम्मत है तो हमारे ऊपर
हमला करो|" लक्ष्मण ने एक तीर
छोड़ा जिसे लव ने अपने तीर से ही रोक लिया|
फिर लव कुश ने तीरों की ऐसी वर्षा की
कि लक्ष्मण की सेना वहीं पर ढेर हो गई| लक्ष्मण यह चमत्कार देखकर बड़ा हैरान हुआ, वह फिर बालकों को समझाने लगा| लेकिन लव कुश ने लक्ष्मण को हरा दिया| लक्ष्मण की हार के बारे में जब श्री राम चन्द्र जी को पता लगा
तो उन्होंने शत्रुघ्न को एक बड़ी फौज देकर रणभूमि में भेजा| लेकिन शत्रुघ्न भी दोनों बालकों का
मुकाबला न कर सका तथा पराजित हो गया| उसे भी महर्षि वाल्मीकि के शिष्यों ने धरती पर धूल चटा दी| शत्रुघ्न की हार का समाचार सुनकर श्री रामचन्द्र जी ने भरत को
भेजा| भरत ने पहले आकर लव
कुश को बहुत समझाया लेकिन बालकों के ऊपर इसका कोई असर न हुआ| उन्होंने भरत की भी सारी सेना को मार
डाला तथा भरत भी मूर्छित होकर गिर पड़े| फिर श्री रामचन्द्र भी स्वयं सेना लेकर
आए| वह ऐसे शूरवीर
बालकों को देख कर बहुत खुश हुए| उन्होंने बालकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा उनको घोड़ा
छोड़ने के लिए कहा| पर बालकों ने उनकी
बात की तरफ कोई ध्यान न दिया तथा युद्ध आरम्भ कर दिया| कुछ ही समय में श्री रामचन्द्र जी की
सेना मार फेंकी| अंत में उन्होंने श्री रामचन्द्र जी को
भी घायल कर दिया| पूर्ण तौर पर विजय
प्राप्त करके लव-कुश माता सीता को मिलने गए तथा कहा कि उन्होंने भारत के
सर्वश्रेष्ठ राजा को पराजित कर दिया है तथा अब सारे देश के मालिक बन गए हैं| जब सीता माता ने यह बात सुनी तो उनको
शक हुआ कि इस देश के राजा तो श्री रामचन्द्र जी हैं, इन्होने कहीं अपने पिता जी को ही न
पराजित कर दिया हो| वह उसी समय रणभूमि
पर उस राजा को देखने गई| जब उन्होंने श्री रामचन्द्र जी को घायल अवस्था में मूर्छित
देखा तो ऊंची-ऊंची रोने लग पड़ी और कहा कि तुम दोनों ने मेरा सुहाग मुझ से छीन
लिया है| यह बात सुनकर बालक
बड़े हैरान हुए| फिर सीता माता ने
परमात्मा के आगे प्रार्थना की कि यदि मैं पतिव्रता स्त्री हूँ तो प्रभु मेरे
सुहाग को जीवन दान दें| महर्षि वाल्मीकि जी को भी सारी बात का पता लग गया| उन्होंने श्री रामचन्द्र जी के मुंह पर
पवित्र जल के छींटे मारे तो वह उठ कर बैठ गए|
अपने पास दो शूरवीर बालकों, सीता तथा महर्षि वाल्मीकि जी को देख कर
बहुत हैरान हुए| महर्षि जी ने फिर
उनको सारी बात समझाई| श्री रामचन्द्र जी ने सीता माता का धन्यवाद किया तथा अपने दो
शूरवीर पुत्रों को देख कर बहुत खुश हुए| फिर उन्होंने महर्षि वाल्मीकि जी को कहा कि अपनी कृपा दृष्टि
से मेरे दूसरे भाईयों और सेना को भी जीवन दान की कृपा करें| सीता माता ने फिर प्रार्थना की तो
रामचन्द्र जी के सारे भाई तथा सैनिक जीवित होकर उठ खड़े हुए| फिर श्री रामचन्द्र जी महर्षि वाल्मीकि
के आश्रम में गए तथा सीता ओर बालकों को साथ ले जाने की इच्छा प्रगट की| वाल्मीकि जी ने बड़ी प्रसन्नता के साथ
