शेख सादी जी
एक समय की बात है शेख सादी कही जा रहे थे| सब
जानते है के फकीरों के पास रूहानी धन के इलावा और कुछ नही होता है| दोपहर
का समय था धुप बहुत तेज थी| शेख
सादी धुप मे नंगे पाँव चल रहे थे| चलते चलते जब पैरों की चमड़ी जलने लगी तो
शेख सादी खुदा को उलाहना देते हुए कहते है के ए खुदा इतनी धूप है रहम करके एक जूता
तो दिलाओ| जब शेख सादी थोड़ी दूर गया तो क्या देखता है सामने से एक अपाहिज
आ रहा है जिसकी दोनो टाँगे नही है| इतनी
धूप मे वो अपाहिज लकड़ियों (बैसाखियों) के सहारे चल रहा है|
शेख सादी ने जब यह वाक्या देखा तो शेख सादी का सिर शर्म से नीचे हो गया| खुदा से कहता है ए खुदा ए करीम ए गरीब नवाज मै अपने लफ्ज वापिस लेता हूँ ।मुझसे बड़ी गलती हुइ है| मुझे जूते नही चाहिए आप ने मुझे इतनी सुन्दर दो टाँगे दी है इतने सुन्दर पैर दिए है इसके लिए आपका शुक्र है शुक्र है शुक्र है|
शेख सादी ने जब यह वाक्या देखा तो शेख सादी का सिर शर्म से नीचे हो गया| खुदा से कहता है ए खुदा ए करीम ए गरीब नवाज मै अपने लफ्ज वापिस लेता हूँ ।मुझसे बड़ी गलती हुइ है| मुझे जूते नही चाहिए आप ने मुझे इतनी सुन्दर दो टाँगे दी है इतने सुन्दर पैर दिए है इसके लिए आपका शुक्र है शुक्र है शुक्र है|
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