भगवान भक्त का
प्रेम
एक बार अकबर ने
बीरबल से पूछा कि भगवान अपने भक्तों को बचाने खुद
क्यों आते है, उनके पास इतनी शक्ति है, अपने किसी सेवक को भेज सकते है|
परन्तु फिर भी हम पुराना इतिहास उठाकर देखे तो जब-2 भक्तों ने भगवान को याद किया
भगवान खुद उनकी मदद के लिए आये| तो ऐसा क्यों होता हैं? अब बीरबल तो वैसे ही बड़ा
समझदार था, वो हर सवाल का जवाब बड़ी सूझ-बूझ के साथ देता था| उसने राजा से कुछ समय
जवाब के लिए माँगा| उसके बाद बीरबल ने एक युक्ति बनाई| उसने राज्य के सेनापति को
बुलाया और राजा अकबर के लड़के का बुत बनाने को कहा जो कि दूर से दिखने में हु-ब-हु
अकबर के लड़के की तरह हो और बीरबल ने सेनापति को आदेश दिया कि इसके बारे में अकबर
को ना बताये, और दो दिन बाद इस बुत को झील के पास पानी के किनारे पर खड़ा करके
रखना| राजा और मैं सैर को आयेंगे जैसे ही मैं ईशारा करूँगा, दूर से, तो इस बुत को
पानी में गिरा देना| अब अकबर से बीरबल ने कहा कि मैं आपका जवाब देने के लिए तैयार
हूँ लेकिन उसके लिए हमें नदी के किनारे जाना पड़ेगा| हमारे साथ कुछ सेवक और कुछ मंत्री
भी चलेंगे राजा ने कहा- “ठीक
है|”
अब वे सारे नदी के किनारे गए जैसे ही वे नदी के पास सैर कर रहे थे बीरबल ने दूर
खड़े सेनापति को बुत गिराने के लिए इशारा किया| जैसे ही सेनापति ने बुत गिराया तो
राजा को दूर से लगा कि ये तो मेरा लड़का है जो पानी में गिरा है| अकबर ने बगैर कुछ
सोचे नदी में छलांग मार दी| जब वह बुत के पास गया तो हैरान हो गया कि वह तो बुत था
जिसे वह अपना लड़का समझ रहा था| अकबर को बहुत क्रोध आया उसने बीरबल से पूछा कि ये
कैसा मजाक था? तो बीरबल ने कहा- “महाराज
ये मजाक नहीं था ये आपके सवाल का जवाब था| जिस तरह आप अपने बच्चे को मुसीबत में
देख अपने आप को रोक नहीं पाए और आपने बिना कुछ सोचे-समझे पानी में छलांग लगा दी|
आप चाहते तो हमें भी भेज सकते थे, सेवकों को भेज सकते थे| लेकिन आप खुद गए क्योंकि
आपको अपने बच्चे से मोह था ठीक उसी तरह भगवान को भी अपने भक्तों के साथ इतना ही
प्रेम होता है कि वो अपने भक्तों को बचाने खुद आते है|
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बीरबल का वाक्य
बादशाह अकबर ने सभी दरबारियों से कहा की एक ऐसा वाक्य बताओ जिसको सुनकर बहुत खुश आदमी भी
उदास हो जाए, और बहुत दुखी आदमी भी खुश हो जाये| दरबारी
एक दूसरे का मुंह देखने लगे| ऐसा कोई वाक्य हो भी सकता हैं क्या? बीरबल ने जल्दी ही एक कागज़ पर एक वाक्य लिख कर बादशाह अकबर को
दे दिया| वाक्य पड़कर बादशाह अकबर ने बीरबल की बहुत
सराहना की और उनको दुनिया का सबसे समझदार व्यक्ति बताया|
बीरबल ने कागज़ पर लिखा था - ये समय भी बीत
जाएगा!
सीख – चाहे ख़ुशी का खज़ाना हो या दुःख का कड़वा घूंट, इस
ज़िन्दगी में सब
कुछ बीत जाने के लिए बने हैं .
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शुक्र है तेरा
मालिक
कहते हैं कि अकबर बहुत
बड़ा सम्राट था और राजाओं का भी राजा था| एक दिन रात को जब वह अपने कक्ष में सो रहा
था तो उसे बहुत जोरों की प्यास लगी| उसने सोचा किसी नौकर को क्या बुलाँऊ? खुद ही
पानी पी लेता हूँ| पहले समय में पानी कुँओ में से निकालना पड़ता था तो अकबर बाहर
आँगन में कुँए के पास गया और पानी निकालने लगा जैसे पानी निकाला तो उससे पानी का
मटका संभला नहीं और वह अकबर के ऊपर गिर गया| जिसके कारण अकबर को चोट आ गई| इतने
में अकबर के सेवादार भी यह आवाज सुनकर दौड़े चले आये| वो देखते है कि अकबर को चोट
लगी हुई है, लेकिन अकबर चोट पर ध्यान ना देकर मालिक का शुक्रिया अदा कर रहा है- “शुक्र
है तेरा मालिक-2|” सेवादारो नें पूछा- “महाराज
आपको तो चोट लग गई है और आप फिर भी भगवान का शुक्रिया अदा कर रहे है ऐसा क्यों?”
