Monday, May 11, 2020

परम संत रामानुजाचार्य जी


रामानुजाचार्य का मन्त्र प्रचार
रामानुजाचार्य प्राचीन काल में हुए एक प्रसिद्ध विद्वान थे। उनका जन्म मद्रास नगर के समीप पेरुबुदूर गाँव में हुआ था। बाल्यकाल में इन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा गया। रामानुज के गुरु ने बहुत मनोयोग से शिष्य को शिक्षा दी। शिक्षा समाप्त होने पर वे बोले-पुत्र, मैं तुम्हें एक मंत्र की दीक्षा दे रहा हूँ। इस मंत्र के सुनने से भी स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है।रामानुज ने श्रद्धाभाव से मंत्र की दीक्षा दी। वह मंत्र था-ऊँ नमो नारायणाय। आश्रम छोड़ने से पहले गुरु ने एक बार फिर चेतावनी दी-रामानुज, ध्यान रहे यह मंत्र किसी अयोग्य व्यक्ति के कानों में न पड़े।रामानुज ने मन ही मन सोचा-इस मंत्र की शक्ति कितनी अपार है। यदि इसे केवल सुनने भर से ही स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है तो क्यों न मैं सभी को यह मंत्र सिखा दूँ। रामानुज के हृदय में मनुष्यमात्र के कल्याण की भावना छिपी थी। इसके लिए उन्होंने अपने गुरु की आज्ञा भी भंग कर दी। उन्होंने संपूर्ण प्रदेश में उक्त मंत्र का जाप आरंभ करवा दिया। सभी व्यक्ति वह मंत्र जपने लगे। गुरु जी को पता लगा तो उन्हें बहुत क्रोध आया। रामानुज ने उन्हें शांत करते हुए उत्तर दिया, ‘गुरु जी, इस मंत्र के जाप से सभी स्वर्ग को चले जाएँगे। केवल मैं ही नहीं जा पाऊँगा, क्योंकि मैंने आपकी आज्ञा का पालन नहीं किया है। सिर्फ मैं ही नरक में जाऊँगा। यदि मेरे नरक जाने से सभी को स्वर्ग मिलता है, तो इसमें नुकसान ही क्या?’ गुरु ने शिष्य का उत्तर सुनकर उसे गले से लगा लिया और बोले-वत्स, तुमने तो मेरी आँखें खोल दीं। तुम नरक कैसे जा सकते हो? सभी का भला सोचने वाला सदा ही सुख पाता है। तुम सच्चे अर्थों में आचार्य हो। रामानुजचार्य अपने गुरु के चरणों में झुक गए। लोगों को भी उनकी भाँति सच्चे और सही मायने में इंसान बनना चाहिए। सच्चा इंसान वह नहीं होता, जो केवल अपने बारे में सोचे, इंसान वहीं है, जो दूसरों का भला करता है। 
****

प्रेम और परमात्मा

रामानुज के शिष्य ने एक बार अपने गुरु से कहा, कृप्या मुझे भगवत प्राप्ति का मार्ग बतलाएं| रामानुज ने अपने उस शिष्य से पूछा- क्या तुमने अपने जीवन में कभी किसी से प्रेम किया है? शिष्य ने उत्तर दिया- नहीं गुरुवर नहीं मैंने जीवन में किसी से भी प्रेम नहीं किया, न मैं किसी से प्रेम करता हूँ| मैं तो इस भौतिक जगत से बिल्कुल विरक्त हूँ| मैं तो केवल भगवन को पाना चाहता हूँ| तब रामानुज ने कहा-जिसके हृदय में प्रेम नहीं, जिसके हृदय में प्रेम की कसक नहीं, वह तो भगवन को नहीं पा सकता| भगवन को पाने की कसोटी एक ही है-प्रेम| जिसके हृदय में प्रेम की तडपन, आकुलता, व्याकुलता नहीं, भला वह भगवान तक कैसे पहुँच पायेगा? भक्ति का दूसरा नाम ही प्रेम है| यदि तुम्हारे हृदय में सांसारिक प्रेम ही है तो उसको भी शुद्ध किया जा सकता है| प्रेम तो प्रेम की कीमत पर ही मिलता है| वासना रहित प्रेम ही ईश्वर है| संसारी लोग जहाँ आसक्ति में बंध कर दुखी और परेशान होते हैं, सच्चा प्रेमी इसी आसक्ति को ही साधन बना लेता है| वासना ही प्रेम में बदल जाती है| इसी प्रकार हर शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, इर्षा-द्वेष, तृष्णा इतियादी) को प्रेमी प्रियतम तक पहुँचने का साधन बना लेता है|
****

No comments:

Post a Comment