युसुफ जुनून्न की
शरण में
युसूफ नाम का एक भक्ति भाव वाला
व्यक्ति मिश्र देश में रहता था उसे फकीरों की संगति और उनके वचन सुनकर यह ज्ञात
हुआ कि परमात्मा को पाने के लिए सतगुरु का होना बहुत आवश्यक है| सतगुरु ही जीव को परमात्मा से मिलने का
रास्ता बताते हैं| वह भी इसी खोज में
निकल पड़ा कि कोई सतगुरु मिले जो उसे ज्ञान और नाम की दीक्षा दे| अन्तत: उसकी खोज रंग लाई| किसी स्थान पर एक सन्त रहते थे जुनून्न
नामक| वह उनकी शरण में
गया और उनसे नाम की दात बक्शने के लिए विनय की| परन्तु उसकी विनय सुनकर भी उन्होंने
कुछ उत्तर न दिया| युसूफ समझ गया| कि मुझे पहले इनकी प्रसन्नता प्राप्त
करनी पड़ेगी| युसूफ रोज उनके प्रवचन सुनने जाता और सेवा भी
करने लगा| तथा उस घड़ी की
प्रतीक्षा करने लगा जब उस पर मुर्शिद की कृपा बरसेगी और वे उसे नाम की दीक्षा
देंगे| इस प्रकार चार वर्ष
बीत गए| अब युसूफ को थोड़ा
विश्वास होने लगा कि
अब सतगुरु जी उस पर खुश होंगे| तो
उसने उनके श्री चरणों में विनती की गुरुदेव|
मुझ पर कृपा कीजिये और मुझे नाम की
दीक्षा दीजिये| परन्तु जुनून्न जी
ने फिर कोई उत्तर नहीं दिया| परन्तु
युसूफ का विश्वास न डगमगाया| अगले
दिन जब वह उनकी शरण में पहुँचा तो जुनून्न जी ने उसे एक बक्सा दिया और फ़रमाया कि
इसे नील नदी के पार अमुक स्थान पर अमुक फ़क़ीर रहते हैं उन्हें दे आओ| किन्तु बक्सा खोलना नहीं, ऐसे ही उन्हें दे आना| युसूफ बक्सा लेकर ख़ुशी-ख़ुशी वहाँ से चल दिया कि आज उसके मुर्शिद
ने उसके प्रति कुछ वचन तो फरमाए और उसे सेवा भी बक्शी थी| वह नील नदी की ओर चल दिया| किन्तु मार्ग में उसका मन धोखा देने
लगा और इस बात के लिए भरमाने लगा कि इस बक्से में क्या है, बक्से में ताला तो नहीं है तो कुण्डी
खोलकर देखने में क्या हर्ज है मन का यही काम है जीव को भरमाना| अन्तत: उसने मन का कहना मानकर बक्से का ढक्कन
खोला, उसमे से एक चूहा
निकल कर भागा| युसूफ ने उसे पकड़ने
की कोशिश की लेकिन वह चूहा हाथ में ना आया और गायब हो गया युसूफ को अपनी गलती
का एहसास हो गया| कि वह मन के धोखे
में आकर यह क्या कर बैठा| वह
अपनी गलती पर रोने और पछताने लगा| तभी
उसके मन ने अनुभव किया कि कोई उसे कह रहा है कि ये बक्सा नदी के पार जाकर फ़क़ीर को
दे दो और उनके सामने अपनी गलती स्वीकार कर क्षमा माँग लो| अत: वह उन फ़क़ीर के पास चला गया और वहाँ
जाकर फ़क़ीर के चरणों में बक्सा रख दिया और फिर उनसे कहा कि मुझे आप से और भी कुछ
कहना है| तब तक फ़क़ीर वह
बक्सा खोल चुके थे| जोकि खाली था| फ़क़ीर ने कहा तुम्हे कुछ कहने की जरुरत
नहीं है मैं सब समझ चुका हूँ| यह
सुनकर युसूफ अपने आप को रोक ना सका और उसकी आँखों में पश्चताप के आँसू बह निकले| फ़क़ीर कुछ समय तक तो युसूफ की तरफ देखते
रहे फिर फ़रमाया कि तुम मुर्शिद की कृपा चाहते थे और इसके लिए तुमने बड़ी श्रद्धा
एवं निष्ठा से मुर्शिद के आश्रम पर हर प्रकार की सेवा की| मुर्शिद तुमसे प्रसन्न थे पर तुम्हे
सच्ची दात बक्शने से पहले बताना चाहते थे कि भक्ति मार्ग में साधक का सबसे महान