सीता माता तथा बालकों को उनके साथ जाने की आज्ञा दे दी| दोनों बालक और सीता माता अयोध्या
पहुँच गए| जब सारे नगर वासियों को पता लगा तो उन्होंने बहुत खुशियां
मनाईं| शूरवीर बालकों को
देखने के लिए सारा नगर उमड़ आया| लव और कुश जिन को
राम कथा सम्पूर्ण मौखिक याद थी उन्होंने सारी कथा सुरीली मधुरवाणी में नगर वासियों
को सुनाई| श्री रामचन्द्र जी
अपनी सारी जीवन कथा सुन कर धन्य हो गए| उन्होंने महर्षि वाल्मीकि कृत इस अमर कथा को सुन कर कहा, "जब तक यह दुनिया
रहेगी महर्षि वाल्मीकि जी की यह कथा चलती रहेगी, धन्य हैं महर्षि वाल्मीकि जी, उनकी सदा ही जय होगी|"
*****
भरत
जी की सेवा
कहते
है एक बार राम दरबार लगा था लेकिन राम दरबार में भरत जी नजर नहीं आ रहे थे तो
हनुमान जी ने देखा कि भरत जी कहीं नजर नहीं आ रहे है तो हनुमान जी ने कहा है, ऐसा
तो हो नहीं सकता राम कि दरबार लगा हो दर्शन खुले हो और भरत जी न हो| उन्हें बहुत
ढूंढा इधर उधर महल में लेकिन कहीं नहीं मिले फिर देखा तो वो श्री राम जी के सिंहासन
के पीछे छत्र ले कर खड़े है तो हनुमान जी ने उन्हें कहा कि भरत जी आप सामने आओ तब
भरत जी कहा कि नहीं मैं यही पर ठीक हूँ मैं भगवान की सेवा में खड़ा हूँ| हनुमान जी
ने कहा कि आप सामने आकर छत्र पकड़ लो सेवा करो| तब भरत जी ने कहा हनुमान जी तो दिख
जाती है वो सेवा थोड़ी होती है| हनुमान जी से रहा न गया उन्होंने श्री राम जी से
कहा कि भरत जी को बोलो कि ये सामने आ जाये| तब
श्री राम जी ने फरमाया कि भरत जी संत है और हम संत कि छत्र छाया में बैठे है इससे
बढ़ कर सौभाग्य की बात हमारे लिए और क्या हो सकती है|
*****
हनुमान जी की सेवा
कहते हैं श्री
हनुमान जी प्रभु श्री राम जी की सेवा में हमेशा तत्पर रहते थे| प्रभु श्री राम जी
की सारी सेवाएँ वे खुद किया करते थे| एक बार की बात है भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न ने
माता सीताजी से विनती की कि माता हम भी तो प्रभु श्री राम जी के भाई है लेकिन हमें
प्रभु श्री राम जी की कोई सेवा करने को नहीं मिलती सारी सेवा हनुमान जी ने अपने
नाम कर रखी है| आप प्रभु श्री राम जी से विनती करो कि हमें भी वे सेवा का मौका दे|
सीता माता ने प्रभु श्री राम जी से इस बारे में बात की| प्रभु भरत, लक्ष्मण,
शत्रुघ्न भी तो आपके भाई हैं उनको भी आप सेवा का मौका दीजिए| तो प्रभु श्री राम जी
ने कहा ठीक है वे सारे मिलकर सेवा बाँट ले| सेवाओं की सूची बनाई जाये, जिस पर सबके
हिस्से की सेवाएँ लिखी जाये और उस पर राज्य की मोहर लगाई जाये, ताकि सबकी सेवा
पक्की हो जाये| सभी भाईयों ने ऐसा ही किया उन्होंने सेवाओं की सूची बनाई, सारी
सेवाएँ उन्होंने आपस में बाँट ली| उसमे हनुमान जी का कही नाम ही नहीं लिखा जब हनुमान
जी सेवा करने लगते तो तीनों भाईयों में से कोई उन्हें कह देता हनुमान जी ये मेरी
