मीरा
की प्रेम अवस्था
जब
मीराबाई के देवर ने गलत भावना से टोकरी में एक जहरीले साँप को छुपाकर यह कह कर
भेजा था कि इसमे शालिग्राम (भगवान कृष्ण) की मूर्ति है| तो मीराबाई ने यह सोचकर कि
इसमे मेरे प्रियतम की मूर्ति है, टोकरी को खोला| तब उसे सचमुच ही अपने सामने
मुस्कराते हुए भगवान कृष्ण के दर्शन हुए थे| दूसरी बार, जब राणा जी ने उसे मारने
के विचार से विष का प्याला भेजा और कहा कि इसमें भगवान का चरणामृत है, तो मीरा ने
बिना किसी संकोच के शालिग्राम के प्रेम में डूब कर विष का प्याला अपने होठों से
लगा लिया था| और देखो, उसके लिए विष भी अमृत में बदल गया था| क्योंकि उसके इष्ट के
नाम से उसे जो भी दिया गया था, उसके लिए वह ‘प्रसाद’ बन गया था, यह बिल्कुल सत्य
है कि जो भगवान पर पूरा विश्वास रखते है, उनके राह की सभी मुश्किलें भगवान दूर कर
देते हैं|
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बृज में पुरुष
मीरा बाई जब वृन्दावन में आई तो वहाँ
पर एक महापुरुष सनातन गोस्वामी थे|
वे सन्त बंगाल से वहाँ आये हुए थे|
मीरा बाई उनके दर्शन करना चाहती थी|
लेकिन उनका यह नियम था कि किसी स्त्री को वे मत्थे नहीं लगाते थे यानि नहीं मिलते
थे| जब यह बात मीरा
बाई को मालूम हुई, उसे दर्शन करने से मिलने से मना कर दिया तो उस समय मीरा ने जवाब
दिया कि मैंने तो सोचा था कि भगवान श्री कृष्ण की इस बृज भूमि में केवल भगवान श्री
कृष्ण ही एक पुरुष है बाकि सब गोपियाँ, स्त्रियाँ है लेकिन आज मुझे मालूम हुआ कि
सनातन गोस्वामी भगवान श्री कृष्ण के अतिरिक्त भी यहाँ दूसरे पुरुष है| ये आवाज जब सनातन गोस्वामी जी के
कानों पड़ी तो एक दम सब दरवाजे खोलकर वे मीरा के चरणों में गिर पड़े| मीरा की कृष्ण भक्ति, उसका प्यार था
भगवान के प्रति जोकि इतने बड़े सन्त उसके चरणों में गिर गये|
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मीरा
की गुरु भक्ति
एक बार संत रैदास(रविदास) जी चितौड़ पधारे थे। रैदासजी रघु
चमार के यहाँ जन्में थे। उनकी छोटी जाति थी और उस समय जात-पाँत का बड़ा बोल बाला
था। वे नगर से दूर चमारों की बस्ती में रहते थे। राजरानी मीरा को पता चला कि संत
रैदास जी महाराज पधारे हैं| लेकिन राजरानी के
वेश में वहाँ कैसे जायें? मीरा एक मोची महिला का वेश बनाकर चुपचाप रैदासजी के पास चली
जाती, उनका सत्संग सुनती, उनके कीर्तन और ध्यान में मग्न हो
जाती। ऐसा करते-करते मीरा का सत्त्वगुण दृढ़ हुआ। मीरा ने सोचाः ‘ईश्वर के रास्ते जायें और चोरी छिपे
जायें? आखिर कब तक?’ फिर मीरा अपने ही वेश में उन चमारों की बस्ती में जाने लगी।
मीरा को उन चमारों की बस्ती में जाते देखकर अड़ोस-पड़ोस में कानाफूसी होने लगी।
पूरे मेवाड़ में कुहराम मच गया कि ‘ऊँची जाति की, ऊँचे कुल की, राजघराने की मीरा नीची जाति के चमारों की बस्ती में जाकर
साधुओं के यहाँ बैठती है, मीरा ऐसी है, वैसी है’ ननद उदा ने उसे बहुत
समझायाः “भाभी! लोग क्या
बोलेंगे? तुम राजकुल की रानी
और गंदी बस्ती में, चमारों की बस्ती
में जाती हो? चमड़े का काम करने वाले चमार जाति के
एक व्यक्ति को गुरु मानती हो? उसको मत्था टेकती हो?
उसके हाथ से प्रसाद लेती हो? उसको एकटक देखते-देखते आँखें बंद करके न
जाने क्या-क्या सोचती और करती हो? यह ठीक नहीं है। भाभी ! तुम सुधर जाओ।” सासु नाराज, ससुर नाराज, देवर नाराज, ननद नाराज, कुटुंबीजन नाराज, उदा ने कहाः
मीरा मान लीजियो म्हारी, तने सखियाँ बरजे सारी।
राणा बरजे, राणी बरजे, बरजे सपरिवारी।
साधन के संग बैठ, बैठ के लाज गँवायी सारी।।
‘मीरा! अब तो मान
जा। तुझे मैं समझा रही हूँ,
सखियाँ समझा रही हैं, राणा भी कह रहा है, रानी भी कह रही है,
सारा परिवार कह रहा है…. फिर भी तू क्यों नहीं समझती है?
इन संतों के साथ बैठ- बैठकर
तू कुल की सारी लाज गँवा रही है।’
नित प्रति उठ नीच घर जाय कुलको कलंक
लगावे।
मीरा मान लीजियो म्हारी तने बरजे सखियाँ सारी।।
तब मीरा ने उत्तर दियाः
तारयो पियर सासरियो तारयो माह्म मौसाली
सारी।
मीरा ने अब सद्गुरु मिलिया चरणकमल
बलिहारी।।
‘मैं संतों के पास गयी तो मैंने पीहर का
कुल तारा, ससुराल का कुल तारा, मौसाल का और ननिहाल का कुल भी तारा है।’ मूर्ख लोग समझते हैं कि भजन करने से
इज्जत चली जाती है वास्तव में ऐसा नहीं है।
राम नाम के शारणे सब यश दीन्हो खोय।
मूरख जाने घटि गयो दिन दिन दूनो होय।।
मीरा की कितनी बदनामी की गयी, मीरा के लिए कितने षड्यंत्र किये गये
लेकिन मीरा अडिग रही तो मीरा का यश बढ़ता गया। आज भी लोग बड़े प्रेम से मीरा को
याद करते हैं, उनके भजनों को गाकर
अथवा सुनकर अपना हृदय पावन करते हैं।
"पायो
जी मैं राम रत्न धन पायो"
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