हजरत
ईसा का सन्देश
हजरत ईसा ने अनेक
बार कहा-“
मैं कोई नया सन्देश लेकर नहीं आया।
मुझसे पहले कितने ही सज्जन और मालिक के प्यारे महापुरुष यह सन्देश सुना गए है। मैं
केवल उसी अमर सन्देश को दोहराने के लिये आया हूँ।”
हजरत मूसा ने कहा था की “मैं
नबी नहीं बल्कि नबियों और पैगम्बरों का पैगाम सुनाने आया हूँ।”
हजरत मुहम्मद ने इसी सच्चाई को जाहिर करते हुए कहा- “मेरे
उपदेशों में जो जीवन ज्योति है, वह वही अनादी दिव्य ज्योति है जो मेरे से पहले
कितने ही रूपों में प्रगट हुई है।”
महाप्रभु गौरांग, परम संत कबीर, गुरुनानक, स्वामी दयानंद, परमहंस रामकृष्ण और
स्वामी विवेकानंद ने भी इसी अमर कथन की पुष्टि की तथा गुरु गुरुगोविंद सिंह के शब्दों
में पुकार उठे- “हम तो परम पुरुष के
दास उसके आनंद में लीन थे कि संसार में अधर्म और पाप, दुराचार और पाखण्ड ने ज़ोर
पकड़ा, जिस पर परम पिता ने आदेश देकर हमें सत्तलोक से इस संसार में धर्म और शुभाचरण
का प्रचार करने के लिए भेज दिया।
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गुरु निष्ठा
हजरत ईसा मसीह के
जीवन में भी एक ऐसा ही चमत्कार हुआ | एक बार उन्होंने कुछ मच्छेरे सेवकों को रात
के समय अपने पास बुलाया | सागर में ज्वारभाटा के कारण कई-कई फुट ऊँची तूफानी लहरें
उठ रही थी | अँधेरी रात में मल्लाहों ने तूफ़ान भरे समुद्र में कश्तियाँ ले जाना
अच्छा न समझा | वे मच्छेरे कुछ निराश होकर अपने घरों को लौट गए | वे चिंतातुर सेवक
तट पर खड़े सोचने लगे कि अब क्या किया जाए | अकस्मात एक प्रेमी को ऐसा महसूस हुआ
जैसे समुद्र के दूसरे किनारे खड़े गुरुदेव हजरत ईसा मसीह उन्हें आवाज देकर बुला
रहें हैं| उसने अपने साथियों से कहा –“
चिंता की कोई बात नहीं, मेरे साथ आओ| हम किनारे के साथ-साथ होकर चलेंगे |”
दूसरे साथी भी उनके पीछे चल दिए| इस प्रकार ये पाँच मच्छेरे तूफानी सागर को पार
करके गुरुदेव के पास पहुँच गए| गुरुदेव ने उनसे सत्संग में पूछा –“तुमने
समुद्र तैर कर पार किया है या चल कर?”
मच्छेरे बोले –“ हम तैरने के लिए
कपड़े उतार ही रहे थे कि जब हमें ऐसा महसूस हुआ कि पानी फ़ौरन उतर गया है , इसलिए हम
चलकर ही आये हैं|” इस चमत्कार की बात
सुनकर कुछ प्रेमी सत्संग से उठकर सागर की ओर बढ़े ताकि वे भी उन पाँचों के समान
सागर को पार कर लें, किन्तु वे डूबने लगे| बड़ी मुश्किल से उन्हें बचाया गया |
गुरुदेव ने उस अवसर पर कहा – “तैरने
की शक्ति और समुद्र जल पर चलने की हिम्मत दृढ़ निश्चय और अटूट विश्वास में है| यदि
गुरु निष्ठा पक्की हो तो समुद्र भी रास्ता दे देते हैं और पहाड़ अपने स्थान से हिल
जाते हैं | इसलिए सेवकों को, ईश्वर प्रेमियों को मालिक से सदा यह ही माँगना चाहिए
कि चाहे कुछ भी हो जाए , गुरु निष्ठा न छुटे|”
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