फूलो की सेज पर
सोना
बलख बुखारे का
युवराज फूलों की सेज पर सोया करता था, रोज उसका नौकर युवराज के लिए फूलों की सेज बनाता था| एक दिन
नौकर जब फूलों की सेज तैयार कर रहा था तो उसके मन में आया कि युवराज रोज इन फूलों
की सेज पर सोता है तो उसे क्या आनंद आता होगा, यह जानने के लिए वह भी फूलों की सेज
पर लेट गया, और लेटते ही उसे
नींद भी आ गई| इतने में युवराज भी वहाँ आ गया उसने जब देखा कि मेरा नौकर मेरे
बिस्तर पर सो रहा है तो उसे बहुत गुस्सा आया उसने सैनिकों को बुलवाया और कहा कि
इसे ले जाओ कल सुबह दरबार में लाना इसे दण्ड मिलेगा अगले दिन दरबार में उस नौकर को
राजा के सामने लाया गया| युवराज ने कहा कि इसने बहुत बड़ी गुस्ताखी की है इसे कोड़े
मारो| जब सैनिकों ने कोड़े मारना शुरू किया तो वह नौकर हँसने लगा| राजा यह सब देख
कर बड़ा हैरान हुआ कि नौकर को कोड़े मारे जा रहे है और वह हस रहा है| तब युवराज ने
नौकर से पूछा कि तू हस क्यों रहा है तब नौकर ने जवाब दिया कि मैं इसलिए हस रहा हूँ
कि मैं जो 10-15 मिनट आपके फूलों के बिस्तर पे सोया तो मुझे कोड़े मारे जा रहे है
आप तो रोज उस पर सोते है तो आपका क्या होगा| यह सुनकर युवराज भी सोच में पड़ गया|
तब से उसके मन में वैराग्य की भावना जागृत हुई| युवराज परमार्थ सिद्धि के साथ-2
चाहता था कि मैं ऐश्वर्यमय जीवन व्यतीत करूँ| ये दोनों विरुद्ध कार्य कैसे सिद्ध
हो सकते थे? सो उसको उचित मार्ग दर्शाने के लिए दो दिव्य पुरुष उसके स्वप्न में
आये| वे इसके पास आये तो युवराज ने उससे पूछा –तुम कौन है और कैसे आये हो? दोनों
ने उत्तर दिया कि ‘हम सारबान (ऊंट चलाने वाले) है हमारे ऊंट खो गए है उसे ही खोज
रहे है| इस पर युवराज ने कहा होश की दवा लो| भला ऊँटो का मकान की छत पर क्या काम?
सारबान कुदरत की तरफ से युवराज को सतमार्ग पर अग्रसर ही तो करने आये थे| उन्होंने
तपाक से उत्तर दिया - होश की दवा तो प्रथम आप लीजिये –ईश्वर की प्राप्ति करने वाले
का सवा मन फूलों की सेज पर सोने का क्या काम? इतना कह के वह तो न जाने कहाँ ओझल हो
गए| उनकी बात से युवराज के विचारों को ठेस लगी और राजसी ठाट-बाट छोड़ के फकीरी भेष
धारण कर लिया| अभी वह योवन अवस्था में ही था परन्तु वैराग्य हो जाने के कारण उसने
राज्य के सुखों को त्याग दिया और अपने देश में पहले से अधिक लगन से फकीरों की खोज
करने लगा लेकिन आत्मिक आनन्द की प्राप्ति उसे कहीं से न हुई| इस तरह वह संतो को खोजता
हुआ भारत आया| यहाँ भी कई फकीरों से मिला फिर भी मन की आकांक्षा पूर्ण न हुई| यह
वह समय था जब संत श्री कबीर साहिब जी काशी में नामोपदेश कर रहे थे और अनेक जीवों
को परमार्थ का लाभ हो रहा था| कबीर साहिब जी की महिमा सुनकर वह काशी में उनके पास
पहुँचा| उनसे विनय की-मुझे भी अपना सेवादार बना लो| संत श्री कबीर जी ने उससे आदि
से अंत तक का हाल पूछा और फरमाया-तुम बादशाह हो और हम गरीब जुलाहे| अतः हमारा
तुम्हारा मेल कैसा? इस पर इब्राहिम ने कहा कि मैं आपके पास बादशाह बन कर नहीं आया
