घोड़ो
का बटवारा
एक
बार विक्रमादित्य घोड़े पर सवार कही जा रहे थे कि वे एक गाँव में जा पहुँचे| वहाँ
उन्होंने देखा एक हवेली के बाहर 3 युवक चुपचाप बैठे है, उनके चेहरों पर उदासी छाई
हुई है| विक्रमादित्य ने जब उन से उदासी का कारण पूछा तो उन्होंने उसे एक साधारण
सैनिक समझकर कहा – भैया, हमारी परेशानी दूर करना तुम्हारे वश की बात नहीं| जब
विक्रमादित्य ने अपना परिचय दिया तब उन्होंने कहा कि हम तीनों भाई हैं, हमारे पिता परलोक सिधार गए
हैं| उनकी वसीयत के अनुसार शेष सम्पति तो हमने बाँट ली, परन्तु हमारे पास 19 घोड़े
है वसीयत के अनुसार बड़ा भाई आधे, मंझला भाई चौथाई और छोटा भाई पाँचवे भाग का मालिक
है| परन्तु हमें समझ नहीं आ रहा हम घोड़ो को कैसे बाँटे| विक्रमादित्य ने कहा
तुम्हारी ‘समस्या मैं हल कर दूँगा| परन्तु तुम्हे मेरी बात माननी होगी|’ उन्होंने
कहा – ‘आप जो निर्णय देंगे हमे स्वीकार है|’ विक्रमादित्य ने उनके घोड़ो में अपना
घोड़ा मिलाकर कहा- ‘अब घोड़े बीस हो गये है| इनके आधे अर्थात दस बड़ा भाई ले ले चौथाई
अर्थात पांच मंझला भाई ले ले और पांचवा भाग अर्थात चार छोटा भाई ले ले|’ घोड़े
बाटँने के बाद विक्रमादित्य ने पूछा- ‘तुम में से किसी को कम हिस्सा तो नहीं
मिला?’ तीनो ने कहा- ‘नहीं, हमें भाग से अधिक ही मिला है|’ वे तीनो प्रसन्न हो गये
और विक्रमादित्य अपने घोड़े पर सवार होकर वहाँ से चल दिया| अब विचार करो कि
विक्रमादित्य का घोड़ा उनके घोड़ो में मिला दिए जाने के बाद भी कैसे अलग रहा? बस इसी
तरह तुम भी संसार में सबसे मिलजुल कर रहो, परन्तु रहो सबसे अलग जैसे जल में रहते
हुए भी कमल जल से अलग रहता है| जल में रहते हुए भी उसका वास्तविक सम्बन्ध सूर्य के
साथ जुड़ा होता है| तुम भी इसी प्रकार बेशक संसार में रहो, परन्तु संसार को हृदय
में मत बसाओ| हृदय में केवल प्रभु का प्यार, उनकी भक्ति , उनका नाम बसा रहे
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