सेवा है, हमें प्रभु श्री राम जी ने दी है| इस तरह हनुमान जी को कोई सेवा ना मिल
पाती| तब उन्होंने श्री राम जी से विनती की कि प्रभु मुझे तो कोई सेवा नहीं मिली|
तब श्री राम जी ने कहा ठीक है आज से तुम्हारी सेवा यह है कि जब भी मुझे उबासी आने
लगेगी तब तुमने चुटकी बजा कर मेरे मुँह के आगे से मेरी नींद को दूर करना है| अब
तीनों भाई और भी खुश की हनुमान जी को तो छोटी से सेवा मिली है, वो तो अब चुटकिया
बजाया करेंगे| लेकिन भगवान अपने भक्तों की लाज हमेशा रखते हैं| हनुमान जी ने उस
सेवा को भी बड़ी लगन से करना शुरू कर दिया| अब राम जी जहाँ भी जाये हनुमान जी उनके
पीछे -2 चलते| अगर भरत जी राम जी के चरणों के सेवा करते तो हनुमान जी उनके साथ
रहते, कोई उन्हें मना करता तो वह कहते कि मेरी सेवा है, भगवान को उबासी आई तो मैंने
चुटकी बजानी है| अब तीनों भाई पहले तो बड़े खुश थे कि हमने हनुमान से सारी सेवाएँ
ले ली| लेकिन बाद में बड़े चिंतित हो गए कि हनुमान जी तो हमेशा श्री राम जी के साथ
रहते हैं| अब जब श्री राम जी माता सीता जी के साथ अपने कक्ष में जाने लगे तो
हनुमान जी भी उनके साथ वही कक्ष में चल दिए| तो माता सीता ने उन्हें वापिस जाने के
लिए कहा, तब हनुमान जी ने कहा कि मेरी तो सेवा है, जब श्री राम जी को उबासी आयेगी
तो उस समय चुटकी बजानी है| लेकिन माता सीता ने क्रोध में हनुमान जी को अपने कक्ष
से बाहर कर दिया| तब वे कुछ ना बोले| अब भगवान जी ने भी लीला रचाई उन्हें बैठे -2
उबासी आ गई और उनका मुखारविंद खुला ही रह गया| अब माता सीता जी यह देखकर हैरान हुई
कि भगवान का मुख तो बंद ही नहीं हो रहा| उन्होंने भरत, लक्ष्मण, शत्रुघ्न तीनों को
बुलाया राज्य में सभी को पता चल गया कि प्रभु श्री राम जी का मुख खुला रह गया है
बंद ही नहीं हो रहा| तीनों भाईयों नें काफी कोशिश की लेकिन प्रभु श्री राम जी का
मुख बंद ही ना हो| अंत में वे तीनों और माता सीता जी हनुमान जी के पास गए और उनसे
विनती की कि यह आपकी सेवा है, भगवान के मुँह के आगे चुटकी बजाने की, आप ही कुछ
करो| तब हनुमान जी ने कहा क्यों अब क्यों आये हो? पहले तो मेरी सेवा ले ली माता
सीता ने कक्ष से बाहर कर दिया| तब तीनों भाईयों ने माफी माँगी वे अहंकार में आकर
सारी सेवाओ को खुद करना चाहते थे| लेकिन उन्हें पता चल गया कि श्री हनुमान जी
प्रभु के सच्चे सेवक है और भगवान की इच्छा से ही वे सारी सेवाएँ कर रहे है| तीनों भाईयों ने
हनुमान जी से विनती की कि आज से हम आपको किसी सेवा के लिए मना नहीं करेंगे| अब आप
चलकर प्रभु श्री राम जी के मुख के आगे चुटकी बजाये ताकि पुन: वे अपनी पहले वाली
अवस्था में आ जाये| तब हनुमान जी प्रभु श्री राम जी के पास गए और चुटकी बजाई| तब
श्री राम जी अपनी पहली वाली अवस्था में आ गए| तो कैसे भगवान अपने भक्तों की लाज
रखते हैं| इसलिए कभी मन में किसी से जलन ना करे कि किसी दास को इतनी सेवा मिली है या
