भिक्षुक का खजाने के ऊपर बैठना
कहते हैं कि एक भिक्षुक एक मंदिर के
बाहर एक स्थान पर बैठकर भीख माँगा करता था|
वह जीवन भर उसी स्थान पर बैठकर भीख माँगता रहा और अन्तत: उसी स्थान पर उसने अपने
प्राण भी त्यागे|कुछ दिनों बाद उस
मंदिर के प्रबंधको ने मंदिर को विशाल रूप देने की योजना बनाई| जब निर्माण कार्य प्रारम्भ हुआ और
नींव खोदी जाने लगी, तो उस स्थान पर, जहाँ बैठकर वह भिक्षुक भीख माँगा करता
था, खोदने पर वहाँ बड़ा
भारी खजाना निकला, जिसमे सोने, चाँदी और हीरे जेवहरात के अनेको बक्से
मौजूद थे| अब विचार किया जाए
कि इतना विशाल खजाना उस स्थान पर दबा होने पर भी वह भिखारी जीवनप्रयन्त वहाँ बैठकर
भीख माँगता रहा तो क्यों? इसलिए
कि उसे इस वास्तविकता का पता चल जाता, तो
क्या वह भीख माँगता? कदापि नहीं| वह तो उस खजाने को पाकर मालोमाल हो
जाता और ठाठ- बाठ से जीवन व्यतीत करता|
यही दशा आम संसारी की है सुख,
आनन्द और ख़ुशी का असीम भण्डार उसके अन्दर ही है परन्तु वास्तविकता न होने के कारण
बाहर संसार में- धन सम्पदा में, ऐश्वर्य
भोगो में, माया के पदार्थो
में तथा मान- प्रतिष्ठा आदि में
ढूंढता फिरता है|
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पाँच साल के लिए राजा
एक बार की बात है एक राज्य में पाँच
साल के लिए राजा नियुक्त किया जाता था फिर उस राजा को उसी राज्य के पास जंगल था
वही छोड़ दिया जाता था जहाँ जंगली जानवर उसे खत्म कर देते थे| जो भी राजा बनता पाँच साल तक उसकी मौज
होती थी पर उसके बाद उसे मरना पड़ता था|
अब जब नए राजा बनने की बारी आई तो काफी लोगों को मौका मिला राजा बनने के लिए लेकिन
सबको मौत का डर था| तब एक व्यक्ति
जोकि काफी समझदार था उसने सबसे राजा बनने की विनय की| सभी ने सोच समझकर उसे राजा बना दिया| अब वह काफी समझदार था उसने पहले साल
में ही अपने सैनिकों को वह लोगों
से कहकर जंगल को साफ़ करवाना शुरू करवा दिया|
दूसरे साल में वहाँ रहने की व्यवस्था करवाई|
कुछ समय बाद वहाँ नगर बसवा दिया, वहाँ
स्कूल, हस्पताल, पार्क बनवा दिए| लोग वहाँ रहने लगे अब जब पाँच साल
खत्म हुए तो उस राजा को जंगल में भेजना था लेकिन अब तो वह जंगल था ही नहीं क्योंकि
वहाँ अब नगर बन चुका था|
तो सभी लोगों ने मिलकर उसी व्यक्ति को हमेशा के लिए राजा नियुक्त कर दिया| अब सोचने की बात है अगर वो भी और
लोगों की तरह 5 साल मौज करता कोई
काम ना करता तो उसे काल के मुहँ में जाना पड़ता लेकिन उस व्यक्ति ने इस शरीर की
विशेषता समझी और इससे सही काम करवाया|
तो अपना लोक भी संवारा और परलोक भी सवार लिया|
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पिता का सवाल
एक राजा के तीन लड़के थे| एक बार राजा ने तीनों से खाना खाते
समय प्रश्न किया| कि बताओ मैं
तुम्हें कितना प्रिय हूँ|
तब बच्चों ने कहा कि पिता जी आप हमें बहुत प्रिय हो| तब पिता ने कहा कि किसी वस्तु से
तुलना करके बताओ| तब सबसे बड़े लड़के
ने कहा कि जितनी प्रिय खीर है|
उतने ही आप प्रिय लगते हो तो राजा बहुत खुश हुआ| फिर दूसरे लड़के से पूछा तो उसने बताया
कि जितना अच्छा हलवा है उतने ही प्रिय लगते हो तब राजा यह सुनकर बहुत खुश हुआ| फिर जब तीसरे लड़के से पूछा तो उसने
जवाब दिया कि जितना प्रिय नमक है उतने प्रिय लगते हो| तब राजा को यह सुनकर बड़ा अजीब लगा| राजा को अपने छोटे लड़के पर बहुत क्रोध
आया और राजा ने उसे अपने राज्य से निकाल दिया| क्यों कि उसके लड़के ने नमक जैसी कड़वी
चीज से उसकी तुलना की|
अब वह लड़का बेसहारा हो जाता है और जंगल की तरफ चला जाता है| वहीं रास्ते में उसे एक सन्त जी मिलते
है| वह सन्त जी को
सारा वृत्तांत सुनाता है तो सन्त जी कहते हैं- कि ये तो बड़ी अच्छी बात है, भगवान की
भक्ति करने का तुम्हें यह अवसर मिला है|
अब मैं तुम्हें एक कुटिया देता हूँ, जहाँ
तुम अपना निवास बनाओ वही रहो और मालिक की भक्ति करो| तब उस लड़के ने ऐसा ही किया वह उसी
कुटिया में रहने लगा|
भिक्षा माँगता और अपना गुजारा करता|
काफी समय बीत गया एक दिन राजा शिकार करने जंगल में जाता है और राज्य में वापिस
जाने के रास्ते से भटक जाता है|
तभी राजा को वहीं पर एक झोपड़ी नज़र आती है वह उसी झोपड़ी में जाता है| वहाँ उसका वही लड़का होता है जिसे वह
अपने राज्य से निकाल देता है|
लेकिन काफी समय बाद वह अपने लड़के को देखता है और उसकी बड़ी-बड़ी दाढ़ी भी होती है तो वह अपने लड़के
को पहचान नहीं पाता| लेकिन वह लड़का
अपने पिता को पहचान जाता है|
लेकिन बताता नहीं है|
वह राजा झोपड़ी में जाके उस व्यक्ति को कहता है कि मैं इस देश का राजा हूँ| मैं मार्ग भटक गया हूँ| कृपा करके मुझे वापिस राज्य में
पहुँचाने का रास्ता बताए|
वह लड़का कहता है कि आप देश के राजा हैं|
आप आराम करे मैं आपके लिए भोजन की व्यवस्था करता हूँ| फिर मैं आपको रास्ता बता दूंगा| राजा को काफी भूख भी लगी होती है तो
वह खाने के लिये हाँ कर देता है|
अब वह लड़का 2-3 घरों
से खाना बनवा के ले आता है लेकिन सब्जी में नमक ना डालने के लिए कहता है| वह बिना नमक का खाना लाकर राजा को
खाने के लिए देता है जब राजा खाना शुरू करता है राजा कहता है कि ये कैसा खाना है
इसमें तो नमक भी नहीं है|
लड़का कहता है कि नमक नहीं है तो क्या हुआ खाना तो है ना| राजा कहता है कि नमक के बिना भी कोई
खाने का स्वाद होता है|
तब वह लड़का कहता है कि जब आपको पता है कि नमक के बिना खाने के अन्दर कोई स्वाद
नहीं होता फिर भी आपने अपने लड़के को राज्य से क्यों निकाला उसने तो सही जवाब दिया
था| फिर राजा उसे
ध्यान से देखता है तो पता चलता है|
कि यह मेरा लड़का ही तो है तब राजा अपने किये पर शर्मिन्दा होता है अपने लड़के से
माफ़ी माँगता है और उससे विनय करता है कि वापिस राज्य में चले और राज संभाले| लेकिन लड़का कहता है कि पिता जी जैसे
आपको पता चल गया कि नमक के बिना खाने की कोई विशेषता नहीं है उसी तरह मुझे भी अब
पता चल गया कि भगवान के नाम के बिना संसार में जीना बेकार है|
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नौलखा हार चील ले गया
एक बार की बात है एक रानी महल की छत पर
धूप में स्नान कर रही थी| स्नान
करते समय उसने अपना नौलखा हार उतार कर निकट ही एक तख्त पर रख दिया था| जब रानी स्नान कर रही थी उसी समय आकाश में
से उड़ती हुई एक चील आई और उस हार को खाने की वस्तु समझ कर उठा कर ले गई| राजा को जब इस बात का पता चला तो उसने
घोषणा करवा दी जो कोई भी उस हार को लेकर आएगा| राजा उसे उचित पुरस्कार देगा| यह सुनकर एक निर्धन व्यक्ति उस हार की
खोज में निकला| हार को ढूँढते-ढूँढते वह जगह-जगह फिरता रहा| अन्त में वह एक दिन एक सरोवर के किनारे
वृक्ष की छाया में लेट गया| वहाँ
उसकी नज़र सरोवर के अन्दर पड़ी तभी उसने देखा कि हार सरोवर में पड़ा था| वह हार निकलने के लिए सरोवर के अन्दर
कूदा| लेकिन हार ना मिला| फिर बाहर आकर देखा हार नजर आ रहा था
परन्तु अन्दर जाकर हार ना मिला| ऐसा
कई बार किया अन्त में थक कर बैठ गया और सोचने लगा कि यह कैसे हो सकता है| हार यहाँ से तो नज़र आ रहा है परन्तु अन्दर जाकर मिलता नहीं| एक महात्मा जी काफी देर से दूर खड़े देख