हूँ बल्कि गरीब भिखारी बनकर आया हूँ| उस समय कबीर जी के पास ‘माता लोई’ बैठी थी|
उसने भी सिफारिश की और कबीर जी ने उसे अपने पास रख लिया| अब वह श्री कबीर जी के घर
का हर प्रकार का काम करने लगा| और जो कुछ वहाँ से खाने को मिलता –सहर्ष खा लिया
करता था| इस प्रकार श्री कबीर जी की सेवा में उसे 6 वर्ष व्यतीत हो गए| एक दिन
माता लोई ने श्री कबीर साहिब जी से कहा कि यह बादशाह और हम गरीब जुलाहे, जो कुछ हम
खाते है वो यह भी चुपचाप खा लेता है| अब इस पर आपकी दया दृष्टी होनी चाहिए| कबीर
साहिब ने उत्तर दिया - अभी इसका दिल पूर्णतया पवित्र नही हुआ अभी इसके ह्रदय में अहंकार
की बू आती है| इस पर माता लोई ने विनय की –इसका क्या प्रमाण है? तब कबीर साहिब जी
ने कहा –आज तुम ऐसा करो, मकान की छत पर चढ़ जाओ| मैं इसको बाहर भेजता हूँ| जब यह
नीचे से गुजरे तब सब गंदगी फैक देना और छिपकर यह सुनना कि यह क्या कहता है? माता
लोई ने ऐसा ही किया| कूड़ा फैंकने के बाद पीछे होकर सुनने लगी| इब्राहिम कहने लगे -
अफ़सोस अगर मैं बलख बुखार में होता तो फिर मैं जो करना चाहता करता| माता लोई ने सब
वृतान्त श्री कबीर साहिब जी को बताया| उन्होंने कहा कि हमने तो पहले ही तुम से कहा
था कि अभी इसके अन्तः करण में अहंकार ने डेरा लगाया हुआ है जिस कारण अभी यह इस चीज़
के योग्य नही हुआ| इसी प्रकार कबीर जी के पास रहते-2 6 वर्ष और भी व्यतीत हो गए|
इन 6 सालों में इब्राहिम ने अति विनम्रता दीनता व गरीबी के साथ सेवा की| खाना
रूखा-सुखा जो मिला अमृत समझकर खा लिया| यदि कभी कुछ न भी मिला तो भी चू तक न की|
श्री कबीर साहिब जी के घर पर साधु-महात्मा तो आते ही रहते थे| इब्राहिम को उनकी
सेवा करने व सत्संग सुनने का अच्छा अवसर मिला| प्रारम्भ की सेवा करने व अब की सेवा
करने में धरती आकाश का अंतर पड़ चुका था| श्रद्धा- भाव से की हुई सेवा रंग लाई| एक दिन
श्री कबीर साहिब जी माता लोई से कहने लगे कि अब बर्तन साफ़ हो गया है| लोई ने कहा
–मुझे तो कोई विशेष अंतर नही दिखता| जैसे पहले था वैसा ही अब है| परन्तु यह तो परख
दृष्टी रखने वाले श्री कबीर साहिब जी जानते थे कि अब इब्राहिम का ह्रदय पवित्र हो
चुका है| सर्वसाधारण मनुष्य इन बातों को परखते व समझने की योग्यता कहाँ रखते है|
जब कबीर साहिब जी के कहने पर माता लोई को विश्वास न हुआ तो कबीर साहिब जी ने
फरमाया - इसकी परीक्षा लो| पहले तो तुमने इसके ऊपर साधारण कूड़ा-करकट डाला था| अब
गली-सड़ी दुर्गन्ध युक्त गंदगी इस के ऊपर छत पर खड़ी होकर डालो ताकि यह गंदगी से
अच्छी प्रकार लथपथ हो जावे| तब तुम्हे स्वयमेव ज्ञात हो जायेगा| माता लोई ने श्री
कबीर साहिब जी के कथानुसार वैसा ही किया| जब इब्राहिम जी द्वार से निकलने लगे तो
योजना के अनुसार माता लोई ने एकत्र की हुई गंदगी की इसके ऊपर वर्षा कर डाली| इस
बार अपने ऊपर दुर्गन्ध युक्त कीच के पड़ते ही वह खूब हंसा और प्रसन्नता से कहने
लगा-शाबाश| मेरे ऊपर कृपा
करने वाले तेरा भला हो| मेरा मन अहंकारी है| अतएव इसे ठीक करने का यही उचित उपाय