किसी को ज्यादा प्रसन्नता प्राप्त है भगवान की| सब भगवान की इच्छा अनुसार ही होता
है|
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राम दरबार में कुत्ते की मांग
एक दिन एक कुत्ता श्री राम
जी के दरबार में आया और उसने प्रभु से शिकायत की – “राजन, कितने दुख की बात है कि जिस राज्य की कीर्ति चहुं ओर रामराज्य
के रूप में फैली हुई है वहीं लोग हिंसा और अन्याय का सहारा लेते हैं| मैं आपके महल के पास ही एक गली में लेटा हुआ था तभी एक साधु आया और उसने मुझे पत्थर मारकर घायल कर दिया| देखिए मेरे सिर पर लगे घाव से अभी भी रक्त बह रहा है| वह साधु अभी भी गली में ही होगा| कृप्या मेरे साथ न्याय कीजिए और अन्यायी को उसके दुष्कर्म
का दंड दीजिए|” श्री राम के आदेश पर साधु को दरबार में लाया गया| साधु ने कहा – “यह कुत्ता गली में पूरा मार्ग रोककर लेटा हुआ था| मैंने इसे उठने के लिए आवाज़ें दीं और ताली बजाई लेकिन यह नहीं उठा| मुझे गली के पार जाना था इसलिए मैंने इसे एक पत्थर मारकर भगा दिया.” श्री राम
ने साधु से कहा – “एक साधु होने के नाते तो तुम्हें किंचित भी हिंसा नहीं करनी चाहिए थी| तुमने गंभीर अपराध किया है और इसके लिए दंड के भागी हो|” श्री राम
ने साधु को दंड देने के विषय पर दरबारियों से चर्चा की| दरबारियों
ने एकमत होकर निर्णय लिया – “चूंकि इस बुद्धिमान कुत्ते ने यह वाद प्रस्तुत
किया है अतएव दंड के विषय पर भी इसका मत ले लिया जाए|”
कुत्ते ने कहा – “राजन, इस नगरी से पचास योजन दूर एक अत्यंत समृद्ध और संपन्न मठ है जिसके महंत की दो वर्ष पूर्व मृत्यु हो चुकी है| कृप्या इस साधु को उस मठ का महंत नियुक्त कर दें|” श्री राम
और सभी दरबारियों को ऐसा विचित्र दंड सुनकर बड़ी हैरानी हुई| उन्होंने
कुत्ते से ऐसा दंड सुनाने का कारण पूछा| कुत्ते ने कहा – “मैं ही दो वर्ष पूर्व उस मठ का महंत था| ऐसा कोई सुख, प्रमाद, या दुर्गुण नहीं है जो मैंने वहाँ रहते हुए नहीं भोगा हो| इसी कारण इस जन्म में मैं कुत्ता बनकर पैदा हुआ हूँ| अब शायद आप मेरे दंड का भेद जान गए होंगे|”
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भगवान् की पर्सनल
डायरी
एक बार नारद जी की
भेंट हनुमान जी से हुई उन्होंने देखा कि हनुमान जी भगवान की भक्ति में बड़े मग्न हैं
तो उन्होंने हनुमान जी से पूछा कि हनुमान जी जिस तरह आप भगवान को याद करते हो उसी
तरह क्या भगवान भी आपको याद करते हैं? हनुमान जी ने कहा कि क्यों नहीं वे भी मुझे हमेशा
हर पल याद करते है तब नारद जी ने कहा कि इस बात का आपके पास कोई प्रमाण है कि भगवान
भी आपको उतना ही याद करते है जितना की आप| तो हनुमान जी ने कहा कि आप भगवान की
डायरी में जाकर देखना उसमे जरुर मेरा नाम होगा| यह सुनकर नारद जी भगवान के पास गए
और उनसे पूछा कि प्रभु आपने कोई डायरी बना रखी है तो भगवान ने जवाब दिया क्यों