तो अकबर ने कहा कि मैं आज देश का सम्राट हूँ| मेरे एक इशारे पर लोग अपनी जान भी दे
देते है| सारे देश में मेरा राज चलता है लेकिन मैं अपने लिए कुँए से पानी तक नहीं
भर सकता| तो ये कितना बड़ा उपकार है भगवान का मुझ पर कि जिस व्यक्ति को पानी भरना
भी नहीं आता उसको देश का सम्राट बना रखा है, कहने का मतलब यही है कि भगवान ने हमें
दस चीजे दी एक चीज नहीं दी तो इंसान उसका गिला रख लेता है| अगर जो दिया है वो भी
ना देता तो क्या कर सकते थे हम? हमें हमेशा मालिक का शुक्र गुजार रहना चाहिए कि
शुक्र है तेरा मालिक| जो उसने दिया है उसका हमेशा धन्यवाद करते रहना चाहिए|
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अकबर तानसेन
वार्तालाप
एक बार राजा अकबर
ने तानसेन से कहा कि तानसेन मैंने गाने वाले तो बहुत देखे है लेकिन तुम जैसे गाने
वाला कोई नहीं देखा जब तुम गाते हो तो दीपक जल उठते है जब तुम गाते हो तो फूल खिल
खिला उठते है जब तुम गाते हो तो आकाश से जल बरसने लगता है क्या कोई तुम से भी
अच्छा गाता है? तब तानसेन ने कहा कि महाराज जी मैं तो कुछ भी नहीं गाता मेरे गुरु
हरिदास जी वो मुझसे भी अच्छा गाते है| तब अकबर ने कहा कि जाओ उन्हें बुला कर लाओ मैं
उनका संगीत सुनना चाहता हूँ| तब तानसेन ने कहा कि ये मुमकिन नहीं है अगर आपको उनका
संगीत सुनना है तो आपको उनके पास चलना पड़ेगा| और जहाँ पर वो रहते है उस जगह पर
पहुँचना आसान नहीं है वह पर जाने के लिए काफी समय लगता है और पैदल चल कर जाना पड़ता
है| अकबर ने कहा कि मैं हर मुश्किल का सामना करने के लिए तैयार हूँ| तभी वे दोनों
गुरु हरिदास के संगीत को सुनने के लिए निकल पड़े| कुछ दिनों के बाद जब वे गुरु
हरिदास जी के कुटिया में पहुंचे तब गुरु हरिदास जी ध्यान पर बैठे थे| तब तानसेन ने
महाराज अकबर से कहा कि अब हमे इन्तजार करना पड़ेगा जब तक गुरु जी अपने ध्यान से
नहीं उठते और मैं उन्हें गाने के लिए भी नहीं कह सकता जब उनका खुद का मन होंगा तभी
वे गाते है तब तक हमें इन्तजार ही करना पड़ेगा| राजा अकबर ने इन्तजार करना ही उचित
समझा| इस तरह कुछ दिन बीते| एक दिन सुबह -2 गुरु हरिदास जी ने गाना शुरू किया| जब
उन्होंने गाना शुरू किया तो उनका संगीत सुनकर राजा अकबर मन्त्र मुग्ध हो गया| उसको
इतना आनंद आया कि आज से पहले उसे ऐसा आनंद कभी नहीं आया| अकबर ने तानसेन से कहा कि
गाता तो तू भी है लेकिन जो आनंद तेरे गुरु के गाने में है वो आनंद कही नहीं है| ये
फर्क क्यों है तब तानसेन ने कहा कि महाराज मैं जब गाता हूँ तो मैं दिल्ली कि
सम्राट को खुश करने के लिए गाता| मेरे मन में यही कामना होती है कि आप खुश हो जाए|
लेकिन मेरे गुरु जब गाते है तो वे केवल और केवल अपने भगवान को त्रिलोकी के नाथ को
खुश करने के लिए गाते है| यही फर्क है कि जब मैं गाता हूँ तो दीपक जगमगा उठते है
लेकिन जब वे गाते है तो ह्रदय में दीपक जगमगाने लगते है| जब मैं गाता हूँ तो पुष्प
खिल उठते है लेकिन जब वे गाते है तो ह्रदय में कमल खिल उठते है जब मैं गाता हूँ तो
आकाश से जल बरसता है लेकिन जब वे गाते है तो
ह्रदय में अमृत रस बरसता है| इसी तरह जब सेवक संसार के लोगो को ना खुश करके
अपने मालिक को खुश करने की चाहना मन में रखता है तो उसे सच्चा आनंद सच्ची ख़ुशी
प्राप्त होती है
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