रहे थे| उन्होंने उस
व्यक्ति से इस बारे में पूछा| तो
उसने सारी बात बताई कि राजा ने इस हार पर इनाम रखा है| तब महात्मा जी ने उस हार को देखा और
सारी स्थिति समझ ली| फिर उस व्यक्ति को
बताया कि यह हार पानी में नहीं अपितु वृक्ष के ऊपर डाली पर लटक रहा है जिसका
प्रतिबिम्ब पानी में नजर आ रहा है| उस व्यक्ति ने वृक्ष से हार उतार लिया और
महात्मा जी का धन्यवाद किया राजा
के पास जाकर राजा से पुरस्कार प्राप्त किया|
विचार करो कि हार तो वृक्ष पर था पर वह
बार-बार पानी में खोज
रहा था| इसी प्रकार सुख
आनंद तो कहीं ओर है और मनुष्य उसे खोजता कहीं ओर है||
वस्तु कहीं ढूंढे कहीं, किस विधि आवे हाथ|
कहत कबीर तब पाईये, जब भेदी लीजे साथ||
भेदी लीन्हा साथ में, दीन्ही वस्तु लखाय|
कोटि जन्म का पंथ था, पल में दिया मुकाय||
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गउओं का रंग सफ़ेद होना
एक बार एक प्रेमी तीर्थ यात्रा करते
हुए पूर्ण संतों के आश्रम जा पहुँचा और संतों के चरणों में विनय कि ! महाराज मुझे
त्रिवेंणी स्नान के लिए जाना है लेकिन मुझे रास्ता मालूम नहीं है मुझे रास्ता
बताने की कृपा करे| तब संतों ने कहा कि
त्रिवेंणी का मार्ग तो हमें भी मालूम नहीं है वह प्रेमी हैरान हो गया और मन ही मन
कहने लगा कि ये कैसे सन्त है जिन्हें त्रिवेंणी का रास्ता तक नहीं मालूम| इन्ही विचारों में खोया वह वहाँ से चल
दिया| अभी थोड़ा सा आगे
पहुँचा तो क्या देखता है कि चार गऊए आ रही हैं जोकि काले रंग की है वह वही खड़ा
होकर उन गउओं को देखने लगा| संतों
के आश्रम के निकट एक कुआँ था| सन्त
जब कुएँ के पास स्नान करते थे तो वह पानी कुछ दूरी पर तालाब था वहाँ जा गिरता था| वे चारों गउएं उसी तलाब में चली गई
जैसे ही वह डुबकी लगाकर बाहर निकली तो वह यात्री यह देखकर हैरान हो गया कि उन गउओं
का रंग बिल्कुल सफ़ेद था| यात्री
समझ गया कि ये कोई साधारण गउएं नहीं है| वह
गउओं के आगे हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और बोला-आप
कौन है? उसके प्रश्न पर एक
गाय ने कहा कि हम चारों गंगा, यमुना, सरस्वती और गोदावरी नदियाँ है संसार के
पापी जीव जब हमारे अन्दर स्नान करते हैं तो हमारा रंग काला हो जाता है| किन्तु जब हमें सन्त महापुरुष की चरण- शरण मिल जाती है तो उनके चरण- रज के प्रताप से हम पवित्र और निर्मल
हो जाती है और हमारा रंग फिर से सफ़ेद हो जाता है| इस तालाब में पूर्ण संतों के
चरणों का जल गिरता है अत: इसमें
डुबकी लगाने से हमारा रंग फिर से सफ़ेद हो गया है| गउओं के मुख से सन्त सत्पुरुषों की
महिमा सुनकर प्रेमी ने विचार किया कि जब तीर्थ स्वयं सन्त सत्पुरुषों की चरण- धूलि के लिए तरसते हैं तो फिर मैं भी
इन्ही संतों की चरण- राज में स्नान क्यों
न करूं| उस दिन से वह उनका
शिष्य बन गया||
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मजदूरों का संशय
एक भजनाभ्यासी सन्त कहीं आश्रम बनाकर
रहते थे| उनकी आस पास के
श्रेत्र में बड़ी ख्याति थी और नित्यप्रति अनेकों श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए
आश्रम पर आया करते थे| एक
बार आश्रम पर कुछ निर्माण चल रहा था| जिसमे
कई मजदूर लगे हुए थे| वे
मजदूर श्रद्धालुओं को वहाँ आते देखने और सन्त जी के चरणों में धन-पदार्थ भेंट करते देखा करते थे| एक दिन एक मजदूर ने दूसरे मजदूर से कहा- हम लोग सारा दिन मजदूरी करते रहते हैं
तब कहीं जाकर शाम को कुछ रुपये कमा पाते हैं|
जिससे बड़ी कठिनाइयों से जीवन निर्वाह
होता है| परन्तु इन संतों के
पास तो बिना मेहनत के ही धन-पदार्थ
आ जाते हैं| दूसरा मजदूर जो
थोड़ा भक्तिवान था, बोला-ये बड़े उच्च कोटि के सन्त हैं| देखते नहीं ये कई- कई घंटे एक ही आसन पर बैठकर भजन ध्यान
में लीन रहते हैं| इसी भजन ध्यान के
कारण ही इन्होंने उच्च पदवी प्राप्त कर ली है| कि लोग इनका आशीर्वाद पाने की अभिलाषा
से इनके चरणों में आते हैं| तब
तीसरा मजदूर बोला- यह भजन-ध्यान करना कौन सा कठिन काम है? यह तो हम भी कर सकते है| संयोग से उनकी यह बाते सन्त जी सुन रहे
थे| सन्त जी ने मजदूरों
को बुलाकर फ़रमाया- कि हमने कल से तुम
लोगों के लिए कोई दूसरा काम सोच रखा है| कल
से तुम्हें इतनी ईंटें नहीं ढोनी पड़ेगी| कल
से तुम लोगों को यह करना है कि माला हाथ में लेकर एकांत में बैठकर प्रभु-नाम का जाप करना है सन्त जी के वचन
सुनकर मजदूर बड़े प्रसन्न हुए| दूसरे
दिन जब वे आश्रम में आये तो सन्त जी ने अपने शिष्य को कहा कि इनको एक-एक माला दे दो और बैठने का स्थान भी
बता दो| ये आज दिन भर प्रभु
के नाम का जाप करेंगे| शाम
को इनको दोगुनी मजदूरी दे देना और इन पर दृष्टी रखना के ये जाप कर रहे हैं कि नहीं| शिष्य ने उन मजदूरों को एक-एक माला पकड़ा दी और हर एक को अलग-अलग कमरा भी दे दिया| मजदूर मन ही मन बड़े प्रसन्न हुए कि ऐसा
आसान काम भी मिल गया और मजदूरी भी दोगुनी मिलेगी| अतएव सब बड़ी ख़ुशी-ख़ुशी आसन पर बैठ कर माला फेरने और नाम
जपने लगे| चूँकि बहिॆमुखी
वृति के लोग थे, काम करते हुए चलते-फिरते भी रहते थे और गप्पे भी मारते
रहते थे, अतएव उन के लिए
एकांत स्थान में बैठना बड़ा मुश्किल हो गया|
न इधर-उधर कहीं जा सकते, और ना ही किसी से बातचीत कर सकते थे| दस-पंद्रह मिनट में ही परेशान होने लगे| जैसे-तैसे करके आधा घंटा बीता, तब एक मजदूर खांसते हुए बाहर निकला| बाहर संतों के सेवक को खड़ा हुआ देखकर
बोला यह काम मुझसे नहीं हो सकता, मैं
तो इतनी देर में ही तंग आ गया| मैं
जा रहा हूँ, कहीं और मजदूरी कर
लूंगा| उनकी आवाज सुनकर
सारे मजदूर बाहर आ गये और सभी जाने को तैयार हो गये| तब सेवक ने गुरुदेव के चरणों में जाकर
सब वृतांत प्रस्तुत किया| संतों
ने उन मजदूरों को बुलाकर कहा- क्यों
भैया, क्या बात है? अभी तो आधा घंटा ही हुआ है| अच्छा, ऐसे करो कि सारे दिन की बजाय दो घंटे
सवेरे और दो घंटे शाम को नाम जपो, मजदूरी
फिर भी हम तुम्हें दोगुनी देंगे| वे
बोले-महाराज| यह काम हमारे बस का नहीं है| ना हम एक आसन पर लगातार बैठ सकते है और
ना ही चुपचाप रह सकते हैं| तब
सन्त जी ने उन्हें एक दिन पहले के वार्तालाप का स्मरण कराया कि तुम लोग तो कल ऐसा-ऐसा कह रहे थे| वे बोले- महाराज| हम तो समझे थे कि यह काम बड़ा आसान है, परन्तु यह काम तो बहुत कठिन है| आप हमें क्षमा करें और पहले की तरह
मजदूरी पर लगा दे| सन्त जी ने हँसते
हुए फ़रमाया ठीक है, जैसा तुम लोगों का
विचार है और उन्हें मजदूरी के काम पर लगा दिया| यह एक दृष्टांत है जिससे सिद्ध होता है
कि भजन-भक्ति और नाम-सुमिरन का कार्य बहुत कठिन है||
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ब्राह्मण का पुत्र चोर
एक दिन श्री वचन हुए कि किसी ब्राह्मण
के घर पुत्र उत्पन्न हुआ| ज्योतिष
विज्ञान से ज्ञात हुआ कि वह चोर बनेगा| ब्राह्मण
ने उसको बचपन से ही अच्छी शिक्षा देनी प्रारम्भ की और संतों का खूब सत्संग कराया| वह ब्राह्मण राजा के महल में पूजा और