नहीं? जब संसार का हर व्यक्ति डायरी में अपने काम की चीजे लिखता है तो हमने भी एक
डायरी बना रखी है| तो नारद जी ने कहा कि भगवान कृपा करके मुझे वो डायरी दिखाए तो
नारद जी ने वो डायरी प्रभु से ली और उसे देखने लगे| अब उसमे सभी भक्तों के नाम
लिखे थे सबसे पहले नारद जी का नाम मिला और हनुमान जी का तो नाम ही नहीं मिला यह
देखकर नारद जी बहुत प्रसन्न हुए वह तुरंत ही हनुमान जी के पास पहुँचे और उन्होंने हनुमान
जी से कहा कि हनुमान जी भगवान का सबसे प्रिय भक्त तो मैं हूँ तुम्हारा तो उस डायरी
में नाम ही नहीं है| तो हनुमान जी ने मुस्कराते हुए कहा कि नारद जी भगवान ने एक पर्सनल डायरी भी बना राखी है तो
यह सुनकर नारद जी हैरान हो गए और तुरंत प्रभु के पास लौटे और प्रभु से पूछा कि
प्रभु आपने कोई पर्सनल डायरी भी बना रखी है तो भगवान ने जवाब दिया क्यों नहीं? जब
संसार का हर व्यक्ति अपनी पर्सनल डायरी बनाता है तो हमने भी बना रखी है तो नारद जी
ने विनती की कि प्रभु मुझे वो डायरी दिखाओ| तो भगवान जी ने नारद को वो डायरी दी तो
नारद जी ने देखा कि उस डायरी में दो ही नाम लिखे है एक हनुमान जी का और एक भरत जी का तो नारद जी
ने पूछा कि प्रभु ये कैसे नाम है तो प्रभु ने बताया कि ये वो नाम है, जो मेरे सबसे
प्रिय भक्त है, जो हर समय मुझे याद रखते है| मेरे सिवा इनको किसी से कुछ लेना देना
नहीं है इसलिए इनके नाम मेरी पर्सनल डायरी में है| ठीक इसी प्रकार जो भगवान को
सच्चे दिल से याद करते है वे भगवान के प्यारे होते हैं और भगवान उनका नाम अपने दिल
की डायरी में रखते हैं|
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हनुमान
जी व शनि देव संवाद
हनुमान
जी एक बार संध्या समय अपने आराध्य श्री राम का स्मरण करने लगे तो उसी समय ग्रहों
में पाप ग्रह, मंद गति सूर्य पुत्र शनि देव पधारे। वह अपना सिर प्रायः झुकाये
रखते थे। जिस पर अपनी दृष्टि डालते हैं वह अवश्य नष्ट हो जाता था। शनिदेव हनुमान
के बाहुबल और पराक्रम को नहीं जानते थे। हनुमान ने उन्हें लंका में दशग्रीव के
बंधन से मुक्त किया था। वह हनुमान जी से विनयपूर्वक किंतु कर्कश स्वर में बोले
हनुमान जी ! मैं आपको सावधान करने आया हूँ। त्रेता की बात दूसरी थी, अब
कलियुग प्रारंभ हो गया है। भगवान वासुदेव ने जिस क्षण अपनी अवतार लीला का समापन
किया उसी क्षण से पृथ्वी पर कलि का प्रभुत्व हो गया। यह कलियुग है। इस युग में
आपका शरीर दुर्बल और मेरा बहुत बलिष्ठ हो गया है। अब आप पर मेरी साढेसाती की दशा
प्रभावी हो गई है। मैं आपके शरीर पर आ रहा हूँ। शनिदेव को इस बात का तनिक भी ज्ञान
नहीं था कि रघुनाथ के चरणाश्रि्रतों पर काल का प्रभाव नहीं होता। करुणा निधान
जिनके हृदय में एक क्षण को भी आ जाते हैं, काल
की कला वहाँ सर्वथा निष्प्रभावी हो जाती है। प्रारब्ध के विधान वहाँ प्रभुत्वहीन
हो जाते हैं। सर्व समर्थ पर ब्रह्म के सेवकों का नियंत्रण-संचालन-पोषण प्रभु ही
