Monday, May 11, 2020

भक्त ग्वाल जी


भक्त ग्वाल जी
भक्त श्री ग्वाल जी एक छोटे से ग्राम में रहते थे आने-जाने वाले साधु-संतों की ओर इनका चित्त बरबस खिंच जाता था| जो कुछ भोजन माँ घर में बनाती, उसमे से जितना बन पड़ता, संतो को समर्पित कर देते| एक बार माँ ने पूछा- "ग्वाल| जरा अपने शरीर का ध्यान किया कर| सारा दिन गउये चराने जाता है और जो कुछ मैं तेरे लिए बनाती हूँ, अधिकतर तो साधुओं को खिला देता है और स्वयं थोड़ा सा खाता है| तुझे उनसे इतना प्रेम क्यों है| ग्वाल जी ने कहा- "माँ| संतो ने मुझे उपदेश दिया है कि गउये चराते हुए प्रभु-नाम का सुमिरण भी किया करो| उन्होंने कहा है कि जो कुछ हमने पिछले जन्म में बोया था वह अब मिल रहा है अर्थात जो दान दिया था, वही अब हम खा रहे है| यदि वर्तमान समय में साधु-संतों की सेवा में कुछ लगाओगे, तो आगे पाओगे| अत: तुम भी उनके पास चल कर देखो कि उनकी सेवा में कितना आनन्द मिलता है| तब तुम स्वयं ही मुझे अच्छे-अच्छे पकवान बना कर दोगी कि जाओ मेरा भी कुछ प्रारब्ध बनाओ| माँ ने ग्वाल के संग साधु-संतों की सेवा आरम्भ कर दी और कहा- "बेटा| ये गउये ही हमारे जीवन निर्वाह का साधन है, इन्हें सावधानी से चराया करो|" त्यौहार के दिन इनकी माँ ने इन्हें स्वादिष्ट पकवान और भोजन बनाकर दिया कि लो संतो को खिलाना और उनका सीत प्रसाद स्वयं खाना| भक्त ग्वाल जी सारा सामान लेकर वन में गउये चराने और निकट ही सन्त आश्रम में समान पहुँचाने चले गये| वहाँ ये संतो को भोजन खिलाने में इतने निमग्न हो गये कि इन्हें गउओं का ध्यान ही नहीं रहा| सेवा से निवृत हो जैसे ही गउओं के निकट आये, तो वहाँ पर दो गउये कम थी| वहाँ से गुजरते हुए चोरों ने दो गउओं को हाँक लिया था और साथ ले गए थे| प्रभु- इच्छा जान माँ के भय से पूछने पर कह दिया कि एक ब्राह्मण आजकल भूख से पीड़ित हो रहा था, वह दो गउये चरायेगा, छाछ से पेट भरेगा, कुछ समय पश्चात घी सहित अर्थात ब्याज सहित गउये हमें लौटा देगा| दीपावली के पर्व समीप था| चोरों ने गउओं को चाँदी की हंसलिया (गले का आभूषण) पहनायी| सांय समय चोर जब अपने घर में नृत्य-गान करने लगे एवं आतिशबाजी चलाने लगे| तो भगवान की कृपा से उनकी आवाज से डरकर चोरों की अपनी गउये भी भागने लगी और ग्वाल जी की गउओं ने तो अपने घर पर आकर ही दम लिया| वे दोनों गउये द्वार पर आकर रँभाने लगी| ग्वाल जी ने कहा- "माँ| देखो, ब्राह्मण ने व्याजसहित अर्थात हंसलिया पहनाकर इन्हें लौटा दिया है|" तत्पश्चात भक्त ग्वाल जी और उनकी माँ ने संतो की कृपा जानकार सर्वस्व संतो की सेवा में समर्पितकर, नाम-सुमिरण की कमाई करके जीवन को कृतार्थ किया|
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