कथा-कीर्तन करने के लिए
प्राय: जाया करता था| कुछ दिन के बाद ब्राह्मण की तो मृत्यु
हो गई और लड़के को युवा होते-होते
कर्म के संस्कार से चोरी की लत पड़ गई| पंडिताई
के कारण उसका राजा के महल में आना-जाना
तो था ही, एक रात राजा के
विश्राम कक्ष में जा पहुँचा| जिस
वस्तु को हाथ लगाता तो उसको याद आ जाता कि इस वस्तु के चुराने का यह दण्ड है| इस कारण उस वस्तु को रख देता| उसी प्रकार से उसने अनेको मूल्यवान
वस्तुएं उठाकर और उनका शास्त्र-विचार
के अनुसार दण्ड सोचकर उन्हें वापिस रख दिया|
किसी वस्तु का फोक पड़ा हुआ था, अन्तत: उसको बेकार समझकर उठा लिया कि इसका कुछ
दण्ड न होगा| उस फोक वस्तु को
लेकर चलने लगा| इतने में राजा जोकि
वही सो रहा था उसकी नींद खुल गई| राजा
ने अँधेरे में पूछा कि कौन है? उस
लड़के ने कहा- मैं चोर हूँ| तब तक द्वार पर खड़े सैनिक भी अन्दर आ
गए और लैंम्प जलाया| तब राजा ने लड़के को
पहचाना| तलाशी लेने पर उस
लड़के के पास फोक निकला| राजा
ने पूछा- तुमने ऐसी बेकार
वस्तु किसलिये चुराई? यहाँ
तो अनेकों प्रकार की मूल्यवान वस्तुएं रखी है| वह लड़का चोरी के अपराध के कारण लज्जित
हुआ और नजरे नीची करके अपने विचार कह दिये|
यह सुनकर राजा चकित हुआ| वह समझ गया कि यह कर्मो के विवश है| अन्यथा पूरा सत्संगी और जानकार है| फिर लड़के से बोला देखो- एक तो तुमने ब्राह्मण होकर चोरी की यह
कितनी गलत बात है| दूसरे अब पकडे जाने
से सबके सामने लज्जित भी होना पड रहा है|
यह कितने अफ़सोस की बात है| यदि तुम वचन दो कि अब चोरी नहीं करोगे
तो मैं तुम्हें क्षमा कर दूँगा| लड़के
ने वचन दिया और राजा ने उसे क्षमा कर दिया|
सच है- संतों महापुरुषों की संगति अपना प्रभाव
दिखाये बिना नहीं रहती||
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मेले में पिता अपने बच्चे के साथ
एक बार एक व्यक्ति अपने बच्चे को लेकर
मेले में गया| वहाँ पर जाकर उस व्यक्ति ने अपने बच्चे से कहा- कि तू मेरा हाथ पकड़ ले यहाँ मेले में
तरह-तरह के झूले हैं, तरह-तरह
के सामान हैं तू इस रंग बिरंगी दुनिया में कहीं खो न जाये| तब उस बच्चे ने अपने पिता का हाथ पकड़
लिया| अब जिस चीज का डर
था वही हुआ| वह बच्चा अपने पिता
से बिछड़ गया| अब वह पिता अपने बच्चे को काफी देर तक ढूँढता रहा| काफी समय बाद जब वह व्यक्ति अपने बच्चे
से मिला तो उसने अपने बच्चे से कहा कि मैंने तुझको कहा था ना कि तू मेरा हाथ पकड़
ले नहीं तो इस रंग बिरंगी दुनिया में खो जाएगा पर तू नहीं माना| तब उस बच्चे ने जवाब दिया कि पिता जी
मैं तो बच्चा हूँ अगर मैं आपका हाथ पकडूँगा तो क्या पता इस रंग-बिरंगी दुनिया को देखकर मैं इसमें मस्त
होकर अपना हाथ छुड़ा लूँ इसलिए
अब आप मेरा हाथ पकडो| अगर
आप मेरा हाथ पकड़ोगे तो मैं उसे नहीं छुड़ा पाउंगा| इसी तरह हम भगवान को दुःख के समय याद
करते है उन्हें पूजते हैं अपने आप को उन्हें सौंप देते हैं लेकिन जब संसार के रंग
देखते हैं तो भगवान को भूल जाते हैं, हमें भगवान से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि
भगवान हमारे हाथों को आप पकड़ो अगर आप पकड़ोगे तो हम छुड़ा नहीं पाएंगे और भगवान के
चरणों में प्यार भी बना रहेगा||
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गधों का वहम
एक लकड़हारा था उसके पास दो गधे थे| वो जब भी जंगल में लकड़ी काटने के लिए
जाता था उन दोनों गधो को साथ लेकर जाता था और वहाँ पहुँचकर उन्हें रस्सी से बांध
देता था| एक दिन वो रस्सी ले
जाना भूल गया| उसने एक गधे को तो
बांध दिया पर दूसरा कहीं चला न जाये ये सोचकर उसने राहगीरों से मदद माँगने की सोची| पर उसे किसी के पास रस्सी नहीं मिली| ये सब एक साधु महाराज देख रहे थे
उन्होंने उस लकड़हारे से बात की तो सारी बात पता चली| उन्होंने उस लकड़हारे को एक उपाय बताया| साधु महाराज की बात मानकर लकड़हारे ने
वैसा ही किया जैसा उन्होंने कहा| दूसरे
गधे को साधु महाराज जी के कहे अनुसार बाँधने का नाटक किया| गधा रोज की तरह चुपचाप बैठ गया| अपना काम निपटाकर लकड़हारा जब वापिस आया
तो दोनों गधे अपनी जगह पर थे| रोज
की तरह उसने पहले गधे की रस्सी खोली तो वह उठ खड़ा हुआ और दूसरा गधा उसके उठाने पर
भी नहीं उठा तो उसे कुछ समझ नहीं आया कि ये उठ क्यों नहीं रहा| साधु महाराज तब भी वही खड़े थे और
लकड़हारे से कहा कि तुमने जैसे इसे बांधने का नाटक किया था वैसे ही इसे खोलने का
नाटक करो क्योंकि वास्तव में ये किसी रस्सी से नहीं अपने मन के बन्धनों से बंधा
हुआ है और सच में वैसा ही हुआ लकड़हारे ने गधे को खोलने का नाटक किया तो वह उठ खड़ा
हुआ| ये देखकर लकड़हारा
हैरान रह गया और साधु महाराज की शरण ग्रहण की| तब उन्होंने उसे उपदेश दिया कि साधारण
जीव भी इसी प्रकार माया के झूठे बन्धनों से बंधे हुए है और वे जब सतगुरु की शरण
ग्रहण करते हैं तब उन्हें वास्तविकता का ज्ञान होता है||
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वृक्ष ने पकड़ लिया
एक राजा ने एक दिन पूर्ण महापुरुषों की
सेवा में उपस्थित होकर विनय की- महाराज| सब प्रकार के सांसारिक पदार्थ तथा
शारीरिक सुख सुविधायें उपलब्ध होते हुए भी मेरा चित्त सदा अशान्त रहता है| आप कोई उपाय बताये जिससे मुझे मानसिक
सुख-शान्ति प्राप्त हो| महापुरुषों ने फ़रमाया कि संसार को छोड़
दो तुम्हारे सारे दुःख: खत्म
हो जायेंगे| राजा ने विनय की- आपका अभिप्राय है कि मैं राज्य का
त्याग करके संन्यास ले लूँ| महापुरुषों
ने फ़रमाया- संसार छोड़ने से
हमारा अभिप्राय यह नहीं है कि तुम राज्य छोड़कर सन्यास ले लो| हमारा अभिप्राय यह है कि संसार
तुम्हारे ह्रदय में घुसा हुआ है, उसे
बाहर निकाल फैंको| फिर देखो कि
तुम्हें मानसिक सुख-शान्ति मिलेगी| राजा चला गया परन्तु उसकी मानसिक
स्थिति में तनिक भी परिवर्तन न हुआ| उसने
एक दिन फिर महापुरुषों के चरणों में विनय की-
महाराज आपके वचनानुसार मैं संसार को
छोड़ने का प्रयत्न करता हूँ परन्तु संसार मुझसे छूटता नहीं है| महापुरुषों ने कहा राजन| तुम चेतन हो और संसार जड़ है फिर वह भला
तुमको कैसे बांध सकता है| तुम
अपने विचारों से ही बंधे हुए हो| महापुरुषों
ने राजा को काफी समझाया परन्तु उसके समझ न आया तो महापुरुषों ने उसे अगले दिन आने के लिए कहा| दूसरे दिन जब राजा वहाँ पहुँचता है तो
क्या देखता है कि महापुरुष एक वृक्ष के तने को दोनों हाथ फैलाकर कसके भींचे हुए है| राजा ने उन्हें प्रणाम किया और पूछा- महाराज| यह आप क्या कर रहे हैं? महापुरुषों ने उत्तर दिया-राजन| हम कुछ नहीं कर रहे इस वृक्ष ने बड़ी
देर से हमको पकड़ रखा है हम अपने आपको छुड़ाने का बहुत प्रयत्न कर रहे हैं परन्तु यह
हमे छोड़ने का नाम ही नहीं लेता| राजा
ने कहा-महाराज| वृक्ष तो जड़ है और आप चेतन है फिर भला
वृक्ष आपको कैसे पकड़ सकता है| उसे
तो आपने स्वयं ही पकड़ रखा है|
महापुरुषों ने वृक्ष को छोड़ते हुए कहा- उस समय तुम्हारा यह ज्ञान कहाँ चला
जाता है जब तुम यह कहते हो कि संसार ने तुम्हें अपने बंधन में जकड़ रखा है| क्या संसार जड़ और तुम चेतन नहीं हो? यदि