करते हैं। उनके सेवकों की ओर दृष्टि उठाने का साहस कोई सुर-असुर करे तो स्वयं अपना
अनिष्ट करा बैठता है। शनिदेव के अग्रज यमराज भी प्रभु के भक्त की ओर देखने का साहस
नहीं कर पाते। हनुमान जी ने शनिदेव को समझाने का प्रयत्न किया कि आप कहीं अन्य जाएँ। ग्रहों का प्रभाव पृथ्वी के मरणशील
प्राणियों पर ही पड़ता है। मुझे अपने आराध्य का स्मरण करने दें। मेरे शरीर में
श्री रघुनाथ जी के अतिरिक्त दूसरे किसी को स्थान नहीं मिल सकता। लेकिन शनिदेव को
इससे संतोष नहीं मिला। वह बोले, मैं
सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हूँ। आप पृथ्वी पर रहते हैं। अतः आप मेरे प्रभुत्व
क्षेत्र से बाहर नहीं हैं। पूरे साढे बाईस वर्ष व्यतीत होने पर साढ़े सात वर्ष के
अंतर से ढाई वर्ष के लिए मेरा प्रभाव प्राणी पर पड़ता है। किंतु यह गौण प्रभाव है।
आप पर मेरी साढ़े साती आज इसी समय से प्रभावी हो रही हो। मैं आपके शरीर पर आ रहा हूँ।
इसे आप टाल नहीं सकते। फिर हनुमान जी कहते हैं, जब
आपको आना ही है तो आइए,
अच्छा होता कि आप मुझ
वृद्ध को छोड़ ही देते'!
फिर शनिदेव कहते हैं, कलियुग
में पृथ्वी पर देवता या उपदेवता किसी को नहीं रहना चाहिए। सबको अपना आवास सूक्ष्म
लोकों में रखना चाहिए जो पृथ्वी पर रहेगा। वह कलियुग के प्रभाव में रहेगा और उसे
मेरी पीड़ा भोगनी पड़ेगी और ग्रहों में मुझे अपने अग्रज यम का कार्य मिला है। मैं
मुख्य मारक ग्रह हूँ। और मृत्यु के सबसे निकट वृद्ध होते हैं। अतः मैं वृद्धों को
कैसे छोड़ सकता हूँ।'
हनुमान जी पूछते हैं, आप
मेरे शरीर पर कहाँ बैठने आ रहे हैं। शनिदेव गर्व से कहते हैं प्राणी के सिर पर।
मैं ढाई वर्ष प्राणी के सिर पर रहकर उसकी बुद्धि विचलित बनाए रखता हूँ। मध्य के
ढाई वर्ष उसके उदर में स्थित रहकर उसके शरीर को अस्वस्थ बनाता हूँ व अंतिम ढाई
वर्ष पैरों में रहकर उसे भटकाता हूँ।' फिर
शनिदेव हनुमान जी के मस्तक पर आ बैठे तो हनुमान जी के सिर पर खाज हुई। इसे मिटाने
के लिए हनुमान जी ने बड़ा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया। शनिदेव चिल्लाते हैं, यह
क्या कर रहे हैं आप।'
फिर हनुमान जी कहते
हैं, जैसे आप सृष्टिकर्ता के विधान से विवश हैं वैसे मैं भी अपने
स्वभाव से विवश हूँ। मेरे मस्तक पर खाज मिटाने की यही उपचार पद्धति है। और आप अपना
कार्य करें और मैं अपना कार्य। 'ऐसा
कहते ही हुनमान जी ने दूसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया। इस पर शनिदेव कहते हैं, आप
इन्हें उतारिए, मैं संधि करने को तैयार हूँ।' उनके
इतना कहते ही हनुमान जी ने तीसरा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया तो शनि देव चिल्ला कर
कहते हैं, मैं अब आपके समीप नहीं आऊँगा। फिर भी हनुमान जी नहीं माने और
चौथा पर्वत उठाकर सिर पर रख लिया। शनिदेव फिर चिल्लाते हैं, पवनकुमार!
