काबुल पर आक्रमण
काबूल पर आक्रमण करने के लिए महाराजा
रणजीत सिंह जब अपने दल – बल सहित अटक नदी के तट पर पहुँचे उस समय नदी में भयानक
बाढ़ आई हुई थी और उसका प्रवाह बहुत तेज था |
अटक नदी वैसे भी बहुत गहरी थी|
जहाँ से महाराजा रणजीत सिंह को अटक का दुर्ग जीतने के लिए नदी पार होना था, वहाँ
तो नदी में अथाह जल था और नदी का पाट भी उस स्थान पर बहुत चौड़ा था आजकल उस स्थान
पर एक पुल बना हुआ है |
परन्तु उस दिन पुल कहा था? फिर अटक की बाढ़ और तीव्र विख्यात है ऐसी दशा में इतनी
बड़ी सेना को हाथी –घोड़ों सहित पार करना साधारण कार्य नही था, यह अत्यन्तं कठिन
कार्य था परन्तु महाराजा रणजीत सिंह दृढ़ प्रतिज्ञ तथा महान साहसी थे | उन्होंने नदी की बाढ़ तथा उसके वेग की
तनिक भी चिंता न की |
दृढ़ संकल्प की अदम्य शक्ति पर भरोसा कर के उन्होंने अपना घोड़ा आगे बढाया और ये
शब्द कहे –
अटल राज महाराज का ,जा में अटक बहाय |
जाके मन में अटक है , सोई अटक रह जाय ||
अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि में उसी सच्चे
मालिक का अटल राज है |
यह अटक नदी भी तो उसी महाराज के साम्राज्य
में बहती है तथा उसी के अनुशासन में है|
बस जिनके मन में उस मालिक के प्रति अटल विश्वास हो और जिसे अपनी संकल्प शक्ति का भरोसा हो, वह मेरे पीछे –पीछे निर्भय होकर
चला आये| जिसके मन में अटक
है, वे ही अटके रह जायेंगे|
इतना कहा और घोड़े को नदी के तीव्र वेग से जूझने के लिए नदी में छोड़ दिया| इस प्रकार वे अपनी दृढ़ शक्ति के
चमत्कार से देखते ही देखते नदी पार पहुँचे |
उनके पीछे उनके सेना नायकों तथा सैनानियों ने भी अपने -अपने घोड़े नदी में डाल दिए
,जो दृढ़ निश्चयी एंव साहसी थे और जिनके मन में यह भरोसा था कि साहस से काम लेने वालों की सहायता स्वयं मालिक करता है वे
सब भी आन की आन में नदी के पार हो गये|
किन्तु कुछ ऐसे सैनिक भी थे, जिनका चित्त डावाडोल था और जिनके संकल्प में दुर्बलता थी वे खड़े मुँह
ताकते रह गये |
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