वृक्ष हमें नहीं पकड़ सकता तो संसार तुम्हें कैसे पकड़ सकता है? यह बात राजा की समझ में आ गई और उस दिन
से वह अनासक्त भाव से संसार में रहते हुए सुख- शान्ति पूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा||
****
खट -2 में घोड़े ने पानी पिया
कथा है- एक व्यक्ति घोड़े पर सवार होकर कहीं जा
रहा था यात्रा करते हुए दोपहर हो गई| ग्रीष्म
ऋतु थी, सूर्यदेव अपनी
प्रचंड रश्मियों से सबको व्याकुल कर रहे थे,
वह यात्री भी गर्मी से बहुत बेचैन था
और प्यास के मारे उसका गला सूख रहा था तभी वह एक गाँव के निकट जा पहुँचा, जहाँ एक किसान खेत को पानी दे रहा था| कुएँ पर रहट चल रहा था, जिसके द्वारा पानी कुएँ में से निकलकर
नाली के माध्यम से खेत में जा रहा था| रहट
चलने से खट- खट की आवाज हो रही
थी| यात्री ने खेत के
किनारे एक वृक्ष के साथ अपना घोड़ा बांधा और कुएँ पर जाकर मुँह हाथ धोया और फिर
पानी पीकर अपनी प्यास बुझाई|
तत्पश्चात घोड़े को पानी पिलाने के लिए
वह उसे भी कुएँ के निकट लाया| किन्तु
रहट की खट-खट की आवाज सुनकर
घोड़ा डर कर पीछे हट गया| तब
यात्री ने किसान से कहा- भैया| रहट की खट-खट की आवाज से घोड़ा डर रहा है, इसलिए कुछ देर के लिए यह रहट चलाना बंद
कर दो ताकि घोड़ा पानी पी ले| किसान
ने रहट बंद कर दिया| रहट के बंद होते ही
कुएँ से पानी आना बंद हो गया| यात्री
ने कहा मैंने तो रहट बंद करने के लिए कहा था परन्तु तुमने तो पानी ही बंद कर दिया| किसान ने कहा-भैया| रहट चलेगा तो कुएँ से पानी निकलेगा, बिना उसके चले पानी कैसे निकलेगा और जब
रहट चलेगा तो खट-खट की आवाज भी होगी
इसलिए यदि घोड़े को पानी पिलाना है तो इसी खट-खट
में ही पिलाना होगा| इसी प्रकार संसार
के काम- धन्धे तो जीवन भर
समाप्त होंगे नहीं, इसलिए उनसे फुर्सत
भी नहीं मिलेगी| इन काम-धन्धों के साथ-साथ ही मनुष्य को भजन भक्ति का काम भी
करना चाहिए|
****
पिछले जन्म का बदला
एक
शहर में दो भाई रहते थे एक के पास तो बहुत पैसा था, बीवी-बच्चे भी थे| पर दूसरे के पास ना तो पैसा ज्यादा था
ना ही उनके घर में कोई संतान थी| एक
दिन पहले वाले व्यक्ति की हालत बहुत खराब हो गई तो उसे हस्पताल में भर्ती करवाया
गया| उस व्यक्ति के भाई ने डॉक्टर को कहा कि अगर तू
इसे कोई ऐसे दवाई दे जिससे यह बच ना सके तो इसकी सारी जमीन-जायदाद मेरी हो जायेगी और मैं तुम्हें
भी मालोमाल कर दूंगा| डॉक्टर
को लालच आ गया वह उस व्यक्ति की बातों में आ गया और उसने गलत दवाई देकर उसके भाई
को मरवा दिया| अब उस व्यक्ति के
मरने के बाद सारी जमीन- जायदाद
उसके भाई के नाम हो गई| कुछ
समय बाद उसके घर में भी संतान हो गई| तो
वह व्यक्ति कहने लगा कि मैंने सुना है जो बुरा करता है उसके साथ बुरा होता है| पर
मैंने तो बुरा किया फिर भी मेरे साथ अच्छा हो रहा है| पैसा भी मिल गया संतान भी हो गई| अब उसने अपने बच्चे के जन्म पर खूब
खर्च किया| धीरे-धीरे वह बच्चा बड़ा होने लगा उसके पिता
ने उसे हर सुख-सुविधायें दी अब जब
वह बड़ा हुआ तो उसकी शादी करवा कर पिता ने खूब धन खर्च किया| शादी के कुछ समय बाद ही उसके लड़के की
तबियत बिगड़ गई और तबियत भी ऐसी ख़राब हुई कि काफी धन लग गया लेकिन तबियत में कोई
सुधार नहीं आया| आखिर में जब उनके
घर में एक डॉक्टर उसके लड़के को देखने आया और जब वह डॉक्टर जाने लगा तो बेटे ने
अपने पिता जी से कहा कि पिताजी डॉक्टर जी को उनकी फीस दे दो और आज आपका और मेरा
हिसाब-किताब पूरा हो गया|
पिता ने कहा कि मैं कुछ समझा नहीं तब बेटे ने कहा कि पिताजी पिछले जन्म में मैं
आपका भाई था| आपने मुझे धोखा
देकर जितना पैसा हडपा था वह हिसाब इस जन्म में चुकता करने के लिए मैं आया था| आज वह हिसाब पूरा हो गया अब आपको मेरे
मरने के दुःख पर परेशानी नहीं झेलनी पड़ेगी|तब
पिता ने रोते-रोते पूछा कि चल
मेरा तो कसूर था परन्तु तेरी पत्नी का क्या दोष था जो तू उसे छोड़ के जा रहा है तो
उस लड़के ने जवाब दिया कि ये जो मेरी पत्नी है ये पिछले जन्म में डॉक्टर थी| इसने मुझे गलत दवाई देकर मरवाया था| अब ये उसकी सजा भुगतेगी| तो कथा का सार यही है कि इंसान संसार
में अपने कर्मो के अनुसार फल पाने आता है|
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संतों के संग से बैकुण्ठ
एक गाँव में एक साहूकार रहता था, एक बार वह पैसे की वसूली के लिए दो-तीन गाँव में गया जहाँ उसे शाम हो गई| साहूकार के पास रकम भी थी और सामान भी
था तो उसने अकेले घर
जाना उचित ना समझा| उसने किसी मजदूर की
तलाश की परन्तु रात काफी हो चुकी थी इसलिए कोई भी मजदूर इतनी दूर जाने को तैयार न
हुआ| अन्त में एक
परोपकारी सन्त उस साहूकार के साथ चलने के लिए तैयार हुए| उनका यह नियम था कि जिसका भी वह काम
करते या तो उनसे सत्संग सुनते थे या सुनाते थे| तो साहूकार ने कहा कि मुझे तो सत्संग
नहीं आता ना ही मैंने कभी सुना है, हाँ| यदि आप मुझे सत्संग सुनायेंगे तो मैं अवश्य
सुन लूंगा| सन्त जी ने सामान
उठा लिया और वे दोनों साहूकार के गाँव की ओर चल दिये| वास्तव में उन्हें मजदूरी से तो कोई
प्रायोजन था नहीं| वे तो साहूकार को
कुछ देर तक सत्संग का लाभ देना चाहते थे ताकि उसके कुछ पुण्यकर्म उदय हो जाएँ| सत्संग करते-करते साहूकार का घर आ गया| सत्संग के प्रभाव से साहूकार के
विचारों में भी काफी परिवर्तन आ गया, अतएव
घर पहुँचकर उसने सन्त जी का बड़ा आदर सत्कार किया| उसके विचारों में ऐसा परिवर्तन देखकर
सन्त अति हर्षित हुआ|
सन्त तो त्रिकालदर्शी होते हैं उन्हें अपनी योग-शक्ति से यह ज्ञात हुआ कि साहूकार की
केवल सात दिन की आयु शेष है| अत: उन्होंने साहूकार को एकान्त में बुलाकर
कहा- आपकी आयु केवल सात
दिन शेष है इसमें अधिक से अधिक प्रभु का भजन सुमिरन कर लो, क्योंकि सात दिनों के उपरान्त आपने
परलोक गमन कर जाना है किन्तु हमारी एक बात याद रखना कि मृत्यु के बाद आपको धर्मराज
के सामने ले जाया जाएगा और वहाँ आपसे ये कहा जाएगा आपने अनुचित कर्म किये है और
थोड़ी देर सत्संग किया है| अब
आपको कुछ देर के सत्संग का फल पहले लेना है अथवा पापकर्मो का? उस समय आप सत्संग का फल पहले माँग लेना| हमारी इस बात को अच्छी तरह बांध लो| यह सत्परामर्श देकर सन्त जी वहाँ से चल
दिए| सात दिन बाद
साहूकार का देहांत हो गया| जब
उसे धर्मराज के सम्मुख प्रस्तुत किया गया तो उसने वैसा ही किया जैसा उन्हें संतों
ने समझाया था| उसने सत्संग का फल
पहले माँग लिया| धर्मराज ने दूतो को
आदेश दिया कि इसे दो घड़ी के लिए बैंकुठ में ले जाओ| यमदूत उसे बैकुण्ठ के द्वार पर ले गए
और बोले- तुम दो घड़ी के लिए बैकुण्ठ
में निवास करो| चूँकि हम लोगों को बैकुण्ठ
में आना मना है| इसलिए हम लोग यहीं
द्वार पर तुम्हारी प्रतीक्षा करेंगे| दो
घड़ी के बाद तुम खुद ही बाहर आ जाना अन्यथा हम बुरी तरह से पेश आयेंगे| साहूकार ने बैकुण्ठ में प्रवेश किया तो
क्या देखता है कि वह सन्त, जिन्होंने
मजदूर का सामान उठाया था वहाँ विराजमान है|
साहूकार उनके चरणों पर गिर पड़ा और उनके
उपकार को स्मरण कर उनकी आँखों से प्रेमाश्रु बहने लगे| संतों ने उसे प्रेम से अपने निकट