त्राहि माम ताहि माम! रामदूत! आंजनेयाय नमः! मैं उसको भी पीड़ित नहीं करूँगा जो
आपका स्मरण करेगा। मुझे उतर जाने का अवसर दें। हनुमान जी कहते हैं, बहुत
शीघ्रता की, अभी तो पांचवाँ पर्वत (शिखर) बाकी है। और इतने में ही शनि देव हनुमान
जी के पैरों में गिर गए,
और कहा' मैं
सदैव आपको दिये वचनों को स्मरण रखूँगा।' आघात
के उपचार के लिए शनिदेव तेल माँगने लगे। हनुमान जी तेल कहाँ देने वाले थे। तभी शनि
देव ने अपनी पीड़ा दूर करने को तेल लगाया! और
तभी से तेल चढ़ने लगा! वही
शनिदेव आज भी तेलदान से तुष्ट होते हैं। और खुशियाँ प्रदान करते हैं|
*****
हनुमान
जी द्वारा रचित रामायण
ऐसा
माना जाता है कि प्रभु श्री राम की रावण के ऊपर विजय प्राप्त करने के पश्चात ईश्वर
की आराधना के लिये हनुमान हिमालय पर चले गये थे।
वहाँ जाकर उन्होंने
पर्वत शिलाओं पर अपने नाखून से रामायण की रचना की जिसमे उन्होनें प्रभु श्री राम
के कर्मों का उल्लेख किया था
कुछ समयोपरांत जब
महर्षि वाल्मिकी हनुमान जी को
अपने द्वारा रची गई रामायण दिखाने पहुँचे तो उन्होंने हनुमानजी द्वारा रचित रामायण
भी देखी। उसे देखकर वाल्मिकी थोड़े निराश हो गये तो हनुमान ने उनसे उनकी निराशा का
कारण पूछा तो महर्षि बोले कि उन्होने कठोर परिश्रम के पश्चात जो रामायण रची है वो
हनुमान की रचना के समक्ष कुछ भी नहीं है अतः आने वाले समय में उनकी रचना उपेक्षित
रह जायेगी। ये सुनकर हनुमान ने रामायण रचित पर्वत शिला को एक कन्धे पर उठाया और
दूसरे कन्धे पर महर्षि वाल्मिकी को बिठा कर समुद्र के पास गये और स्वयं द्वारा की
गई रचना को राम को समर्पित करते हुए समुद्र में समा दिया। तभी से हनुमान द्वारा
रची गई हनुमद रामायण उपलब्ध नहीं है। तदुपरांत
महर्षि वाल्मिकी ने कहा कि तुम धन्य हो हनुमान, तुम्हारे
जैसा कोई दूसरा नहीं है और साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि वो हनुमान की महिमा का
गुणगान करने के लिये एक जन्म और लेंगे। इस बात को उन्होने अपनी रचना के अंत मे कहा
भी है। माना जाता है कि रामचरितमानस के
रचयिता कवि तुलसी दास कोई और नहीं बल्कि महर्षि वाल्मिकी का ही दूसरा अवतार थे। महाकवि तुलसीदास के
समय में ही एक पटलिका को समुद्र के किनारे पाया गया जिसे कि एक सार्वजनिक स्थल पर
टाँग दिया गया था ताकी विद्यार्थी उस गूढ़लिपि को पढ़कर उसका अर्थ निकाल सकें।
माना जाता है कि कालीदास ने उसका अर्थ निकाल लिया था और वो ये भी जान गये थे कि ये
पटलिका कोई और नहिं बल्कि हनुमान द्वारा उनके पूर्व जन्म में रची गई हनुमद् रामायण
का ही एक अंश है जो कि पर्वत शिला से निकल कर ज़ल के साथ प्रवाहित होके यहाँ तक आ
गई है। उस पटलिका को पाकर तुलसीदास ने
अपने आपको बहुत भग्यशाली माना कि उन्हें हनुमद रामायण के श्लोक का एक पद्य प्राप्त
हुआ।
*****
रावण व विभीषण का स्वभाव
ऐसा कहते हैं कि रावण की राजधानी लंका एक सोने की नगरी थी| अद्भुत शक्तियों को प्राप्त कर उनके
