Monday, May 11, 2020

परमसंत रज्जब दास जी


रज्जब की गुरु भक्ति
एक बार संत दादू शिष्य मण्डली सहित यात्रा कर रहे थे, तो मार्ग में छिछले पानी वाला नाला पड़ा, जिसमें कीचड़ भरा था। दादू जी के शिष्य उस नाले को पत्थरों से पाटने के लिए पत्थर खोजने लगे, जिससे गुरुदेव बिना कीचड़ में पैर रखे पार जा सकें। तभी रज्जब उस छिछले नाले में जा लेटा और दादू से आग्रह किया कि "आप मेरे ऊपर पैर रखते हुए पार चले जाइए।' दादू उसके ऊपर पैर रखते हुए उस पार चले गए। बाद में जब दादू संसार छोड़ गए तो उनके वियोग में गुरुभक्त रज्जब ने अपनी आंखें ढांप लीं, ताकि वे किसी को देख न सकें। जब संतों ने उन्हें आंखें खोलने के लिए विवश करना चाहा तो रज्जब ने उनसे कहा-"गुरुदेव चले गए। अब मैं दुनिया में देखूं तो किसे देखूं! कौन है देखने लायक? मुझे तो अपने गुरुदेव के दर्शन की ही सदैव अभिलाषा रही थी, वे नहीं रहे तो अन्य किसी को देखने की मेरी इच्छा नहीं है।'
संत रामचरणदास ने रज्जब के लिए ठीक ही कहा है-
"दादू जैसा गुरु मिले, शिष्य रज्जब सा जाण।
एक शब्द में उद्धरा, रही न खेंचा तान।।'
सच ही दादू के शब्दों से रज्जब का उद्धार हो गया था, क्योंकि रज्जब ने जीवन में मात्र यही चाहा कि,
"रज्जब' की अरदास यह, और कहै कछु नाहिं।
यो मन लीजै हेरि, मिले न माया माहिं''
अर्थात् "रज्जब की मात्र यही अरदास है कि, हे हरि! आप एक बार मेरे मन को अपना लें, जिससे कि वह माया में लिप्त न हो।'
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