बिठाया और सत्संग शुरू कर दिया| जब
दो घड़ी का समय व्यतीत हो गया तो साहूकार को यमदूतों की बात स्मरण हो गई और वह उठकर
बाहर जाने लगा| तब सन्त जी ने कहा
कि कहाँ जाते हो? साहूकार ने उत्तर दिया- भगवान मेरा समय समाप्त हो गया है| वह देखिये द्वार पर खड़े हुए यमदूत मुझे कैसे घूर-घूर कर देख रहे हैं और संकेत से मुझे
बुला रहे हैं| सन्त जी ने फ़रमाया- कि आप उनकी तनिक भी चिंता न करे| उनको बैकुण्ठ के अन्दर आने की आज्ञा
नहीं है आप बैकुण्ठ से बाहर ही मत जाओ, वे
अपने आप प्रतीक्षा कर के लौट जायेंगे|
सन्त जी की बात मानकर साहूकार बैकुण्ठ से बाहर नहीं गए| यमदूत बड़ी देर तक प्रतीक्षा करते रहे
अन्तत: परेशान होकर वे
धर्मराज के पास लौट गए और सब वृत्तांत कह सुनाया| धर्मराज ने कहा- इस विषय में मैं भी कुछ कर सकने में
असमर्थ हूँ क्योंकि विधाता की ओर से संतों सत्पुरुषों को यह अधिकार प्राप्त है कि
वे जैसा उचित समझे करें| वे
जिस व्यक्ति को बख्शना चाहे, बख्श
सकते हैं| सच है- जिसे सन्त सत्पुरुषों की ओट और उनका
सहारा मिल जाए, धर्मराज की क्या
शक्ति है कि उससे लेखा माँग सके? सन्त
सत्पुरुषों की कृपा से उसका कर्म लेख भी समाप्त हो जाता है|
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सात दिन शेष
एक बार किसी व्यक्ति ने एक भक्त से
पूछा कि आप हम जैसे संसार के सब कार्य- व्यवहार
कर रहे हैं| आप विकारो से कैसे
बचे रह सकते हैं| भक्त जी ने कहा कि
तुम्हारे जीवन में केवल सात दिन शेष है यदि अधिक होते तो इसका उत्तर देते| " सात दिन पश्चात्
मृत्यु| इतना सुनकर उसके
होश उड़ गये| अब उसने अपने
उद्धार का साधन पूछा| भक्त
जी ने कहा कि उद्धार का साधन यही है कि सामने वाले कमरे में बैठकर प्रभु नाम के
सुमिरन में दिल लगा| आँखे बन्द कर या
खोल कर केवल मृत्यु को याद रखना कि वह सिर पर सवार है| विषय-विकारों में मन को ना जाने देना| तब अवश्य ही उद्धार होगा| वह व्यक्ति सामने वाले कमरे में प्रभु-ध्यान में मन को लगाने के लिए बैठ गया| दो-तीन दिन तक तो मन चंचल को बाहर की ओर
भागता रहा, परन्तु फिर उसे
ध्यान आता कि मृत्यु आने वाली है मुझे कुछ नहीं चाहिये| जो भी भक्त जी के पास भेंट लाता, वे उस सामान को उसी कमरे में रखवाते थे| अब मृत्यु के डर से उसने अपनी सुरति उन
सामानों से भी हटा ली| सांतवे
दिन उसने अपनी आँखे मूंद ली| वैराग्य
की अवस्था और प्रभु- सुमिरण का अमृत पान
करने में निगमन हो गया| जब
आठवे दिन के दो पहर बीत गए| भक्त
जी आये और उसे उठाते हुए कहा-
"अब इस अवस्था को बनाये रखना|" उसने कहा-"भक्त जी मेरी मृत्यु तो हुई नहीं, उन्होंने उत्तर दिया-"हाँ| हमने तुम्हारे संशय निवारण का उपाय
किया है| इन दिनों हमने
राजसी वैभव, स्वादिष्ट पकवान
आदि सामान भेजे थे उनमे तुम्हारा राग नहीं हुआ" उसने उत्तर दिया- "भक्त जी मृत्यु सिर पे मंडरा रही थी| बस| यही स्मरण कर प्रभु-सुमिरण में चित लगाया|" भक्त जी ने कहा कि तुमको सात दिनों तक
मृत्यु याद रही, हमे हर समय यही याद
है कि मृत्यु कभी भी आ सकती है| इसलिए
वैराग्य अवस्था में रहते हुए हम संसार के सब कार्य करते हैं|
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बचपन का मित्र स्वप्न में
एक बार एक महात्मा जी ने स्वप्न देखा
और उसमे देखा कि महात्मा जी को उनके बचपन का मित्र मिला है और वह उनसे पूछ रहा है
कि ये क्या हालत कर रखी है सन्यासी बन गए हो तुम तो| मुझे देखो आज के समय में मेरा मासिक
वेतन 3000 रुपये है| काफी समय पुरानी बात है जब 3000 रुपये भी बहुत बड़ी रकम होती थी| महात्मा जी ने उसकी बात सुनकर झाड़ू
उठाई और आश्रम में मारने लगे| फिर
जितनी धूल- मिट्टी इकट्ठी हुई
उसे हाथ में लेकर उस व्यक्ति को दिखाया कि देखो ये मेरी मासिक आय है तब उस व्यक्ति
को यह अच्छा न लगा उसने अपने हाथों से महात्मा जी के हाथों को झटका देकर उस मिट्टी
व धूल को उड़ा दिया जैसे ही वह धूल नीचे जमीन पर गिरी| सारी की सारी धुल हीरे मोतियों में बदल
गई| तब महात्मा जी ने
फ़रमाया कि गुरु घर की धूल-मिट्टी
हीरे मोतियों से बढ़कर होती है|
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प्रेम, धन, सफलता
एक औरत अपने घर से निकली, उसने
घर के सामने सफ़ेद लम्बी दाढ़ी में तीन साधु-महात्माओं को बैठे देखा। वह उन्हें
पहचान नही पायी। उसने कहा, मैं
आप लोगों को नहीं पहचानती, बताइए क्या काम है? हमें भोजन करना है। साधुओं ने बोला। ठीक है! कृप्या मेरे घर में
पधारिये और भोजन ग्रहण कीजिये।
क्या तुम्हारा पति घर में है?”, एक साधु ने प्रश्न किया। नहीं, वह कुछ देर के लिए बाहर गए हैं।” औरत ने उत्तर दिया। तब हम अन्दर नहीं आ
सकते, तीनों एक साथ बोले। थोड़ी देर में पति
घर वापस आ गया, उसे साधुओं के बारे
में पता चला तो उसने तुरंत अपनी पत्नी से उन्हें पुन: आमंत्रित करने के लिए कहा। औरत
ने ऐसा ही किया, वह साधुओं के समक्ष
गयी और बोली, जी, अब मेरे पति वापस आ गए हैं, कृप्या आप लोग घर में प्रवेश करिए! हम किसी घर में एक साथ प्रवेश नहीं
करते।” साधुओं ने स्त्री
को बताया। ऐसा क्यों है? औरत ने अचरज से पूछा। जवाब में मध्य में खड़े साधु ने बोला,” पुत्री मेरी दायीं तरफ खड़े साधु का नाम ‘धन’ और बायीं तरफ खड़े साधु का नाम ‘सफलता’ है, और मेरा नाम ‘प्रेम’ है। अब जाओ और अपने पति से
विचार-विमर्श कर के बताओ की तुम हम तीनों में से किसे बुलाना चाहती हो।”
औरत अन्दर गयी और अपने पति से सारी बात बता दी। पति बेहद खुश
हो गया। “वाह, आनंद आ गया, चलो जल्दी से ‘धन’ को बुला लेते हैं, उसके आने से हमारा घर धन-दौलत से भर
जाएगा, और फिर कभी पैसों
की कमी नहीं होगी। औरत बोली, क्यों न हम सफलता को बुला लें, उसके आने से हम जो करेंगे वो सही होगा, और हम देखते-देखते धन-दौलत के मालिक भी
बन जायेंगे। हम्म, तुम्हारी बात भी सही है,
पर इसमें मेहनत करनी पड़ेगी, मुझे तो लगता ही धन को ही बुला लेते
हैं।”, पति
बोला। थोड़ी देर उनकी बहस
चलती रही पर वो किसी निश्चय पर नहीं पहुँच पाए, और अंतत: निश्चय किया कि वह साधुओं से यह
कहेंगे कि धन और सफलता में जो आना चाहे आ जाये। औरत झट से बाहर गयी और उसने यह आग्रह
साधुओं के सामने दोहरा दिया।
उसकी बात सुनकर साधुओं ने एक दूसरे की तरफ देखा और
बिना कुछ कहे घर से दूर जाने लगे। अरे! आप लोग इस तरह वापस क्यों जा रहे
हैं ?”, औरत
ने उन्हें रोकते हुए पूछा। पुत्री, दरअसल हम तीनों साधु इसी तरह द्वार-द्वार जाते हैं, और
हर घर में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, जो
व्यक्ति लालच में आकर धन या सफलता को बुलाता है हम वहाँ से लौट जाते हैं, और
जो अपने घर में प्रेम का वास चाहता है उसके यहाँ बारी-
बारी से हम दोनों भी प्रवेश कर जाते हैं। इसलिए इतना याद रखना कि जहाँ प्रेम है
वहाँ धन और सफलता की कमी नहीं होती।”, ऐसा
कहते हुए धन और सफलता नामक साधुओं ने अपनी बात पूर्ण की।
****
परमात्मा ने जिम्मेवारी ली है
एक व्यक्ति एक दिन बिना बताये काम पर
