Monday, May 11, 2020

भक्त बेणी जी


भक्त बेणी जी की वाणी
भक्तों की दुनिया बड़ी निराली है| प्रभु भक्ति करने वालों की गिनती नहीं हो सकती| इस जगत में अनेकों महापुरुष हुए हैं, जिन्होंने प्रभु के नाम के सहारे जीवन व्यतीत किया तथा वह इस जगत में अमर हुए, जबकि अन्य लोग जो मायाधारी थे, मारे गए तथा उनका कुछ बना| ऐसे पुरुषों में ही भक्त बेणी जी हुए हैं| आपका वास्तविक नाम ब्रह्म भट्ट बेणी था| आपका जन्म सम्वत 1670 विक्रमी में 'असनी' गांव में हुआ| आप जाति के ब्राह्मण थे और इतने निर्धन थे कि जीवन से उदास हो गए थे| रात-दिन यही विचार करते रहते थे कि अगर मानव जीवन का अन्त कर लें, अगला जीवन क्या पता कैसे हो| हो सकता है कि यदि इस जन्म में दुखी हैं तो अगले जन्म में सुखी हो जाएंगे| ऐसी ही दलीलें किया करते थे, क्योंकि भूखे बच्चों का रोना उनसे देखा जाता| हर रोज़ पत्नी झगड़ा करती| वह इसी माया की कमी के दुखों से तंग गया तथा हर रोज़ मन ही मन कलेश करने लगे वह उदास हो कर घर से चल पड़े| अचानक रास्ते में उनको एक महापुरुष मिला| उनके साथ वचन-विलास हुए तो उन्होंने पूछा, 'हे बेणी! किधर चले हो?' बेणी- 'महाराज क्या बताऊं, घर में बहुत गरीबी है| इस भूखमरी की दशा ने दुखी किया है| समझ नहीं आता क्या करूं-यही मन करता है कि आत्मघात कर लूँ| पत्नी तथा बच्चे अपने-आप भूख से मर जाएंगे| ऐसा सोच कर बाहर को चला हूँ| महापुरुष-'मरने से दुःख दूर नहीं होते| आत्महत्या करेगा तो आत्मा दुखी होगी, नरकों का भागी बनेगा| मेहनत करो, यदि कोई और मेहनत नहीं करनी तो प्रभु भक्ति की ही मेहनत किया करो| जो भक्ति करता है, परमात्मा उसकी सारी कामनाएँ पूरी करता है| जीवों की चिंता परमात्मा को है| कर्म गति है, कर्मों का फल भोगना पड़ता है| किसी जन्म में ऐसा कर्म हुआ है, जो यह दुःख के दिन देखने पड़े| अब तो प्रभु की भक्ति करो तो ज़रूर भला होगा| उस महांपुरुष का उपदेश बेणी को अच्छा लगा| मन पर प्रभाव पड़ा तो जंगल की ओर चला गया और वहाँ जाकर भक्ति करने लगा| इस तरह कुछ दिन बीत गए| भाई गुरदास जी ने यह शब्द उच्चारा -
गुरमुख बेणी भगति करि जाई इकांत बहै लिव लावै |
करम करै अधिआतमी होरसु किसै अलख लखावै |
घर आइआ जां पूछिअै राज दुआरि गइआ आलावै|
घर सभ वथू मंगीअ निवल छल करिकै झत लंघावै |
वडा साग वरतदा ओहु इक मन परमेसर धिआवै ||
पैज सवारै भगत दी राजा होइकै घरि चलिआवै |
देइ दिलासा तुसि कै अनगिनती खरची पहुँचावै |
ओथहुं आइआ भगत पासि होइ दिआल हेत उपजावै |
भगत जनां जैकार करावै|
अब बेणी बाहर एकांत में समाधि लगा कर भक्ति करने के लिए मन एकाग्र कर लेता परन्तु अपनी भक्ति को गुप्त रखता, किसी को भी उसने नहीं बताया,  जब वह घर आता तो पत्नी पूछती कहाँ से आए हो?' राज दरबार में कथा करता हूँ| जब कथा समाप्त होती भोग पड़ेगा तो अवश्य ही राजा दक्षिणा देगा| वह धन पदार्थ बहुत होगा, सारी जरूरतें पूरी हो जाएंगी| यह सुन कर बेणी जी की पत्नी क्रोधित होकर आपे से बाहर हो गई| उसने कहा-'चूल्हे में पड़े तुम्हारा राजा!' कथा का क्या पता कब भोग पड़ेगा| आप मुझे भोजन सामग्री ला दो नहीं तो घर मत लौटना| अपनी पत्नी के इस तरह के कटु वचन सुनकर बेणी चुपचाप जंगल को चला गया| भक्ति में जा लगा| ऐसी सुरति प्रभु से जुड़ी कि सब कुछ भूल गया| पत्नी का रोना याद आया| भुखमरी तथा अपनी भूख याद रही केवल परमात्मा को याद करता गया| उधर अन्तर्यामी प्रभु ने सत्य ही भक्त की भक्ति सुन ली| अपने सेवक की लाज रखने के लिए, अपने नाम की महिमा व्यक्त करने के लिए उन्होंने राजा का रूप धारण किया तथा भोजन सामग्री की गाड़ियाँ भर लीं| धन ढोया तथा जा कर बेणी की पत्नी को पूछा - 'ब्रह्म भट्ट बेणी का घर यही है?' बेणी की पत्नी- 'जी, यही है| परमात्मा ने राजा के अहलकार के रूप में कहा, 'वह राज दरबार में कथा करते हैं| भोजन सामग्री भेजी है| अन्न है, वस्त्र, मीठा, घी, संभाल लो| कथा पूरी होने पर बहुत कुछ मिलेगा|' बेणी की पत्नी को लाज आई कि वह झूठ नहीं कहते थे, सत्यता ही राजा के दरबार में जाते थे, यूं ही क्रोध किया| उसने सारा सामान रख लिया तथा खुश हो कर बेणी जी को याद करने लगी, यह भी कह दिया, 'जी! सुबह कुछ नाराज होकर गए हैं, उनको शीघ्र भेज देना|' प्रभु यह लीला देखकर प्रसन्न हो गए तथा सीधे बेणी जी के पास पहुँचे, उनको जा कर होश में लाया तथा कहा-'होश करो तुम्हारी भक्ति स्वीकार हुई! जाओ, तुम्हारी सारी आवश्यकताएँ पूरी हुईं| किसी बात की कमी नहीं रह गई|' बेणी जी ने साक्षात् दर्शन किए| वचन सुने पर जब आगे बढ़ कर नमस्कार करने लगे तो प्रभु अपनी माया शक्ति से अदृश्य हो गए| सारा कौतुक देखकर भक्त बेणी भक्ति करने से उठे तथा खुशी से गद्गद् हो कर वापिस घर को चल दिए| जब घर आए तो उनकी पत्नी उनको प्रसन्नचित्त हो कर मिली| उनके चरणों में माथा टेका, और बोली कि 'मुझे क्षमा करना नाथ! मैं तो भूल गई थी मुझे भूख ने तंग किया था तभी अयोग्य बातें मुंह से निकल गईं| मुझे क्षमा कीजिए, आप तो सब कुछ जानते हो| राजा का अहलकार सब कुछ दे गया| अब किसी बात की कमी नहीं| प्रभु ने बात सुन ली|' बेणी सुन कर प्रसन्न हो गया कि यह सब कुछ प्रभु भक्ति का फल है, जो माया आई तथा साथ ही घर की माया (स्त्री) भी खुश हो गई|
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