शत्रु उसका मन होता है जो हर समय उसे मार्ग से भटकाने का प्रयत्न करता है और तुमने
यह देख भी लिया कि
मन ने तुम्हें कैसे भटकाया| तुम्हें
अपने किये पर पश्चाताप है यह तुम्हारे आँसू बता रहे हैं| तुम वापिस जाओ मुर्शिद के पास| हमारा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है वे तुम
पर अवश्य कृपा करेंगे| युसूफ
वापिस अपने मुर्शिद के पास गया और उनके चरणों में गिर पड़ा| फ़क़ीर जुनून्न ने उसे उठाया और हृदय से
लगा लिया तथा भक्ति धन से मालामाल कर दिया क्योंकि फ़क़ीर यह बात जान चुके थे युसूफ
अब कभी भी मन के धोखे में नहीं आयेगा| सदा
इससे सावधान रहेगा||
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अँगूठी की कीमत
बहुत पुरानी बात है। मिस्र में एक सूफी संत रहते थे, जिनका नाम जुन्नुन था। एक नौजवान ने
उनके पास आकर पूछा, मुझे समझ में नहीं
आता कि आप जैसे लोग सिर्फ एक चोगा ही क्यों पहने रहते हैं? बदलते वक्त के साथ यह जरूरी है कि लोग
ऐसे लिबास पहनें, जिनसे उनकी शख्सियत
सबसे अलग दिखे और देखने वाले वाहवाही करें। जुन्नुन
मुस्कुराए और अपनी उंगली से एक अँगूठी निकालकर बोले, बेटे, मैं तुम्हारे सवाल का जवाब जरूर दूंगा
लेकिन पहले तुम मेरा एक काम करो। इस अँगूठी को सामने
बाजार में एक अशर्फी में बेचकर दिखाओ। नौजवान ने जुन्नुन
की सीधी-सादी सी दिखने वाली अँगूठी को देखकर मन ही मन कहा, इस अँगूठी के लिए सोने की एक
अशर्फी? इसे तो कोई चांदी
के एक दीनार में भी नहीं खरीदेगा! कोशिश करके देखो, शायद तुम्हें वाकई कोई खरीददार मिल जाए, जुन्नुन ने कहा। नौजवान
तुरंत ही बाजार को रवाना हो गया। उसने वह अँगूठी बहुत से
सौदागरों, परचूनियों, साहूकारों, यहाँ तक कि हज्जाम और कसाई को भी दिखाई पर उनमें से कोई भी उस अँगूठी के लिए एक
अशर्फी देने को तैयार नहीं हुआ। हारकर उसने जुन्नुन को जाकर कहा, कोई भी इसके लिए चाँदी के एक दीनार से
ज्यादा रकम देने के लिए तैयार नहीं है। जुन्नुन ने
मुस्कुराते हुए कहा, अब तुम इस सड़क के
पीछे सुनार की दुकान पर जाकर उसे यह अँगूठी दिखाओ लेकिन
तुम उसे अपना मोल मत बताना। बस यही देखना कि वह इसकी क्या कीमत लगाता है। नौजवान
बताई गई दुकान तक गया और वहाँ से लौटते वक्त उसके चेहरे पर कुछ और
ही बयां हो रहा था। उसने जुन्नुन से कहा,
आप सही थे। बाजार में किसी को भी इस अँगूठी की सही कीमत का
अंदाजा नहीं है। सुनार ने इस अँगूठी के लिए सोने की एक हजार अशर्फियों
की पेशकश की है। यह तो आपकी माँगी कीमत से भी हजार गुना है! जुन्नुन
ने मुस्कुराते हुए कहा, और वही तुम्हारे सवाल का जवाब है। किसी भी इंसान की कीमत उसके
लिबास से नहीं आंको। नहीं तो तुम बाजार के उन सौदागरों की मानिंद बेशकीमती नगीनों
से हाथ धो बैठोगे। अगर तुम उस सुनार की आंखों से चीजों को परखने लगोगे तो तुम्हें
मिट्टी और पत्थरों में सोना और जवाहरात दिखाई देंगे। इसके लिए तुम्हें दुनियावी नजर पर पर्दा डालना होगा और दिल की
निगाह से देखने की कोशिश करनी होगी। बाहरी दिखावे और बयानबाजी के परे देखो, तुम्हें हर तरफ हीरे-मोती ही दिखेंगे।
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