है| यह देख सुनकर माता लोई ने समस्त वृतान्त कबीर साहिब जी को कह सुनाया| जिसे
सुनकर उन्होंने फरमाया कि ‘मैंने पहले ही तुम्हे बता दिया था कि अब इसके दिल का
बर्तन पवित्र और निर्मल हो गया है| इसमें कोई कसर नहीं रह गई है| अतः अब यह कृपा
का पात्र बन चुका है|’ अब श्री कबीर जी ने इब्राहिम को रूहानियत के गूढ़ रहस्य बताए
जिससे इसके दिल में इतना प्रभाव पड़ा जिसकी कोई सीमा नही है| अंत में श्री कबीर जी
ने उसे कहा –अब तुम भक्ति की सम्पदा से मालोमाल हो गए हो|
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गरीब
को खाना खिलाना
प्रसिद्ध
सूफी संत इब्राहीम – बिन –अदहम पहले बलख के बादशाह थे| मगर सूफियाना रंग उन पर इस
तरह चढ़ा कि उन्होंने राजपाट त्यागकर फ़कीर की जिंदगी अपना ली| बलख छोड़कर वे मक्का आ
गए और वहीँ लकड़ियाँ काटकर अपना गुजारा करने लगे| लकड़ियाँ बेचकर उन्हें जो कुछ
मिलता उसका एक बड़ा हिस्सा जरुरतमंदो को बाँट देते| उनका जीवन त्याग और जन कल्याण
की एक बेहतरीन मिसाल है| एक समय की बात है उनके पास एक गरीब आया जिसने इब्राहिम से
विनय की कि उसे बड़ी भूख लगी है कुछ खाने के लिए दे दो| तब इब्राहिम ने उसे एक
प्लेट भरकर खाना खाने के लिए दिया, उसे प्लेट में से सारा खाना उस गरीब व्यक्ति ने
खा लिया| फिर उसने विनय की कि अभी मेरा पेट नहीं भरा है मुझे और खाना दे दीजिये|
तब इब्राहिम ने उन्हें और खाना दिया, जब वह गरीब दोबारा खाना खाने लगा तब इब्राहिम
ने फरमाया कि भगवान की आप पर कितनी कृपा है और उसका कितना बड़ा उपकार है आप पर जो
उसने आप के लिए हर व्यवस्था कर रखी है, उसी की करामात से ही आपको आज खाना खाने को
मिला है| तब उस गरीब ने कहा कि कौन सा भगवान मैं किसी भगवान को नहीं जानता न ही
उसकी करामात को मैं मानता हूँ| तब इब्राहीम को ये बात अच्छी न लगी उसने उस गरीब से
खाना वापिस ले लिया और कहा कि जिस भगवान ने तुझे खाना दिया तू न उसको मानता है न उसकी करामात को स्वीकार करता
है तो तुझे खाना खाने का कोई हक़ नहीं है| तब वह गरीब व्यक्ति सब सुनकर चला गया| उस
रात को इब्राहिम के सपने में भगवान आये और भगवान ने फरमाया कि इब्राहिम आज तुमने
उस गरीब से खाना वापिस लेकर अच्छा नहीं किया, तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिये था| तब
इब्राहिम ने कहा कि हे परमात्मा मैंने ऐसा इसलिए किया कि उसने आप का निरादर किया|
उसे आप पर यकींन ही नहीं है और न ही वो आप के उपकार मानता है| तब भगवान ने कहा कि
वो पिछले 40-50 वर्षो से हमारा निरादर कर रहा है लेकिन हमने कुछ नहीं कहा तब तुम
कौन होते हो उसे कुछ कहने वाले| अर्थात जब किसी के गुनाहों को देखकर भगवान जी उसे
अपनी सृष्टि से नहीं निकालते तो हम क्यूँ लोगो के गुनाहों को देखकर उनके साथ गलत
व्यवहार शुरू कर देते है| उस मालिक को पता है की किस व्यक्ति को किस समय पर उसके
गुनाहों की सजा मिलनी है| इसलिए सब कुछ उस परमपिता परमात्मा के हाथ छोड़कर अपने
कर्मों की तरफ ध्यान देना चाहिये|
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