नहीं गया| मालिक ने, सोचा उसकी तन्खवाह बढ़ा दी जाए तो यह दिल से काम करेगा और उसकी
तन्खवाह बढ़ा दी| अगली बार जब उसको तन्खवाह से ज्यादा पैसे दिए तो वह कुछ नही बोला
चुपचाप पैसे रख लिए| कुछ महीनों बाद वह फिर गैरहाजिर हो गया| अब कि बार मालिक को
बहुत गुस्सा आया| उसने सोचा कि इसकी तन्खवाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ, यह नही
सुधरेगा और उस ने बड़ी हुई तन्खवाह कम कर दी और इस बार उसको पहले वाली तन्खवाह
दी| वह इस बार भी चुपचाप ही रहा और जबान
से कुछ न बोला| तब मालिक को बड़ा ताजुब हुआ | उसने उससे पूछा कि जब मैंने तुम्हारे
गैर हाजिर होने के बाद तुम्हारी तन्खवाह बढ़ा कर दी तुम कुछ नही बोले और आज
तुम्हारी गैर हाजिरी पर तन्खवाह कम कर के दी फिर भी खामोश ही रहे| इसकी क्या वजह
है? उसने जवाब दिया| जब मैं पहले गैर हाजिर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ
था| आपने मेरी तन्खवाह बढ़ा दी तो मैं समझ
गया| परमात्मा ने उस बच्चे के पालन पोषण का हिस्सा भेज दिया और जब मैं गैर हाजिर
हुआ तो मेरी माता जी का निधन हो गया था| जब आपने मेरी तन्खवाह कम कर दी तो मैंने
यह मान लिया कि मेरी माँ अपने हिस्सा का अपने साथ ले गई| फिर इस तन्खवाह की खातिर
क्यों परेशान होना| जिस का जिम्मा खुद परमात्मा ने ले रखा है | तो परेशान क्यूँ
होना |
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प्रतिबिम्ब में सिंह का रूप
एक गडरिया वन में भेड़े चराया करता था, उसे सयोंग वश सिंह का नवजात शावक मिल
गया| उसे वह भेड़ों के
साथ चराने लगा| वह भी संगति के
कारण उनके साथ घास चरता, पानी पीता और रात को उन्ही के साथ बाड़े में बन्द हो
जाता| एक दिन गडरिया जंगल
में भेड़े चरा रहा था एक सिंह उधर आ निकला|
उसकी गर्जन सुनकर सब भेड़े भाग खड़ी हुई| शेर की नजर उस बच्चे पर पड़ी जो उनके
साथ ही उनकी तरह भयभीत होकर भाग रहा था| सिंह
ने झपटकर उसे पकड़ लिया और कहा-
"नादान| तू क्यों भागता हैं और डर क्यों रहा है, तू तो शेर है"| परन्तु वह सुगमता से कब मानने वाला था| उसके अन्दर तो भेड़ों वाले संस्कार ही
भर गए थे| वह उसे एक सरोवर पर
ले गया| उसे कहने लगा कि इस
पानी में अपना और मेरा प्रतिबिम्ब देख| हम
और तुम एक है आकृति, रूप, वर्ण- सब कुछ हम दोनों का एक सामान है| तब उसे विश्वास हुआ और वह अपने स्वरुप
को पहचान कर सिंह रूप बन गया| अभिप्राय यह है कि सिंह की संगति ने ही उसे अपनी
भूली हुई सत्ता को याद करा दिया अन्यथा वह तो अपने निजरूप को भूल गया था| इसी तरह मनुष्य भी अपने स्वरुप से भूला
हुआ है| उसे अपने वास्तविक
रूप की पहचान सन्त महापुरुष ही उन्हें करवाते हैं|
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बूढ़े व्यक्ति को घर से बाहर निकाला
कथा है- कहते हैं कि एक बूढ़े व्यक्ति को उसके
पोते ने किसी बात पर लातो से मारा और उसे धक्के देकर बाहर निकाल दिया| गली में बैठा हुआ वह बूढा व्यक्ति रोते-रोते अपने पोते को अपशब्द भी कह रहा था| संयोग से एक महात्मा जी भी उस गली से
गुजर रहे थे| बूढ़े व्यक्ति को
देखकर महात्मा जी को दया आयी और उन्होंने उससे उसके रोने का कारण पूछा| वह बोला- "महाराज| मेरे कमाये हुए सारे धन को मेरे पुत्र-पोतो ने छीन लिया है| अब जब मैं कुछ खाने को माँगता हूँ, तो मारने को दौड़ते हैं| आज मेरे पोते ने मुझे लातो से मारा है
और धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया| अब, मेरा रोने और अपशब्द कहने के अतिरिक्त
कुछ बस नहीं चलता| महात्मा जी बोले- "बाबा| संसार का यही हाल है| सारी दुनिया अपने मतलब की है, दुखी अवस्था में कोई किसी का साथी नहीं
बनता| जब तेरा शरीर बलवान
था और तू अपने हाथों से कमा सकता था, तब
तक तो तेरे आगे-पीछे जी-जी हाँ हाँ कहते फिरते थे, परन्तु अब जब तेरा शरीर कमाने योग्य
नहीं रहा, तब मारने को आते
हैं| अब तो तू एक प्रकार
से उन पर बोझ बना हुआ है| कुटुम्बियों
की हालत तो तूने देख ही ली है| अब
हमारी बात सुन| यदि तू मान जाये, तो तेरे हित की बात यह है कि सबका मोह
त्यागकर अपने उद्धार के लिए भगवान का भजन कर|
अगर तू चाहे, तो हम तुझको अपनी कुटिया पर ले चलते
हैं| वहाँ तुझे भोजन भी
मिलेगा और भजन करने का अवसर भी प्राप्त होगा|
सत्संग में रहने से ही मन की शांति मिल
सकती है इसके अतिरिक्त मन को शान्ति देने का कोई साधन नहीं है| यद्यपि महात्मा जी ने उसके भले की बात
कही, परन्तु यह सुनते ही
वह बूढ़ा व्यक्ति तो बिगड़ गया| क्रोध
में आकर कहने लगा, तुझको किसने बीच
में डाला है| जो गुरु बनकर मुझे
उपदेश देने लगे| वह मेरा पोता, मैं उसका दादा, वह सदा जीता रहे, मुझे बेशक मारे| क्या बच्चों के मारने पर कोई अपना घर
छोड़ देता है| यह सुनकर महात्मा
जी मुस्कुराये और दिल में यह कहते हुए वहाँ से चल दिये कि देखो यह है संसारी
मनुष्यों का हाल है| कि एक ओर तो शिकायतें
करते हैं और दूसरी ओर मोह के कीड़े में भी बंधे हुए हैं|
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गधे को कुएँ में फैक दिया
एक
गाँव में एक कुम्हार रहता था। उसके पास मिट्टी ढोने के लिए एक
गधा था जो कि काफी सालों से उसके साथ था पर अब वह गधा बूढ़ा हो चुका था और मिट्टी
नहीं उठा पाता था। और बुढ़ापे और दर्द के कारण ची -बौ -ची -बौ चिल्लाता रहता था। गाँव वाले उसकी वज़ह से रात में
सो नहीं पाते थे। एक दिन सभी गाँव वाले मिलकर कुम्हार के पास जाकर बोले - "इस
गधे को मार दो यह हमें न तो दिन में चैन लेने देता हैं और ना ही रात में सोने देता है।"
कुम्हार बोला- "यह मेरे यहाँ काफ़ी दिनों से मिट्टी ढोता आया है
मैं इसे मार नहीं सकता। पर गाँव के बीच में एक सुखा कुआँ है, मैं इसे उस कुएँ में डाल देता
हूँ, यह अपने आप मर जाएगा। "कुम्हार
ऐसा ही करता है। अब गधा कुएँ में भूखा - प्यासा रहता है और भूख के मारे ओर ज़ोर से
चिल्लाता हैं। गाँव वाले और परेशान हो जाते हैं।अगले दिन सभी मिलकर plan बनाते हैं इसको कैसे चुप कराया
जाए। उन्हें एक idea आता है कि हमारे घरों का रोज का
जो कूड़ा - कचरा सभी गाँव वाले उस गधे पर डालेंगे तो वह उस कचरे के नीचे दबकर मर
जाएगा। पहले दिन एक - एक करके सब अपना
कचरा फैंकने लगे। गधा समझदार था, जैसे
ही कचरा उसकी पीठ पर गिरता, वह
अपनी पीठ को हिलाता और कचरा नीचे गिर जाता। उसमे से बची हुई खाने की चीजे वह खा
लेता और बाकि कचरे को अपने पैरो के नीचे दबा लेता और उस पर खड़ा हो जाता। कुछ दिनों
में गधा बचे हुए फल फुल , सब्जियाँ
खाकर हष्ट - पुष्ट हो गया और कुआँ भी धीरे - धीरे कचरे से भर गया। और एक दिन गधा
कुँए से बाहर निकल कर जंगल में भाग गया इस तरह उसने अपनी जान बचा ली।
MORAL - इस
तरह हमारी life में कई तरह negative लोग आते हैं जो कि हमको दबाने की
कोशिश करते हैं , हमे अपने आप को shake करके उन negative को हटा देना चाहिए और उन negative को एक stepping stone के
रूप में use करके अपनी life में आगे बढ़ जाना चाहिए। अगर वह गधा उन negatives को stepping stone नहीं
बनाता और सोचता की negative
