पाद
पदमाचार्य जी
पाद
पदमाचार्य जी ‘विमल’ नामक ब्राह्मण के पुत्र थे| इनका निवास स्थान ‘कावेरी’ नदी के
तट पर ‘चला’ नामक नगर में था| बाल्यकाल में ही इन्होने अपनी विलक्षण प्रतिभा से
वेद-शास्त्रों का ज्ञान तो प्राप्त कर लिया| परन्तु आत्मा को फिर भी शांति न मिली|
इतने पर भी आशावादी होने के कारण इन्होने हिम्मत न हारी और निरंतर खोज जारी रखी|
इस कुमार को बचपन से ही प्रेम भक्ति की तीव्र लग्न थी| इस कारण वे उसे शीघ्र पाने
हेतु व्याकुल होकर उसकी खोज कर रहे थे| आखिर प्रत्येक वस्तु की कोई न कोई सीमा तो
होती है| जब उनके ह्रदय की तीव्र व्याकुलता ने सीमा पार कर ली तो परमात्मा की तरफ
से पूर्ति का साधन भी आ उपस्थित हुआ| एक बार घूमते-2 कहीं जा रहे थे कि वहीँ मार्ग
में इनको शंकराचार्य जी के दर्शन हुए| उनके अलौकिक तेज को देखकर इनका वर्षो से
व्याकुल एवं संतप्त ह्रदय तत्क्षण शांत हो गया तथा इन्हें विश्वास भी हो गया कि ये
पूर्ण पुरुष है| इन्ही से ही मुझे शांति की उपलब्धि हो सकती है| यह विचार कर
पदमाचार्य जी ने हाथ जोड़कर उनके समक्ष सादर विनय की –‘स्वामिन| मैं संसार की लहरों में झकोले खा रहा
हूँ| बहुत समय से वास्तविक शांति की निरंतर खोज करते रहने पर भी वह मुझे प्राप्त न
हो सकी परन्तु आज तो मेरे परम सौभाग्य जाग्रत हो उठे है जो आप जैसे महापुरुष को
मैंने पा लिया है| अतएव आप मेरे गुणों-अवगुणों की ओर दृष्टीगोचर न करते हुए मुझ पर
अनुकम्पा कीजिये| हे दयानिधान! अब शीघ्र ही मेरी जलती हुई आत्मा को आत्मिक शांति
प्रदान करे| स्वामी शंकराचार्य जी उसे उत्तम संस्कारी रूह जानकर व इसकी भक्ति व
प्रेम का मिश्रित विनय सुनकर ह्रदय में अति प्रसन्न हुए| इसकी विनय को स्वीकार कर
अपना शिष्य बना लिया तथा इसका नाम ‘सनन्दन’ रखा| सनन्दन जी के मन में अपने गुरु के
प्रति अत्यंत प्रेम था| उनकी पावन सेवा वे पूर्ण श्रद्धा व विश्वास से करते थे|
वैराग्य तो चरम सीमा को भी लांघ चुका था| सनन्दन जी भी सदैव अपने सतगुरु जी की
आज्ञा पालन में तत्पर रहते| संत-महापुरुष अपने सेवकों की भक्ति को सुद्रढ़ करने के
लिए आदि काल से उन्हें परीक्षा की कसौटी पर परखते आये है| संत सतगुरु भी अपने
शिष्यों को अपनी आज्ञा व मौज रुपी कसौटी पर चढ़ा कर उनकी भक्ति की परीक्षा कर
उन्हें और भी अधिक भक्ति प्रदान करते हैं| इस सिद्धांतानुसार शंकराचार्य जी की भी
सनन्दन की परीक्षा लेने की मौज उठी| एक बार शंकराचार्य जी काशी के निकट क्षेत्रो
में भक्ति का प्रचार कर रहे थे| उस समय उनके शिष्यों के साथ सनन्दन जी भी गुरुदेव
के साथ ही था| एक दिन की वार्ता है कि स्वामी शंकराचार्य जी गंगा नदी के दूसरे
किनारे पर खड़े थे और सेवक गण इस पार खड़े थे| गंगा जी की लहरे तीव्र थी, पानी सपाटे
से भागा जा रहा था| इतने में गुरुदेव ने सेवकों को आवाज़ लगाई कि ‘धोती ले जाओ’|
इधर गंगा जी के प्रबल वेग को देखकर सभी सेवकों के दिल बैठ गए| किसी का भी साहस नही
बंध रहा था कि ऐसे पानी में गुरुदेव के पास कैसे पहंचे? धोती पहुँचाने के लिए कौन
अपने प्राणों पर खेले?इस प्रकार सभी एक दूसरे का मुँह ताकने लगे| इतने में ही
सनन्दन जी ने गुरुदेव की धोती को अपने सर पर बाँध लिया तथा उच्चे स्वर में अपने
गुरुदेव के चरणों में विनय की महाराज”
जी अभी लाया कहकर दिल में विचारने लगा कि जिन पूर्ण गुरुदेव की शिक्षा ने जीव को
भवसागर से पार करना है क्या उनकी आज्ञा से मैं गंगा पार नही जा सकता? अवश्य जा
सकता हूँ| यह सोचकर उसने गंगा की लहरों में छलांग लगा दी| कथाकारों का कहना है कि
इस दृढ विश्वास के प्रताप से गंगा नदी ने सनन्दन जी के पाँव के नीचे थोड़ी -2 दूरी पर कमल
पुष्प पैदा कर दिये जिन पर पाँव रखते हुए वे सुगमता से शीघ्र ही नदी के उस पार जा
पहुँचे| जिस सेवक को अपने गुरु पूरा विश्वास है वो क्या नहीं कर सकता?वो सारे
कार्यो में सफल हमेशा होता है|
गुरु समरथ सर पर खड़े, क्या कमी तोहे दास
|
रिद्दी सिद्दी सेवा करे, मुक्ति न
छाडे पास ||
सनन्दन
जी ने आके गुरुदेव जी को धोती अर्पण कर चरणों में शीश झुकाया| स्वामी शंकराचार्य
ने अपने सच्चे सेवक के सिर पर करुणा भरा हाथ फेरा| धन्य है वे भक्तजन जिनके सिर पर
पूर्ण गुरु एक बार भी हाथ फेर दे|
सो दिन कैसा होयगा, गुरु गहेंगे
बाहिं |
अपना करि बैठाव्ही, चरण कवल की
छाँही ||
उसी
दिन शंकराचार्य जी ने प्रसन्न होकर उनका शुभ नाम ‘पाद पदमाचार्य’ रखा| कमल के
पत्तों पर चलकर इन्होने गंगा नदी पार की थी इसलिए इनका नाम पदमाचार्य रखा|
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