श्री कल्याण जी का
गुरु प्रेम
स्वामी श्री गुरु रामदास जी के ऐसे ही
प्रेमी गुरुमुख शिष्य थे, श्री
कल्याण जी| जो सतगुरुदेव जी की प्रसन्नता एवम उनका प्रेम पाने के लिए अपने प्राण
निछावर करने को हर समय तत्पर रहते थे| एक
बार उन्होंने अपने शिष्यों की परीक्षा ली|
एक दिन अपने शिष्यों को सत्संग करते
समय वह अपनी दाहिनी टांग को पकड़ कर जोर-जोर
से कराहने लगे| उनके वह शिष्य यह
देखकर घबरा गए कि गुरुदेव को यह क्या हो गया है| तब स्वामी जी ने अपनी टांग पर बंधी
पट्टी दिखाते हुए बताया कि हमारी टांग में कई दिनों से फोड़ा हो रहा है जोकि उपचार
से ठीक नहीं हुआ| इसी कारण हमें पीड़ा
हो रही है| तब शिष्यों ने पूछा कि स्वामी जी इसका कोई तो उपचार होगा| इस जगह में कई वैद्य है हम अभी पता लगाते
हैं कि फोड़ा विशेषज्ञ कौन है| तब
गुरुदेव जी ने फ़रमाया कि यह फोड़ा औषधियों से ठीक होने वाला नहीं है| तो शिष्यों ने पूछा कि बताईये गुरुदेव
ये कैसे ठीक होगा| इसके लिए हमें
प्राण भी त्याग करने पड़े तो भी हम तैयार हैं|
तब स्वामी जी ने फ़रमाया कि अगर कोई
इसका विषैला मवाद चूस ले तो ऐसा करने से हमारा कष्ट दूर हो जाएगा| परन्तु याद रखो कि ऐसा करने से मवाद को
चूसने वाला तुरंत ही परलोक सिधार जाएगा| अब
सारे शिष्य चुप हो गए और एक दूसरे का मुख देखने लगे कोई भी अपनी जगह से ना हिला| तब कल्याण जी ने आगे बढ़ कर गुरुदेव के
चरणों में प्रार्थना की- प्रभो| यह सेवा दास को बक्शी जाये| तब गुरुदेव ने कहा कि कल्याण जी लगता
है तुमने वचनों को सुना नहीं| इस
मवाद को चूसने वाला तुरंत ही परलोक चला जाएगा| तब कल्याण जी ने हाथ जोड़कर विनय की- प्रभो| यदि दास का यह तुच्छ शरीर गुरुदेव का
कष्ट दूर करने में काम आ जाए तो इससे उत्तम सदुपयोग क्या होगा| यह कहते हुए वे प्रेम विभोर हो गए और
उनकी आँखों से आँसू आने लगे| उनकी
श्रद्धा, भावना देखकर स्वामी
जी का हृदय गद् - गद् हो उठा| उन्होंने
फ़रमाया- "कल्याण
तुम्हारी भावना से हम अति प्रसन्न है, कल्याण
जी ने विनय की प्रभो| अब
देर मत कीजिये| शीघ्र पट्टी खोलिए| स्वामी जी ने फ़रमाया की पट्टी खोलने से
हमें कष्ट होगा| पट्टी के सिरे पर
फोड़े का जो काला सा मुँह दिखाई दे रहा है उसी से चूसना आरम्भ कर दो, कल्याण जी ने चूसना शुरू किया| अब शिष्य यह देखकर हैरान होने लगे और
कल्याण जी को मूर्ख और अज्ञानी समझ मन ही मन हँसने लगे कि फोड़ा तो औषधि से भी ठीक
हो सकता है इसके लिए अपने प्राण त्यागना कहा बुद्धिमता है| वास्तव में अज्ञानी और नासमझ तो वे
स्वयं थे जोकि भूल गए कि
गुरु की आज्ञा पर चलने वाला, उनकी
प्रसन्नता के लिए प्राण उत्सर्ग करने वाला सेवक कभी नहीं मरता| कल्याण जी ने जब फोड़े को चूसना आरम्भ
किया तो उसमे विषैलेपन की तो कोई बात ही नहीं थी| कल्याण जी को वह रस अत्यंत मधुर प्रतीत
हुआ| कुछ ही समय में
उसने सारा रस चूस लिया| तब
गुरुदेव ने फ़रमाया- कल्याण अब छोड़ दो| आज्ञा पाकर कल्याण जी एक तरफ खड़े हो गए| तब गुरुदेव ने पट्टी खोली तो उसमे रस-विहीन आम का छिलका और गुठली निकाल सबके
सामने रख दी| तब सभी शिष्यों का
सिर लज्जा से झुक गया| रामदास
जी ने उनकी परीक्षा के लिए पट्टी के नीचे आम रखा था| इस परीक्षा में सच्ची निष्ठा, श्रद्धा, प्रेम और बलिदान जैसे सद्गुणों से
भरपूर होने के कारण भक्त कल्याण जी बाजी मार ले गए |
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