बहुत सारे हैं मैं क्या कर सकता हूँ तो वह कब से मर गया होता।
****
छन्नी में पानी लाने को कहा
एक बार एक संत जी ने अपने सभी शिष्यों
को बुलाया और उन्हें एक छन्नी दी और फरमाया कि इसमें पानी भर के लाओ| अब सारे
शिष्य हैरान कि छन्नी में पानी कैसे
भरेगा| लेकिन सभी यह सोच कर चले गए कि चलो
पानी भर के देख लेते है लेकिन जब वे छन्नी में पानी भरने लगे तो पानी निकल जाता|
अब धीरे धीरे सारे शिष्य इस काम को छोड़ कर
चले गए| लेकिन एक शिष्य को विश्वास था कि सतगुरु ने कहा है तो उनकी बात झूठ नहीं
हो सकती इस छन्नी में पानी जरुर भरेगा| वह कोशिश करता रहा कुछ समय बाद उस छन्नी
में पानी भरना शुरू हो गया और वह छन्नी पानी से भर गई| तब वह अपने गुरु जी के पास
वह छन्नी ले कर गया तो गुरु जी ने उससे पूछा कि तुमने ये कैसे किया बाकी सभी तो
छन्नी में पानी भर नहीं पाये| तब उसने कहा कि सतगुरु जी मुझे आप कि बात पर विश्वास
था कि आपने कहा है तो छन्नी में पानी जरुर भरता होगा| मैं छन्नी में पानी डालता
रहा धीरे धीरे इस छन्नी में छोटे -2 कंकर पत्थर जमा होने शुरू हो गए जिससे छन्नी
के छेद सरे बंद हो गए और पानी भर गया| तो ये है विश्वास जो उस शिष्य ने अपने
सतगुरु पर किया| ऐसा ही विश्वास हर गुरुमुख को अपने सतगुरु पर होना चाहिए
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टैक्सी वाले ने दुगने पैसे मांगे
एक पहलवान जैसा, हट्टा-कट्टा, लंबा-चौड़ा
व्यक्ति सामान लेकर किसी स्टेशन पर उतरा।
उसनेँ एक टैक्सी वाले से कहा कि मुझे साईँ बाबा के मंदिर जाना है।टैक्सी वाले नेँ कहा- 200
रुपये लगेँगे। उस पहलवान आदमी नेँ
बुद्दिमानी दिखाते
हुए कहा- इतने पास के दो सौ रुपये, आप टैक्सी वाले तो लूट रहे हो। मैँ अपना सामान खुद
ही उठा कर चला जाऊँगा। वह व्यक्ति काफी दूर तक सामान लेकर
चलता रहा। कुछ देर बाद पुन: उसे वही टैक्सी वाला दिखा, अब उस आदमी ने फिर टैक्सी वाले से पूछा – भैया अब तो मैंने आधा से ज्यादा दूरी तर कर ली है तो
अब आप कितना रुपये लेँगे? टैक्सी वाले नेँ
जवाब दिया- 400 रुपये। उस
आदमी नेँ फिर कहा- पहले दो सौ रुपये, अब चार सौ रुपये, ऐसा क्योँ। टैक्सी वाले नेँ जवाब दिया- महोदय, इतनी देर से आप साईँ मंदिर की विपरीत दिशा मेँ दौड़ लगा
रहे हैँ जबकि साईँ मँदिर तो दूसरी तरफ है। उस
पहलवान व्यक्ति नेँ कुछ भी नहीँ कहा और चुपचाप टैक्सी मेँ बैठ गया। इसी
तरह जिँदगी के कई मुकाम मेँ हम किसी चीज को बिना गंभीरता से सोचे सीधे काम शुरु कर
देते हैँ, और फिर अपनी मेहनत
और समय को बर्बाद कर उस काम को आधा ही करके छोड़ देते हैँ। किसी भी काम को हाथ मेँ
लेनेँ से पहले
पूरी तरह सोच विचार लेवेँ कि क्या जो आप कर रहे हैँ वो आपके
लक्ष्य का
हिस्सा है कि नहीँ। हमेशा एक बात याद रखेँ कि दिशा सही
होनेँ पर ही मेहनत पूरा रंग लाती है और यदि दिशा ही गलत हो तो आप कितनी भी मेहनत का कोई
लाभ नहीं मिल पायेगा। इसीलिए दिशा तय करेँ और आगे बढ़ेँ कामयाबी आपके हाथ जरुर
थामेगी।
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राजा ने सबकी इच्छा पूरी की
एक बार किसी देश के राजा के मन में
विचार आया कि वह अपने राज्य में हर व्यक्ति को उसकी इच्छा के अनुसार कुछ देना
चाहता है| उसने इसके लिए एक
बड़े से मैंदान में बड़ी-बड़ी
दुकानों की व्यवस्था करवाई, जिसके
पास जरुरत की हर वस्तु थी|
अब वहाँ लोगों का आना शुरू हुआ|
कोई भी व्यक्ति अपनी इच्छा अनुसार केवल एक ही वस्तु ले जा सकता था| तो लोग अपनी पसंद के अनुसार सामान
लेते गये और वापिस अपने घरों को जाते गये|
किसी ने कपड़े लिए, किसी ने खाने की
वस्तु, किसी ने अन्य
वस्तुये| वहीं पर सत्संगी
लड़का भी घूम रहा था| तो उसने जब ऐसा
सुना तो वह बाजार में आगे की तरफ बढ़ता गया जब पूरा बाजार ख़त्म हुआ तो वहीं पर राजा
का सिंघासन लगा हुआ था|
उस लड़के ने आकर राजा
को छुआ| तो राजा ने उसे
कहा कि आपने जो वस्तु लेनी है उसे जाकर छुओ|
तब उस लड़के ने बड़ी समझदारी से उत्तर दिया- कि आज जो व्यक्ति जिस भी वस्तु को
छुयेगा वह उसकी हो जायेगी|
अब मैंने आपको छू लिया मतलब कि आप मेरे हो गए और जब आप मेरे हो गए तो आपकी हर
वस्तु पर मेरा भी अधिकार हो गया|
तब राजा ने उसकी समझदारी की दात दी|
ठीक उसी प्रकार अगर हम भी भगवान से उसी को माँगेंगे तो यही हमारी समझदारी होगी| क्योंकि अगर भगवान मिल गया तो संसार
की प्रत्येक वस्तु अपनी हो जायेगी||
****
कर्मों का फल भुगतना
एक बार की बात है किसी देश के राजा की
कथा है जो कि बड़ा दानी था|
लेकिन उसका नियम था कि वह केवल एक निश्चित समय पर दान दिया करता था| उसके बाद वह किसी को दान नहीं देता था| एक दिन उस राजा के पास एक सन्त जी आये
जिनका नियम था कि वे केवल एक ही
घर में भीक्षा के लिए जाते थे जो कुछ
मिलता था उसी से गुजारा करते थे और जहाँ वे जाते कुछ न कुछ थोड़ा या ज्यादा जरुर
लाते थे| अब सन्त जी ने
राजा से भीक्षा माँगी लेकिन राजा का दान का जो निश्चित समय था वह ख़त्म हो चुका था| राजा ने सन्त जी को कहा कि अब मैं
तुम्हें भीक्षा नहीं दे सकता|
क्योंकि मेरा यह नियम है कि निश्चित समय पर ही दान देता हूँ| तब सन्त जी ने कहा कि मेरा भी यह नियम
है कि मैं भी एक घर से भीक्षा लेता हूँ तो आज तो मैं भीक्षा लेकर ही जाऊँगा| तो राजा को क्रोध आ गया उसने क्या
किया उसके पास घोड़े की लीद पड़ी थी राजा ने वह उठाकर सन्त जी की झोली में डाल दी| सन्त जी तो पहले ही बड़े सरल स्वभाव के
थे उन्होंने राजा को कुछ नहीं कहा और झोली में लीद को लिए वापिस चल दिये| रास्ते में भगवान को धन्यवाद कर रहे
कि शुक्र है भगवान तेरा|
कि आज तेरी कृपा से मेरा नियम नहीं टूटा|
उन्होंने अपने आश्रम के बाहर उस लीद को गिरा दिया| कुछ दिनों बाद राजा अपने सैनिकों के
साथ वन की तरफ जा रहा था तो रास्ते में वह क्या देखता है कि एक जगह पर बड़े-बड़े लीद के ढेर जमा हो रखे हैं| राजा यह देखकर हैरान कि यहाँ तो आसपास
कोई घोड़ो का अस्तबल नजर नहीं आता फिर ये लीद के ढेर कहाँ से आ गये| तब उसने अपने सैनिकों को भेजा कि जाओ
पता करके आओ| तो सैनिक जाते हैं
तो वही पास में एक झोपड़ी थी|
जिसमे सन्त जी रहते हैं|
जो राजा के यहाँ से लीद
को झोली में लेकर आये थे|
अब सैनिकों ने क्या किया वे झोपड़ी में गये और वहाँ बैठे सन्त जी से पूछा- कि ये लीद के ढेर कैसे
लगे हैं| तो सन्त जी ने
जवाब दिया कि अपने राजा से जाकर कहो कि ये वही लीद है जो राजा ने मेरी झोली में
डाली थी| अब वह बढ़ती-बढ़ती
इतनी ज्यादा हो गई है|
तो यह तो राजा को खानी पड़ेगी|
अब सैनिक यह सुनकर घबराते हुए राजा के पास गये और राजा को सारा वृतान्त सुनाया| अब राजा भी काफी घबरा गया| वह सन्त जी के पास गया और माफ़ी माँगने
लगा| तो सन्त जी ने कहा- कि यह लीद तो राजा जी आपको खानी ही पड़ेगी| ये आपके द्वारा किया गया पाप है| आपने जो लीद मेरी झोली में डाली थी वह पाप बढ़ता
गया और यहाँ लीद
के ढेर इकट्ठे हो गये|
तब राजा ने अपने बुरे काम की क्षमा माँगी और उस लीद को खत्म करने का उपाए पूछा| तो सन्त जी ने कहा कि नहीं राजा जी यह लीद तो आपको खानी