मद में वह अंहकारी बन गया था|
अभिमान के मद में वह समझता था कि
पाण्डित्य और बल में उसके बराबर ऐसा संसार में कोई नही है| अब उसने अपने मलिन मन की इच्छाओं
और कल्पनाओं के अनुसार काम करना
शुरू कर दिया| उसमे शिष्टाचार की
सारी भावनाएँ समाप्त हो गई थी|
एन्द्रियक सुखेश्वर्यों की प्राप्ति ही
उसका लक्ष्य बन गया| इन्ही को पाने की
लालसा ही उसके जीवन का एकमात्र ध्येय बन गया|
यह सब प्राप्त करने के लिए साधुओं तथा सजन्न को सताने लगा | उसे भगवान का भी बिल्कुल भय न रहा| वह इन्द्रियों की पूर्ति के लिए सभी
तरह के पाप व दुष्कर्म करने लगा
लेकिन अन्त में उसकी क्या दुर्दशा हुई? यह सबको विदित है कि किस तरह छोटे छोटे किषकिन्धा
के वानरों द्वारा वह अपमानित किया गया| अपने माथे पर अमिट कलंक लगाकर इस
दुनिया से विदा हुआ| वह अपने दुष्कर्मों
तथा राक्षसी प्रवृतियों के लिये याद किया जाता है| दूसरी ओर रावण का छोटा भाई था- विभीषण|
राक्षसों के ही निवास स्थान लंका नगरी,
राक्षसों से घिरी हुई जगह में रह कर भी वह प्रभु भक्ति
तथा पवित्रता का जीवन गुजराता था|
विषम तथा विपरीत परिस्थितियों में रहता हुआ भी भगवान श्री राम की भक्ति के शुभ विचारों में डूबा रहता
तथा राक्षसों के संग में रहने के उपरांत भी उनके दूषित तथा अनैतिक प्रभाव उसने कभी ग्रहण नही किए| यहाँ तक की विलासी तथा समृद्ध जीवन का प्रलोभन तथा बड़े भाई द्वारा प्रस्तावित उच्च मंत्री पद भी
उसकी भगवान श्री राम
के प्रति श्रद्धा और भक्ति को कमजोर न कर सके तथा पीछे न हटा सके| भगवान के प्रति उसकी अटूट श्रद्धा तथा
दृढ़ विश्वास उसे अन्त में भगवान के समीप ले ही गया|
संसार में उसने यश कमाया और लंका के निष्कंटक राज्य का वरदान भी प्राप्त किया| इसके अतिरिक्त भगवान श्री राम के दरबार में उसे आदरणीय स्थान भी मिला, दुनिया में
रावण और विभीषण दोनों को याद किया जाता है|
पहला अपनी दुष्टता के कारण निरादर पूर्वक याद किया जाता है| जबकि दूसरा अपनी उदारता के लिए आदर-
पूर्वक याद किया जाता है|
यही दोनों भाईयों द्वारा किये गए शुभ और अशुभ कर्मो का फल है|
*****
रावण,
विभीषण, कुम्भकरण तीनो के वर
कहते हैं जब रावण,
कुम्भकरण, विभीषण तीनों भगवान से वर माँगने के लिए भक्ति कर रहे थे तो भगवान ने
प्रसन्न होकर उनसे वर माँगने के लिए कहा| भगवान को पता था कि अगर ये तीनों कुछ अलग-अलग
वर माँगे तो कुछ समस्या खड़ी हो सकती है तो भगवान ने उन तीनों से एक जैसा वर माँगने
को कहा तो सबसे पहले रावण ने वर माँगा – सोना, कि मुझे सोने की लंका मिले, उसके
बाद कुम्भकरण ने वर माँगा सोना, मुझे सोना नसीब हो, फिर विभीषण ने वर माँगा सोना,
कि मैं कही सो ना जाँऊ, भगवान की भक्ति में मेरी आँखे हमेशा खुली रहे, तो कहने का
मतलब है तीनों के वर एक जैसे थे पर तीनों में अंतर जमीन- आसमान का था|
*****
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