पड़ेगी| तब राजा ने घबराते
हुए उत्तर दिया- कि इतनी लीद
तो सात जन्म भी बीत जाये तभी भी खाते-खाते
खत्म न होगी| मैं आपसे दोबारा
माफ़ी माँगता हूँ कृपा करके इस लीद
को ख़त्म करने का उपाए बताइये|
तब सन्त जी ने दया कर राजा को इसका उपाय बताया कि राजा तुम अब अपने राज्य में जाकर
अपनी बुराइयाँ, अपनी निन्दा करवाओ| उस निन्दा से तुम्हारे बुरे कर्म कट
जायेंगे और यह लीद
कम हो जायेगी| राजा ने ऐसा ही
किया उसने राज्य में जाकर लोगों पर कर लगाना शुरू कर दिया| अत्याचार शुरू कर दिया जिससे कि पूरे
राज्य में साथ-साथ दूसरे राज्यों
में भी राजा की निन्दा होने लगी|
कुछ समय बाद जब राजा फिर से सन्त जी के पास गया तो उनके द्वारा बताये रास्ते पर
चलने से वह लीद के ढेर खत्म हो
गए थे| लेकिन वहीं थोड़ी
सी लीद जो सन्त जी
झोली मे लाये थे वह पड़ी थी|
तो राजा ने सन्त जी से पूछा कि यह
लीद तो खत्म नहीं हुई तो सन्त जी ने
कहा कि यह तो तुम्हें खानी ही पड़ेगी|
क्योंकि वह लीद जो खत्म हो गई
वो तो तुम्हारे द्वारा किये गए पापों का ब्याज था जो कि निन्दा करवाने से ख़त्म हो
गया लेकिन यह तो असल पाप है जिसका दण्ड तो तुम्हें भुगतना ही होगा| तो कहने का मतलब यही है कि कभी कोई
ऐसा काम न करो कि हमारे पाप प्रकाशित होकर बढ़ते जाये और उसका दण्ड हमें बहुत
ज्यादा भुगतना पड़े| उदाहरणतः यदि हम
किसी को गलत बात कह देते हैं और जिससे दूसरे का दिल दुख जाता है तो वह जब-जब उस बात को याद करेगा तो उसकी आत्मा
दुखेगी तो पाप तो हमारा ही बढ़ता जायेगा|
तो मतलब यही है कि हमेशा ऐसा कर्म करो जो कि दूसरों के लिए हितकारी हो||
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रानी ने लिखा लालसा
कथा है एक दफा एक राजा कहीं परदेस को
गया| वहाँ उसका काफी समय
गुजर गया| जब उसने वापिस घर
का इरादा किया, तो घर में अपनी
सातों रानियों को अलग-अलग चिट्ठिया इस प्रकार की लिखी कि उन्हें जिस-जिस वस्तु की जरुरत है वापसी हाल लिखे
ताकि यहाँ से खरीद कर साथ लाई जावे|
सातों चिट्ठियां रानियों के पास पहुँची|
जिसको जो चीज चाहिये छह रानियों ने तो साफ़-साफ़ लिख दिया| मगर जो सबसे छोटी रानी थी उसने और कुछ
न लिखा| सिर्फ एक लाल रंग
के कागज़ पर "सा" का अक्षर लिख कर लिफाफे में बन्द करके
भेज दिया| राजा ने चिट्ठियों
को पढ़ा| किसी रानी ने कपड़े
लिखे थे, किसी ने जेवर
माँगे थे, किसी ने खाने-पीने की चीजे माँगी| राजा ने फ़ौरन उन सामानों को खरीद लिया| जब सांतवी चिट्ठी को राजा ने खोला तो
उस में सिवाय लाल रंग के कागज पर
"सा" अक्षर के सिवाए कुछ भी नहीं लिखा था- या उस छोटी रानी के हस्ताक्षर थे| राजा की समझ में यह बात न आई, वह बड़ा चकित हुआ| बहुत कुछ दिमाग लड़ाने के बाद भी जब
कुछ पता न लग सका तो वजीर को बुलाया और उस चिट्ठी का मतलब पूछा- वजीर अकलमन्द होते
हैं- उसने सोच समझकर
गुत्थी को सुलझा लिया और राजा से निवेदन किया- स्वामिन| यह छोटी रानी सब रानियों से अकलमन्द
है| राजा ने कहा- समझा
कर कहो| वजीर बोला- हजूर लाल कागज है और "सा" अक्षर है| "लाल" और "सा" इन दोनों के मिलाप से "लालसा" शब्द तैयार होता है, जिस के अर्थ है खवाहिश जरुरत, चाहना, ऐ राजन| इस रानी का मतलब है कि मुझे सिर्फ
आपकी चाहना है, सिवाय आप के मुझे
और कुछ भी नहीं चाहिए|
मुझे सांसारिक चीजों की इच्छा नहीं है|
मैं केवल आप से आप को ही माँगती हूँ|
राजा यह सुनकर निहायत खुश हुआ|
बात को दिल में रख लिया और घर की तरफ रवाना हुआ| घर पहुँचते ही सब सामान रानियों को
बाँट दिया| सबके महलो में
पहुँचा दिया और राजा खुद उस रानी के महल में चला गया| जिसने सिर्फ उसे ही माँगा था| आप राजा जहाँ चला जाये और जिसने राजा
को अपना बना लिया हो उसे किस चीज की कमी रह गई होगी| एक हिसाब से सारे राज्य की मालिक ही
वह बन गई| क्योंकि जिसके घर
में सब राज्य का मालिक आ गया है|
राज्य उसी का है और कुछ राज्य अपना है उसकी सब चीजे अपनी है लेकिन अगर वह भी दूसरी
रानियों की तरह सांसारिक वस्तुओं का लोभ करती तो आज सारे राज्य की मालिक न बन जाती| इसी तरह सन्त कहते हैं| तुम माया से प्यार न करो| बल्कि माया पति से प्यार करो| जब वह माया का पति तुम पर प्रसन्न हो
जायेगा| तो फिर माया
तुम्हारे पीछे-पीछे फिरा करेगी| माया के सामान माँगने से सुख कभी नहीं
मिलता, सुख केवल उस मालिक
की प्राप्ति में है और किसी भी जगह सुख नहीं|
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कृष्ण कहाँ हो मेरे भैय्या
एक विधवा ब्राह्मणी थी| उसका एक छोटा लड़का था, जोकि एक गाँव के स्कूल में पढ़ने जाया
करता था| जाते समय उसे जंगल
से गुजरना पड़ता था| इसलिए वह बहुत
घबराता था| उसने अपनी माँ से
कहा, "मुझे उस
भयानक जंगल में बहुत डर लगता है"
तो उसकी माँ ने कहा बेटा|
तुम्हें डरने की क्या जरुरत है तुम्हारा भाई कृष्ण (भगवन) जंगल में रहता है| जब भी डर लगे उसे पुकार लेना| लड़का भोला था उसने विश्वास कर लिया| इसके बाद जब भी उसे डर लगता वह
पुकारने लगता, कृष्ण| कृष्ण| तुम कहाँ हो मेरे भैय्या? क्या तुम स्कूल तक मुझे छोड़ने नहीं
आओगे? उसी समय एक सुन्दर
किशोर दौड़ता हुआ आता है और कहता है| 'तुम
क्यों डर रहे हो, मैं तुम्हारे साथ
हूँ|' यह नित्यप्रति का
क्रम बन गया| भगवान कृष्ण एक
किशोर के रूप में छोटे भोले बालक का साथ देते बातचीत करते और खेलते| इस तरह कुछ दिन बीत गए| बालक अपने भाई के साथ बहुत खुश था| एक दिन स्कूल में कोई विशेष उत्सव था| स्कूल के अध्यापक ने अपने छात्रों से
नाना उपहार लाने को कहा|
वे छात्र जिसके पास धन था वे कई प्रकार के कीमती उपहार लाये और स्कूल में अध्यापक
को भेट किये| लेकिन इस बालक की
माँ एक गरीब स्त्री थी,
उसके पास देने को कुछ भी नहीं था|
वह छोटा बालक उस दिन स्कूल परेशान मन से गया|
भगवान श्री कृष्ण जी ने जब यह देखा तो पूछा!
'तुम्हारी यह दयनीय दशा क्यों है? उसने अपनी उदासी का कारण बताया, तब भगवान श्री कृष्ण ने उसे एक छोटा लौटा दूध का
भरकर दिया और कहा, "तुम यह अपने
अध्यापक को दे देना|" जैसे ही
गरीब बालक ने दूध का यह लौटा अध्यापक को दिया उसने आवेश में आकर बालक को डांट लगाई
कि इतनी तुच्छ भेंट लाये हो|
इसके पश्चात जब उसके लौटे को प्रयोग में लाया गया तो सभी उपस्थित लोग हैरान हो गए
उन्होंने देखा कि उस दूध के लौटे में से दूध खाली नहीं होता था| निरंतर दूध उस लौटे में लबालब भर जाता
था| अध्यापक की आँखों
में आँसू आ गए| उसने उस बालक को
बुलाया और पूछा, "यह
चमत्कारी दूध का लौटा कहाँ से मिला हैं|
उस बालक ने भोलेपन से सब वृतान्त बता दिया कि कैसे उसे अपने भाई से यह लौटा मिला
है| उसी दिन उसका
शिक्षक उसके साथ जंगल में गया|
उसने जंगल में अपने भाई को पुकारा|
जैसे ही उसने पुकारा एक आकाशवाणी हुई,
"तुम मुझे देख सकते हो क्योंकि तुम शुद्ध
आत्मा हो, तुमको मुझमे
विश्वास है| किन्तु तुम्हारा
शिक्षक अभी मुझे देख नहीं सकता क्योंकि उसमे शुद्धता, सच्चाई और विश्वास की कमी है"|
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